Laila by munshi premchand
Laila by munshi premchand

यह कोई न जानता था कि लैला कौन है, कहां से आयी है, और क्या करती है? एक दिन लोगों ने एक अनुपम सुन्दरी को तेहरान के चौक में अपने डफ़ पर हाफिज़ की यह गज़ल झूम-झूमकर गाते सुना-

रसीद मुजरा कि ऐयामे गम न ख्वाहद मांद,

चुना न माँद, चुनीं नीज़ हम न ख्वाहद मांद।

और सारा तेहरान उस पर फिदा हो गया। यही लैला थी।

लैला के रूप-लालित्य की कल्पना करनी हो, तो उषा की प्रफुल्ल लालिमा की कल्पना कीजिए, तब नील गगन स्वर्ण-प्रकाश से रंजित हो जाता है, बहार की कल्पना कीजिए, जब बाग में रंग-रंग के फूल खिलते हैं और बुलबुलें गाती हैं।

लैला के स्वर-लालित्य की कल्पना करनी हो, तो उस घण्टी की अनवरत ध्वनि की कल्पना कीजिए, जो निशा की स्तब्धता में ऊटों की गर्दनों में बजती हुई सुनाई देती है, या उस बाँसुरी की ध्वनि की, जो मध्याह्न की आलस्यमयी शान्ति में किसी वृक्ष की छाया में लेटे हुए चरवाहे के मुख से निकलती है।

जिस वक्त लैला मस्त होकर गाती थी, उसके मुख पर एक स्वर्गीय आभा झलकने लगती थी। वह काव्य, संगीत, सौरभ और सुषमा की एक मनोहर प्रतिमा थी, जिसके सामने छोटे और बड़े, अमीर और गरीब, सभी के सिर झुक जाते थे। सभी मंत्र-मुग्ध हो जाते थे, सभी सिर धुनते थे। वह उस आने वाले समय का सन्देश सुनाती थी, जब देश में सन्तोष और प्रेम का साम्राज्य होगा, जब द्वन्द्व और संग्राम का अन्त हो जायेगा। यह राजा को जगाती और कहती, यह विलासिता कब तक, यह ऐश्वर्य-भोग कब तक? वह प्रजा की सोई हुई अभिलाषाओं को जगाती, उनकी हत्तन्त्रियों को अपने स्वरों से कम्पित कर देती। वह उन अमर वीरों की कीर्ति सुनाती, जो दीनों की पुकार सुनकर विकल हो जाते थे, उन विदुषियों की महिमा गाती, जो कुल-मर्यादा पर मर मिटी थीं। उसकी अनुरक्त ध्वनि सुनकर लोग दिलों को थाम लेते थे, तड़प जाते थे।

सारा तेहरान लैला पर फिदा था। दलितों के लिए वह आशा का दीपक थी, रसिकों के लिए जन्नत की हूर, धनियों के लिए आत्मा की जागृति और सत्ताधारियों के लिए दया और धर्म का सन्देश। उसकी भौंह के इशारे पर जनता आग में कूद सकती थी। जैसे चैतन्य जड़ को आकर्षित कर देता है, उसी भांति लैला ने जनता को आकर्षित कर लिया था।

और यह अनुपम सौंदर्य सुधा की भांति पवित्र, हिम के समान निष्कलंक और नव कुसुम की भांति अनिन्द्य था। उसके लिए प्रेम-कटाक्ष, एक भेदभरी मुसकान, एक रसीली अदा पर क्या न हो जाता-कंचन के पर्वत खड़े हो जाते, ऐश्वर्य उपासना करता, रियासतें पैर की धूल चाटतीं, कवि कट जाते, विद्वान् घुटने टेकते, लेकिन लैला किसी की ओर आँख उठा कर भी न देखती थी। वह एक वृक्ष की छाँह में खड़ी रहती, भिक्षा माँगकर खाती और अपनी हृदय-वीणा के राग अलापती थी। वह कवि की सूक्ति की भांति केवल आनन्द और प्रकाश की वस्तु थी, भोग की नहीं। वह ऋषियों के आशीर्वाद की प्रतिमा थी, कल्याण में डूबी हुई, शान्ति में रंगी हुई, कोई उसे स्पर्श न कर सकता था, उसे मोल न ले सकता था।

एक दिन संध्या समय तेहरान का शहजादा नादिर घोड़े पर सवार उधर से निकला। लैला गा रही थी। नादिर ने घोड़े की चाल रोक ली और देर तक आत्मविस्मृति की दशा में खड़ा सुनता रहा। गज़ल का पहला शेर यह था-

मरा दर्देस्त अन्दर दिल, अगर गोयम जवाँ सोजद,

वगैर दम दरकशम, तरसन कि मगजो उस्तख्वां सोजद।

फिर वह घोड़े से उतरकर वहीं जमीन पर बैठ गया और सिर झुकाए रोता रहा। तब वह उठा और लैला के पास जाकर उसके कदमों पर सिर रख दिया। लोग अदब से इधर-उधर हट गए।

लैला ने पूछा- तुम कौन हो?

नादिर- तुम्हारा गुलाम!

लैला- मुझसे क्या चाहते हो?

नादिर- आपकी खिदमत करने का हुक्म। मेरे झोंपड़े को अपने कदमों से रोशन कीजिए।

लैला- यह मेरी आदत नहीं।

शहजादा वहीं फिर बैठ गया और लैला फिर गाने लगी। लेकिन गला थर्राने लगा, मानो वीणा का कोई तार टूट गया हो। उसने नादिर की ओर करुण नेत्रों से देखकर कहा- तुम यहाँ मत बैठो।

कई आदमियों ने कहा- लैला, हमारे हुजूर शहजादा नादिर हैं।

लैला बेपरवाही से बोली- बड़ी खुशी की बात है। लेकिन यहाँ शहजादों का क्या काम?- उनके लिए महल हैं, महफ़िलें हैं और शराब के दौर हैं। मैं उनके लिए गाती हूँ जिनके दिल में दर्द है। उनके लिए नहीं, जिनके दिल में शौक हैं।

शहजादा ने उन्मत्त भाव से कहा- लैला, मैं तुम्हारी एक तान पर अपना सब-कुछ निसार कर सकता हूँ। मैं शील का गुलाम था, लेकिन तुमने दर्द का मजा चखा दिया।

लैला फिर गाने लगी, लेकिन आवाज काबू में न थी, मानो वह उसका गला ही न था।

लैला ने डफ कंधे पर रख लिया और अपने डेरे की ओर चली। श्रोता अपने- अपने घर चले। कुछ लोग उसके पीछे-पीछे उस वृक्ष तक आये, जहाँ वह विश्राम करती थी। जब वह अपनी झोंपड़ी के द्वार पर पहुँची, तब सभी आदमी विदा हो चुके थे। केवल एक आदमी झोंपड़ी से कई हाथ पर चुपचाप खड़ा था।

लैला ने पूछा-तुम कौन हो?

नादिर ने कहा- तुम्हारा गुलाम नादिर।

लैला- तुम्हें मालूम नहीं कि मैं अपने अमन के गोशे में किसी को नहीं आने देती?

नादिर- यह तो देख ही रहा हूँ।