Laila by munshi premchand
Laila by munshi premchand

पूरा साल गुजर गया। लैला और नादिर देश-विदेश की खाक छानते फिरते थे। समरकन्द और बुखाना, बगदाद और हलब, काहरा और अदन, ये सारे देश उन्होंने छान डाले। लैला का डफ फिर जादू करने लगा, उसकी आवाज सुनते ही शहर में हलचल मच जाती, आदमियों का मेला लग जाता, आवभगत होने लगती, लेकिन ये दोनों यात्री कहीं एक दिन से अधिक न ठहरते थे। न किसी से कुछ माँगते, न किसी के द्वार पर जाते। केवल रूखा-सूखा भोजन कर लेते और कभी किसी वृक्ष के नीचे, कभी किसी पर्वत की गुफा में और कभी सड़क के किनारे रात काट देते थे।

संसार के कठोर व्यवहार ने उन्हें विरक्त कर दिया था, उसके प्रलोभन से कोसों भागते थे। उन्हें अनुभव हो गया था कि यहाँ जिसके लिए प्राण अर्पण कर दो, वही अपना शत्रु हो जाता है, जिसके साथ भलाई करो, वही बुराई पर कमर बाँधता है, यहाँ किसी से दिल न लगाना चाहिए। उनके पास बड़े-बड़े रईसों के निमन्त्रण आते, उन्हें एक दिन अपना मेहमान बनाने के लिए लोग हजारों मिन्नतें करते, पर लैला किसी की न सुनती थी। नादिर को अब तक कभी-कभी बादशाहत की सनक सवार हो जाती, वह चाहता कि गुप्त रूप से शक्ति-संग्रह करके तेहरान पर चढ़ जाऊं और बागियों को परास्त करके अखंड राज्य करूँ, पर लैला की उदासीनता देखकर उसे किसी से मिलने-जुलने का साहस न होता था। लैला उसकी प्राणेश्वरी थी, यह उसी के इशारों पर चलता था।

उधर ईरान में भी अराजकता फैली हुई थी। जनसत्ता से तंग आकर रईसों ने भी फौजें जमा कर ली थी और दोनों दलों में आये दिन संग्राम होता रहता था। पूरा साल गुजर गया और खेत न जुते-, देश में भीषण अकाल पड़ा हुआ था, व्यापार शिथिल था, खजाना खाली। दिन-दिन जनता की शक्ति घटती जाती थी और रईसों का जोर बढ़ता जाता था। आखिर यहाँ तक नौबत पहुँची कि जनता ने हथियार डाल दिये और रईसों ने राज्य-भवन पर अपना अधिकार जमा लिया। प्रजा के नेताओं को फाँसी दे दी गई, कितने ही कैद कर लिये गए और जनसत्ता का अंत हो गया। शक्तिवादियों को अब नादिर की याद आयी। यह बात अनुभव से सिद्ध हो गई थी कि देश में प्रजातन्त्र स्थापित करने की क्षमता का अभाव है। प्रत्यक्ष के लिए प्रमाण की जरूरत न थी। इस अवसर पर राजसत्ता ही देश का उद्धार कर सकती थी। यह भी मानी हुई बात थी, लैला और नादिर को जनसत्ता से विशेष प्रेम न होगा। वे सिंहासन पर बैठकर रईसों ही के हाथ में कठपुतली बने रहेंगे, और रईसों को प्रजा पर मनमाने अत्याचार करने का अवसर मिलेगा । अतएव आपस में लोगों ने सलाह की और प्रतिनिधि नादिर को मना लाने के लिए रवाना हुए।

संध्या का समय था। लैला और नादिर दमिश्क में एक वृक्ष के नीचे बैठे हुए थे। आकाश पर लालिमा छायी हुई थी और उससे मिली हुई पर्वत मालाओं की श्याम रेखा ऐसी मालूम हो रही थी, मानो कमल-दल मुरझा गया हो। लैला उल्लसित नेत्रों से प्रकृति की यह शोभा देख रही थी। नादिर मलिन और चिन्तित भाव से लेटा हुआ सामने सुदूर प्रान्त की ओर तृषित नेत्रों से देख रहा था, मानो इस जीवन से तंग आ गया है।

सहसा बहुत दूर गर्द उड़ती हुई दिखाई दी, और एक क्षण में ऐसा मालूम हुआ कि कुछ आदमी घोड़ों पर सवार चले आ रहे हैं। नादिर उठ बैठा और गौर से देखने लगा कि ये कौन आदमी हैं। अकस्मात् वह उठकर खड़ा हो गया। उसका मुख-मण्डल दीपक की भांति चमक उठा। जर्जर शरीर में एक विचित्र स्फूर्ति दौड़ गई। वह उत्सुकता से बोला- लैला, ये तो ईरान के आदमी हैं, कलामे-पाक की कसम, ये ईरान के आदमी हैं। इनके लिबास से साफ जाहिर हो रहा है।

लैला ने भी उन यात्रियों की ओर देखा और चिंतित होकर बोली- अपनी तलवार सँभाल लो, शायद उसकी जरूरत पड़े।

नादिर- नहीं लैला, ईरान के लोग इतने कमीने नहीं हैं कि अपने बादशाह पर तलवार उठाएँ।

लैला- पहले मैं भी यही समझती थी।

सवारों ने समीप आकर घोड़े रोक लिये और उतरकर बड़े अदब से नादिर को सलाम किया। नादिर बहुत जब्त करने पर भी अपने मनोवेग को न रोक सका, दौड़कर उनके गले से लिपट गया। वह अब बादशाह न था, ईरान का एक मुसाफिर था। बादशाहत मिट गई थी, पर इंसानियत रोम-रोम में भरी हुई थी। वे तीनों आदमी इस समय ईरान के विधाता थे। इन्हें वह खूब पहचानता था। उनकी स्वामिभक्ति की कई बार परीक्षा ले चुका था। उन्हें लाकर अपने बोरे पर बैठाना चाहा, लेकिन वे जमीन ही पर बैठे। उनकी दृष्टि में वह बोरा इस समय सिंहासन था, जिस पर अपने स्वामी के सम्मुख वे कदम न रख सकते थे। बातें होने लगीं। ईरान की दशा अत्यन्त शोचनीय थी। लूट-भार का बाजार गर्म था, न कोई व्यवस्था थी, न व्यवस्थापक थे। अगर यही दशा रही, तो शायद बहुत जल्द उसकी गर्दन में पराधीनता का जुआ पड़ जाये। देश अब नादिर को ढूँढ रहा था। उसके सिवा कोई दूसरा उस डूबते हुए बेड़े को पार न लगा सकता था। इसी आशा से ये लोग उसके पास आये थे।

नादिर ने विरक्त भाव से कहा- एक बार इज्जत ली, क्या अबकी जान लेने की सोची है? मैं बड़े आराम से हूँ। आप मुझे परेशान न करें।

सरदारों ने आग्रह करना शुरू किया- हम हुजूर का दामन न छोड़ेंगे, यहाँ अपनी गर्दनों पर छुरी फेरकर हुजूर के कदमों पर जान दे देंगे। जिन बदमाशों ने आपको परेशान किया था, अब उनका कहीं निशान भी नहीं रहा, हम लोग उन्हें फिर कभी सिर न उठाने देंगे, सिर्फ हुजूर की आड़ चाहिए।

नादिर ने बात काटकर कहा- साहबों, अगर आप मुझे इस इरादे से ईरान का बादशाह बनाना चाहते हैं, तो माफ करिए। मैंने इस सफर में रिआया की हालत का गौर से मुलाहजा किया है और इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि सभी मुल्कों से उनकी हालत खराब है। वे रहम के काबिल हैं। ईरान में मुझे कभी ऐसे मौके न मिले थे। मैं रिआया को अपने दरबारियों की आँखों से देखता था। मुझसे आप लोग यह उम्मीद न रखें कि रिआया को लूटकर आपकी जेबें भरूंगा। यह अजाब अपनी गर्दन पर नहीं ले सकता। मैं इनसाफ का मीजान बराबर रखूँगा और इसी शर्त पर ईरान चल सकता हूँ।

लैला ने मुस्कुराकर कहा- तुम रिआया का कसूर माफ कर सकते हो, क्योंकि उसकी तुमसे कोई दुश्मनी न थी। उसके दाँत तो मुझ पर थे। मैं उसे कैसे माफ कर सकती हूँ?

नादिर ने गम्भीर भाव से कहा- लैला, मुझे यकीन नहीं आता कि तुम्हारे मुँह से ऐसी बातें सुन रहा हूँ।

लोगों ने समझा, अभी इन्हें भड़काने की जरूरत ही क्या है। ईरान में चलकर देखा जायेगा। दो-चार मुखबिर से रिआया के नाम पर ऐसे उपद्रव खड़े करा देंगे कि इनके ये सारे खयाल पलट जायेंगे। एक सरदार ने अर्ज़ की- माजल्लाह! हुजूर क्या फरमाते हैं? क्या हम इतने नादान हैं कि हुजूर को इंसाफ के रास्ते से हटाना चाहेंगे? इंसाफ ही बादशाह का जौहर है और हमारी दिली आरजू है कि आपका इनसाफ नौशेरबां को भी शर्मिन्दा कर दे। हमारी मंशा सिर्फ यह थी कि आइंदा से हम रिआया को कभी ऐसा मौका न देंगे कि वह हुजूर की शान में बेअदबी कर सके। हम अपनी जानें हुजूर पर निसार करने के लिए हाजिर रहेंगे।

सहसा ऐसा मालूम हुआ कि सारी प्रकृति संगीतमय हो गई है। पर्वत और वृक्ष, तारे और चाँद, वायु और जल, सभी एक स्वर से गाने लगे। चाँदनी की निर्मल छटा में, वायु के नीरव प्रहार में संगीत की तरंगें उठने लगीं। लैला अपना डफ बजा-बजाकर गा रही थी। आज मालूम हुआ, ध्वनि ही सृष्टि का मूल है। पर्वतों पर देवियाँ निकल-निकलकर नाचने लगीं, आकाश पर देवता नृत्य करने लगे। संगीत ने एक नया संसार रच डाला।

उसी दिन से जब कि प्रजा ने राजभवन के द्वार पर उपद्रव मचाया था और लैला के निर्वासन पर आग्रह किया था, लैला के विचारों में क्रान्ति हो गई थी। जन्म से ही उसने जनता के साथ सहानुभूति करना सीखा था। वह राज कर्मचारियों को प्रजा पर अत्याचार करते देखती थी और उसका कोमल हृदय तड़प उठता था। तब धन, ऐश्वर्य और विलास से उसे घृणा होने लगती थी, जिसके कारण प्रजा को इतने कष्ट भोगने पड़ते हैं। वह अपने में किसी ऐसी शक्ति का आह्वान करना चाहती थी, जो आततायियों के हृदय में दया और प्रजा के हृदय में अभय का संचार करे।

उसकी बाल-कल्पना उसे एक सिंहासन पर बिठा देती, जहाँ यह अपनी न्याय- नीति से संसार में युगान्तर उपस्थित कर देती। कितनी रातें उसने यही स्वप्न देखने में काटी थी। कितनी बार वह अन्याय-पीड़ितों के सिरहाने बैठकर रोयी थी, लेकिन जब एक दिन ऐसा आया कि उसके स्वर्ण-स्वप्न आंशिक रीति से पूरे होने लगे, तब उसे एक नया और कठोर अनुभव हुआ। उसने देखा कि प्रजा इतनी सहनशील, इतनी दीन और दुर्बल नहीं है, जितना वह समझती थी। इसकी अपेक्षा उसमें ओछेपन, अविचार और अशिष्टता की मात्रा कहीं अधिक थी। वह सद्व्यवहार की कद्र करना नहीं जानती, शक्ति पाकर उसका सदुपयोग नहीं कर सकती। उसी दिन से उसका दिल जनता से फिर गया था।

जिस दिन नादिर और लैला ने फिर तेहरान में पदार्पण किया, सारा नगर उनका अभिवादन करने के लिए निकल पड़ा। शहर पर आतंक छाया हुआ था, चारों ओर से करुण रुदन की ध्वनि सुनाई देती थी। अमीरों के मुहल्ले में श्री लोटती-फिरती थी, गरीबों के मुहल्ले उजड़े हुए थे। उन्हें देखकर कलेजा फटा जाता था। नादिर रो पड़ा, लेकिन लैला के ओठों पर निष्ठुर, निर्दय हास्य अपनी छटा दिखा रहा था।

नादिर के सामने अब एक विकट समस्या थी। वह नित्य देखता कि मैं जो करना चाहता हूँ वह नहीं होता और जो नहीं करना चाहता, वह होता है, और इसका कारण लैला है, पर कुछ कह न सकता था। लैला उसके हर एक काम में हस्तक्षेप करती रहती थी। वह जनता के उपकार और उद्धार के लिए जो विधान करता, लैला उसमें कोई-न-कोई विघ्न अवश्य डाल देती, और उसे चुप रह जाने के सिवा और कुछ न सूझता। लैला के लिए उसने एक बार राज्य का त्याग कर दिया था। तब आपत्ति-काल ने लैला की परीक्षा न की थी। इतने दिनों की विपत्ति में उसे लैला के चरित्र का जो अनुभव प्राप्त हुआ था, वह इतना सुखद, इतना मनोहर, इतना सरस था कि वह लैला-मय हो गया था। लैला ही उसका स्वर्ग थी, उसके प्रेम में रत रहना ही उसकी परम अभिलाषा थी। इस लैला के लिए वह अब क्या कुछ न कर सकता था? प्रजा की और साम्राज्य की उसके सामने क्या हस्ती थी?

इस भांति तीन साल बीत गए, प्रजा की दशा दिन-दिन बिगड़ती ही गई।

एक दिन नादिर शिकार खेलने गया और साथियों से अलग होकर जंगल में भटकता फिरा, यहाँ तक कि रात हो गई और साथियों का पता न चला। घर लौटने का भी रास्ता न जानता था। आखिर खुदा करा नाम लेकर एक तरफ चला कि कहीं तो कोई गाँव या बस्ती का नाम-निशान मिलेगा। वहाँ रात-भर पड़ा रहूँगा। सवेरे लौट जाऊंगा। चलते-चलते जंगल के दूसरे सिरे पर उसे एक गाँव नजर आया, जिसमें मुश्किल से तीन-चार घर होंगे। हों, एक मस्जिद अलबत्ता बनी हुई थी। मस्जिद में एक दीपक टिमटिमा रहा था, पर किसी आदमी या आदमजाद का निशान न था। आधी रात से ज्यादा बीत चुकी थी, इसीलिए किसी को कष्ट देना भी उचित न था।

नादिर ने घोड़े को एक पेड़ से बाँध दिया और उसी मस्जिद में रात काटने की ठानी। वहाँ एक फटी-सी चटाई पड़ी हुई थी। उसी पर लेट गया। दिन-भर का थका था, लेटते ही नींद आ गई। मालूम नहीं, वह कितनी देर तक सोता रहा, पर किसी की आहट पाकर चौंका। क्या देखता है कि एक बूढ़ा आदमी बैठा नमाज पढ़ रहा है। नादिर को आश्चर्य हुआ कि इतनी रात गये, कौन नमाज पढ़ रहा है। उसे यह खबर न थी कि रात गुजर गयी और यह फजर की नमाज है। वह पड़ा-पड़ा देखता रहा। वृद्ध पुरुष ने नमाज अदा की, फिर वह छाती के सामने अंजलि जोड़कर खुदा से दुआ माँगने लगा। दुआ के शब्द सुनकर नादिर का खून सर्द हो गया। वह दुआ उसके राज्यकाल की ऐसी तीव्र, ऐसी वास्तविक, ऐसी शिक्षाप्रद आलोचना थी, जो आज तक किसी ने न की थी। उसे अपने जीवन में अपना अपयश सुनने का अवसर प्राप्त हुआ। वह यह तो जानता था कि मेरा शासन आदर्श नहीं है, लेकिन उसने कभी यह कल्पना न की थी कि प्रजा की विपत्ति इतनी असह्य हो गई है। दुआ यह थी-

‘ऐ खुदा! तू ही गरीबों का मददगार और बेकसों का सहारा है। तू इस जालिम बादशाह के जुल्म देखता है और तेरा कहर उस पर नहीं गिरता। यह बेदीन काफिर एक हसीन औरत की मुहब्बत में अपने को इतना भूल गया है कि न आँखों से देखता है, न कानों से सुनता है। अगर देखता है, तो उसी औरत की आँखों से, सुनता है तो उसी औरत के कानों से। अब यह मुसीबत नहीं सही जाती। या तो तू उस जालिम को जहन्नुम पहुँचा दे, या हम बेकसों को दुनिया से उठा ले। ईरान उसके जुल्म से तंग आ गया है और तू ही उसके सिर से इस बला को टाल सकता है।’

बूढ़े ने तो अपनी छड़ी सँभाली और चलता हुआ, लेकिन नादिर मृतक की भांति वहीं पड़ा रहा, मानो उस पर बिजली गिर पड़ी हो।