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Save Water: हम क्या थे, क्या हो गए और क्या होंगे मैथिलीशरण गुप्त की कविता की ये पंक्तियां अनायास ही याद आती हैं। क्या सच में भारत कभी सोने की चिडिय़ा था या हमने बचपन से जो सुना वह मिथ्या है? मुगल हों या अंग्रेज, तुर्क या पुर्तगाली, भारत को लूटते रहे, फिर भी कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। आज हमारे स्वतंत्र भारत में सूखे का प्रकोप है। यह वही देश है जहां विश्व की पहली अनोखी सभ्यता जन्मी थी। जहां विश्व का पहला मानव निॢमत जलाशय बनाया गया था वर्तमान के सौराष्ट्र में। मथुरा- आगरा के पास डीग में खासतौर से ग्रीष्म ऋतु का महल बनाया गया है जिसमें दो मंजिल पानी में डूबे रहने की वजह से बड़े-बड़े कमरों की दीवारें व फर्श ऐसे ठंडे कि आज के आधुनिक एयर कंडीशनर को मात दे दें। नालियां, नहरें, बड़े-बड़े फव्वारे जिनमें रंगीन केवड़े व खसखस से सुवासित ठंडी बयार बहा करती थी। वर्षा जल का ऐसा सुनियोजित प्रबंधन था जहां के हर महल फिर चाहे वो मांडू का रानी रूपमती का महल हो या फिर दो झीलों के बीच बना बाज बहादुर का जहाज महल, वर्षा का सारा जल छोटी-छोटी नालियों से बहकर तहखानों के हौज भर जाया करता था। जमा हुए पानी में चूना व कोयला मिलाकर पीने योग्य बनाया जाता था। सपना सा लगता है ये सब सुनना व पढऩा क्योंकि वर्तमान युग में जल के बिना जीवन जल रहा है। श्रीमद्भगवदगीता में एक श्लोक आता है
‘अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भव:।
यज्ञाद्भवति पर्जन्योयज्ञ: कर्म समुदभव:।।

अर्थात


संपूर्ण प्राणी अन्न से हैं, अन्न होता वृष्टि से वृष्टि होती यज्ञ से जो कर्म की शुभ सृष्टि से। हमारे ऋषियों का ये था सरल सहज सात्विक गणित कि यज्ञ की समिधा, घृत व हवि की आहुतियां मन्त्रïोच्चार के साथ अग्नि को समॢपत
की जाएं तो उसका धुआं आकाश में जाकर बादल बनेगा, वर्षा करेगा और उस जल से खेतों में अन्न उत्पन्न होगा। कैसा दुर्भाग्यपूर्ण सत्य कि ऐसे पूर्वजों के वंशज हम प्रदूषित जहरीली हवा में सांस लेते हैं। इस हवा से बने बादल बेमौसम बरस फसल को नुकसान पहुंचाते हैं, कभी ओले बनकर और कभी नव अंकुरित कोमल पत्तों पर  मूसलाधार वृष्टि कर। अब सॢदयों में बर्फबारी नहीं होती। नदियों को पूजने वाले देश में नदियों की दुर्दशा का जिम्मेदार कौन है?

उत्तराखंड में गर्मी आती ही सारे जलस्रोत सूख चले हैं, जगह-जगह बने बांध नदियों का निर्मल स्वाभाविक प्रवाह रोक देते हैं। हाल ही में केदारनाथ में पानी का भयंकर प्रलयकारी रूप हम भूल चुके हैं। नदियों के प्रवाह का दमन व उन्मूलन जिस परिशिष्ट कुचक्र के संरक्षक बांध बना कर करते हैं वो प्रमाण है कि बांध निर्माण अन्य विशेष प्रयोजन का पुष्टीकरण मात्र है न कि जनसाधारण के लिए अनिवार्य आवश्यक विकास की संकल्पना। जिस मराठवाड़ा में सूखे से जनमानस त्राहि-त्राहि कर रहा है वहां महाराष्ट्र की जल संसाधन मंत्री बेहाल लातूर की सूखी नदी के साथ सेल्फी ले, फेसबुक पर शेयर करती हैं। सर्वविदित है कि जिस राज्य में लोग प्यासे मर रहे हैं वहां बाकायदा बांध बनाकर पानी कारखानों व उद्योगों को दिया जाता है, मोटे मुनाफेके लालच में। क्यों आज वर्षा जल को जमा करना अनिवार्य नहीं? हर वर्ष सैकड़ों लीटर शुद्ध जल नालियों गटर व सड़कों पर बह जाता है। ये वो देश है जहां दो पीढ़ी पहले तक लोग कुंए खुदवाते थे, परमार्थ प्याऊ लगवाते थे, राहगीरों के लिए मटकों में शीतल जल भरकर रखते थे, पशुओं के लिए हौज बनवाते थे। पानी का व्यवसायीकरण हुआ, प्यासे को पानी देने की हमारी प्राचीन परंपरा ऐसी टूटी कि आज घरों में एसी कूलर पंखे बाथटब वाले समृद्ध उनकी पीड़ा नहीं समझ पाते जो भरी दोपहरी में तपती सड़क पर पानी के टैंकर की प्रतीक्षा करते हैं।
पानी के लिए हाहाकार देखना हो तो कभी उन गरीब बस्तियों व अनाधिकृत कालोनियों में जाइए जहां सप्ताह में एक बार पानी टैंकर आता है। क्या हम समर्थ जन निश्चय करें कि यथाशक्ति हम अपने-अपने स्तर पर जलसंरक्षण का प्रयास करें, क्योंकि हमारे समृद्ध घरों में पानी के फव्वारे व नल अभी भले ही नहीं सूखते किंतु आने वाले कल के लिए भी क्या हम इतने ही यकीन से ये कह सकते हैं? क्योंकि शाश्वत सत्य तो आज यही है कि जल ही जीवन है और जीवन ही जल रहा है!