Laila by munshi premchand
Laila by munshi premchand

राज्य में तो यह अशान्ति फैली हुई थी, विद्रोह की आग दिलों में सुलग रही थी और राजभवन में प्रेम का शान्तिमय राज्य था, बादशाह और मलका दोनों प्रजा- सन्तोष की कल्पना में मग्न थे।

रात का समय था। नादिर और लैला अपनी आरामगाह में बैठे शतरंज की बाजी खेल रहे थे। कमरे में कोई सजावट न थी, केवल एक जाजिम बिछी हुई थी।

नादिर ने लैला का हाथ पकड़कर कहा- बस, अब यह ज्यादती नहीं, तुम्हारी चाल हो चुकी। यह देखो, तुम्हारा एक प्यादा पिट गया।

लैला- अच्छा, यह शह। आपके सारे पैदल रखे रह गए और बादशाह पर शह पड़ गई। इसी पर दावा था।

नादिर- तुम्हारे साथ हारने में जो मजा है, वह जीतने में नहीं।

लैला- अच्छा, तो गोया आप मेरा दिल खुश कर रहे हैं। शह बचाइए, नहीं दूसरी चाल में मात होती है।

नादिर-(अर्दब देकर) अच्छा, अब सँभल जाना, तुमने मेरे बादशाह की तौहीन की है। एक बार मेरा फर्जी उठा, तो तुम्हारे प्यादों का सफाया कर देगा।

लैला- वसत की भी खबर है! यह शह, लाइए। फर्जी अब कहिए। अबकी मैं न करूंगी, कहे देती हूँ। आपको दो बार छोड़ दिया, अबकी हरगिज न छोड़ूंगी।

नादिर-जब तक मेरे पास मेरा दिलराम (घोड़ा) है, बादशाह को कोई गम नहीं।

लैला- अच्छा, यह शह? लाइए अपने दिलराम को! कहिए, अब तो मात हुई?

नादिर- हाँ जानेमन, अब मात हो गई। जब मैं ही तुम्हारी अदाओं पर निसार हो गया, तब मेरा बादशाह कब बच सकता था?

लैला- बातें न बनाइए, चुपके से इस फरमान पर दस्तखत कर दीजिए, जैसा आपने वादा किया था।

यह कहकर लैला ने एक फरमान निकाला, जिसे उसने खुद अपने मोती के से अक्षरों में लिखा था। इसमें अच्छा का आयात-कर घटाकर आधा कर दिया गया था। लैला प्रजा को भूली न थी, वह अब भी उनकी हित-कामना में संलग्न रहती थी। नादिर ने इस शर्त पर फरमान पर दस्तखत करने का वचन दिया था कि लैला उसे शतरंज में तीन बार मात करे। वह सिद्धहस्त खिलाड़ी था, उसे लैला जानती थी, पर यह शतरंज की बाजी न थी, केवल विनोद था। नादिर ने मुस्कुराते हुए फरमान पर हस्ताक्षर कर दिये। कलम के एक चिह्न से प्रजा को पाँच करोड़ वार्षिक कर्ज से मुक्ति हो गई। लैला का मुख गर्व से आसक्त हो गया। जो काम बरसों के आंदोलन से न हो सकता था, वह प्रेम-कटाक्षों से कुछ ही दिनों में पूरा हो गया।

यह सोचकर वह फूली न समाती थी कि जिस वक्त यह फरमान सरकारी पत्रों में प्रकाशित हो जायेगा और व्यवस्थापिका सभा में लोगों को इसके दर्शन होंगे, उस वक्त प्रजावादियों को कितना आनन्द होगा। लोग मेरा यश जाएंगे और मुझे आशीर्वाद देंगे।

नादिर प्रेम-मुग्ध होकर उसके चन्द्रमुख की ओर देख रहा था, मानो उसका वश होता तो सौंदर्य की इस प्रतिमा को हृदय में बिठा लेता।

सहसा राज्य-भवन के द्वार पर शोर मचने लगा। एक क्षण में मालूम आ कि जनता का टीड्डी दल, अस्त्र-शस्त्र से संतुलित, राजद्वार पर खड़ा दीवारों की तोड़ने की चेष्टा कर रहा है। प्रतिक्षण शोर बढ़ता जाता था और ऐसी आशंका होती थी कि क्रोधोन्मत्त जनता द्वारों को तोड़कर भीतर घुस आयेगी। फिर ऐसा मालूम हुआ कि कुछ लोग सीढ़ियां लगाकर दीवार पर चढ़ रहे हैं। लैला लज्जा और ग्लानि से सिर झुकाए खड़ी थी। उसके मुख से एक शब्द भी न निकलता था। क्या यही वह जनता है, जिसके कष्टों की कथा कहते हुए उसकी वीणा उन्मत्त हो जाती थी? यही यह अशक्त, दलित, क्षुधा-पीड़ित, अत्याचार की वेदना से तड़पती हुई जनता है, जिस पर वह अपने को अर्पण कर चुकी थी?

नादिर भी मौन खड़ा था, लेकिन लज्जा से नहीं क्रोध से। उसका मुख तमतमा उठा था, आँखों से चिनगारियाँ निकल रही थी, बार-बार होंठ दबाता और तलवार के कब्जे पर हाथ रखकर रह जाता था। वह बार-बार लैला की ओर संतप्त नेत्रों से देखता था। जरा से इशारे की देर थी। उसका हुक्म पाते ही उसकी सेना इस विद्रोही दल को यों भगा देगी, जैसे आँधी पत्तों को उड़ा देती है। पर लैला से आँखें न मिलती थी।

आखिर वह अधीर होकर बोला- लैला, मैं राज-सेना को बुलाना चाहता हूँ। क्या कहती हो?

लैला ने दीनतापूर्ण नेत्रों से देखकर कहा- जरा ठहर जाइए, पहले इन लोगों से पूछिए कि चाहते क्या हैं?

यह आदेश पाते ही नादिर छत पर चढ़ गया, लैला भी उसके पीछे ऊपर आ पहुँची। दोनों अब जनता के सम्मुख आकर खड़े हो गए। मशालों के प्रकाश में लोगों ने उन दोनों को छत पर खड़े देखा, मानो आकाश से देवता उतर आये हों, सहस्रों कण्ठों से ध्वनि निकली-यह खड़ी है, वह खड़ी है, लैला यह खड़ी है! यह वह जनता थी, जो लैला के मधुर संगीत पर मस्त हो जाया करती थी।

नादिर ने उच्च स्वर से विद्रोहियों को सम्बोधित किया- ऐ ईरान की बदनसीब रिआया! तुमने शाही महल को क्यों घेर रखा है? क्यों बगावत का झण्डा खड़ा किया है। क्या मेरा और अपने खुदा का बिलकुल खौफ नहीं? क्या तुम नहीं जानते कि अपनी आँखों के एक इशारे से तुम्हारी हस्ती को खाक में मिला सकता हूँ। मैं तुम्हें हुक्म देता हूँ कि एक लम्हे के अन्दर यहाँ से चले जाओ, वरना कलामे-पाक की कसम, मैं तुम्हारे खून की नदी बहा दूँगा।

एक आदमी ने, जो विद्रोहियों का नेता मालूम होता था, सामने आकर कहा- हम उस वक्त तक न जायेंगे, जब तक शाही महल लैला से खाली न हो जायेगा।

नादिर ने बिगड़ कर कहा- ओ नाशुक्र, खुदा से डरो! तुम्हें अपनी मलका की शान में ऐसी बेअदबी करते हुए शर्म नहीं आती! जब से लैला तुम्हारी मलका हुई है, उसने तुम्हारे साथ कितनी रिआयतें की हैं! क्या उन्हें तुम बिलकुल भूल गए? जालिमों, यह मलका है, पर वही खाना खाती है, जो तुम कुत्तों को खिला देते हो, वही कपड़े पहनती है, जो तुम फकीरों को दे देते हो। आकर महलसरा में देखो, तुम इसे अपने झोपड़ों ही की तरह तकल्लुफ और सजावट से खाली पाओगे। लैला तुम्हारी मलका होकर भी फकीरों की जिन्दगी बसर करती है, तुम्हारी खिदमत में हमेशा मस्त रहती है। तुम्हें उसके कदमों की खाक माथे पर लगानी चाहिए, आँखों का सुरमा बनाना चाहिए। ईरान के तख्त पर कभी ऐसी गरीबों पर जान देने वाली, उनके दर्द में शरीक होनेवाली, गरीबों पर अपने को निसार करने वाली मलका ने कदम नहीं रखे और उसकी शान में तुम ऐसी बेहूदा बातें करते हो! अफसोस! मुझे मालूम हो गया कि तुम जाहिल, इनसानियत से खाली और कमीने हो। तुम इसी काबिल हो कि तुम्हारी गर्दन, कुंद छुरी से काटी जायें, तुम्हें पैरों तले रौंदा जाये।

नादिर ने बात भी पूरी न कर पायी थी कि विद्रोहियों ने एक स्वर से चिल्लाकर कहा- लैला, लैला हमारी दुश्मन है, हम उसे अपनी मलका की सूरत में नहीं देख सकते।

नादिर ने जोर से चिल्लाकर कहा- जालिमों, जरा खामोश हो जाओ, यह देखो वह फरमान है, जिस पर लैला ने अभी-अभी मुझसे जबरदस्ती दस्तखत कराए हैं। आज से गल्ले का महसूल घटाकर आधा कर दिया गया है और तुम्हारे सिर से महसूल का बोझ पाँच करोड़ कम हो गया है।

हजारों आदमियों ने शोर मचाया- यह महसूल बहुत पहले बिलकुल माफ हो जाना चाहिए था। हम एक कौड़ी नहीं दे सकते। लैला, लैला, हम उसे अपनी मलका की सूरत में नहीं देख सकते।

अब बादशाह क्रोध से काँपने लगा। लैला ने सजल नेत्र होकर कहा- अगर रिआया की यही मरजी है कि मैं फिर डफ बजा-बजाकर गाती फिरूं तो मुझे कोई उज्र नहीं। मुझे यकीन है कि मैं अपने गाने से एक बार फिर इनके दिल पर हुकूमत कर सकती हूँ।

नादिर ने उत्तेजित होकर कहा- लैला, मैं रिआया की तुनुकमिजाजियों का गुलाम नहीं। इससे पहले कि मैं तुम्हें अपने पहलू से जुदा करूँ, तेहरान की गलियाँ खून से लाल हो जायेंगी। मैं इन बदमाशों को इनकी शरारत का मजा चखाता हूं।

नादिर ने मीनार पर चढ़कर खतरे का घंटा बजाया। सारे तेहरान में उसकी आवाज गूंज उठी, पर शाही फौज का एक भी सिपाही न नजर आया।

नादिर ने दोबारा घंटा बजाया, उसका- आकाश-मंडल उसकी झंकार से कम्पित हो गया, तारागण काँप उठे, पर एक भी सैनिक न निकला।

नादिर ने तब तीसरी बार घंटा बजाया, पर उसका भी उत्तर केवल एक क्षीण प्रतिध्वनि ने दिया, मानो किसी मरने वाले की अन्तिम प्रार्थना के शब्द हों।

नादिर ने माथा पीट लिया। समझ गया कि बुरे दिन आ गए। अब भी लैला को जनता के दुराग्रह पर बलिदान करके वह अपनी राजसत्ता की रक्षा कर सकता था, पर लैला उसे प्राणों से प्रिय थी। उसने छत पर आकर लैला का हाथ पकड़ लिया और उसे लिये हुए सदर फाटक से निकला। विद्रोहियों ने एक विजय-ध्वनि के साथ उनका स्वागत किया, पर सब-के-सब किसी गुप्त प्रेरणा के वश रास्ते से हट गए।

दोनों चुपचाप तेहरान की गलियों में होते हुए चले जाते थे। चारों ओर अन्धकार था। दुकानें बंद थीं। बाजारों में सन्नाटा छाया हुआ था। कोई घर से बाहर न निकलता था। फकीरों ने भी मस्जिदों में पनाह ले ली थी। पर इन दोनों प्राणियों के लिए कोई आश्रय न था! नादिर की कमर में तलवार थी, लैला के हाथ में डफ था। यही उनके विशाल ऐश्वर्य का विलुप्त चिह्न था।