एक सप्ताह तक नादिर दरबार में न आया, न किसी कर्मचारी को अपने पास आने की आज्ञा दी। दिन के-दिन अंदर पड़ा सोचा करता कि क्या करूँ? नाम- मात्र को कुछ खा लेता। लैला बार-बार उसके पास जाती और कभी उसका सिर अपनी जाँघ पर रखकर, कभी उसके गले में बांहें डालकर छूती-तुम क्यों इतने उदास और मलिन ही! नादिर उसे देखकर रोने लगता, पर मुँह से कुछ न कहता। यश या लैला, यही उसके सामने कठिन समस्या थी। उसके हृदय में भीषण द्वन्द्व मचा रहता और यह कुछ निश्चय न कर सकता था। यश प्यारा था, पर लैला उससे भी प्यारी थी। वह बदनाम होकर जिंदा रह सकता था, पर लैला के बिना वह जीवन की कल्पना ही न कर सकता था। लैला उसके रोम-रोम में व्याप्त थी।
अन्त में उसने निश्चय कर लिया- लैला मेरी है, मैं लैला का हूँ। न मैं उससे अलग, न वह मुझसे जुदा। जो कुछ वह करती है, मेरा है, जो कुछ मैं करता हूँ उसका है। यहाँ मेरा और तेरा भेद ही कहाँ? बादशाहत नश्वर है, प्रेम अमर। हम अनंत काल तक एक-दूसरे के पहलू में बैठे हुए स्वर्ग के सुख भोगेंगे। हमारा प्रेम अनंत काल तक आकाश में तारे की भांति चमकेगा।
नादिर प्रसन्न होकर उठा। उसका मुख-मंडल विजय की लालिमा से रंजित हो रहा था। आँखों में शौर्य टपका पड़ता था। वह लैला के प्रेम का प्याला पीने जा रहा था, जिसे एक सप्ताह से उसने मुँह नहीं लगाया था। उसका हृदय उसी उमंग से उछल पड़ता था जो आज से पाँच साल पहले उठा करती थीं। प्रेम की नींद कभी नहीं उतरती।
लेकिन लैला की आरामगाह के द्वार बंद थे और उसका डफ जो द्वार पर नित्य एक खूंटी से लटका रहता था, गायब था। नादिर का कलेजा सन्न-से हो गया। द्वार बंद रहने का आशय तो यह हो सकता था कि लैला बाग में होगी, लेकिन डफ कहीं गया? सम्भव है, डफ लेकर बाग में गयी हो, लेकिन यह उदासी क्यों छायी है? यह हसरत क्यों बरस रही है?
नादिर ने काँपते हुए हाथों से द्वार खोल दिया। लैला अंदर न थी। पलँग बिछा हुआ था, शमा जल रही थी, वजू का पानी रखा था। नादिर के पाँच थर्राने लगे। क्या लैला रात को भी नहीं सोयी? कमरे की एक-एक वस्तु में लैला की याद थी, उसकी तसवीर थी, उसकी महक थी, लेकिन लैला न थी। मकान सूना मालूम होता था, ज्योतिहीन नेत्र।
नादिर का दिल भर गया। उसकी हिम्मत न पड़ी कि किसी से कुछ पूछे। हृदय इतना कातर हो गया कि हतबुद्धि की भांति वहीं फर्श पर बैठकर बिलख- बिलख कर रोने लगा। जब जरा आंसू थमे, तब उसने बिस्तर को सूंघा कि शायद लैला के स्पर्श की कुछ गंध आये, लेकिन खस और गुलाब की महक के सिवा और कोई सुगंध न थी।
सहसा उसे तकिए के नीचे से बाहर निकला हुआ एक कागज का टुकड़ा दिखाई दिया। उसने एक हाथ से कलेजे को सँभालकर टुकड़ा निकाल लिया और सहमी हुई आँखों से उसे देखा। एक निगाह में सब कुछ मालूम हो गया। वह नादिर की किस्मत का फैसला था। नादिर के मुँह से निकला, हाय लैला! और वह मूर्च्छित होकर जमीन पर गिर पड़ा। लैला ने पुर्जे में लिखा था-’मेरे प्यारे नादिर, तुम्हारी लैला तुमसे जुदा होती है। हमेशा के लिए। मेरी तलाश मत करना, तुम मेरा सुराग न पार्ओगे। मैं तुम्हारी मुहब्बत की लौंडी थी, तुम्हारी बादशाहत की भूखी नहीं। आज एक हफ्ते से देख रही हूँ तुम्हारी निगाह फिरी हुई है। तुम मुझसे नहीं बोलते, मेरी तरफ आंख उठाकर नहीं देखते। मुझसे बेजार रहते हो। मैं किन-किन अरमानों से तुम्हारे पास जाती हूँ और कितनी मायूस होकर लौटती हूँ इसका तुम अन्दाज नहीं कर सकते। मैंने इस सजा के लायक कोई काम नहीं किया। और जो कुछ किया है, तुम्हारी ही भलाई के खयाल से। एक हफ्ता मुझे रोते गुजर गया। मुझे मालूम हो रहा है कि अब मैं तुम्हारी नजरों से गिर गई, तुम्हारे दिल से निकाल दी गई। आह! ये पाँच साल हमेशा याद रहेंगे, हमेशा तड़पाते रहेंगे! यही डफ लेकर आयी थी, वही लेकर जाती हूँ। पाँच साल मुहब्बत के मजे उठाकर जिंदगी-भर के लिए हसरत का दास लिए जाती हूँ, लैला मुहब्बत की लौंडी थी, जब मुहब्बत न रही, तब लैला क्यों कर रहती? रुख़सत!’
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