बुरा हो इस मुए कोरोना का, जिसने शादियों का रंग-रूप ही बदल दिया। कोरोना से पहले क्या शादियां हुआ करती थी। वाह! पर हाय रे कोरोना अब न वो दिखावे की शादियां रही न शादियों का दिखावा। बिना दिखावे भी कोई शादी हो सकती है भला। दूल्हा दुल्हन को मिलाकर केवल पचास लोग। पचास लोग क्या दिखाएंगे और क्या देखेंगे।  

वो भी क्या दिन थे जब किसी पुस्तिका की शक्ल में निमंत्रण पत्रिका छपती थी, जिसमें शादी से पहले और बाद में होने वाले तमाम कार्यक्रमों की लिस्ट होती थी। इसकी मेजबानों की लिस्ट में परिवार के सबसे छोटे सदस्य से लेकर सबसे बड़े सदस्य का नाम छपा होता था। यह निमंत्रण पत्रिका इतने लोगों में बांटी जाती, जिससे शादी वाले दिन समारोह स्थल पर मेले जैसा दृश्य बन सके। शादी में जितनी भीड़ उतना दिखावा, जितना दिखावा उतनी शादी सक्सेसफुल। अब जब केवल पचास लोगों को ही बुलाना है तो व्हाट्सऐप्प पर भी निमंत्रण भेजा जा सकता है। नो दिखावा, ओनली बुलावा।

शादी के कई दिनों पहले प्री वेडिंग शूटिंग शुरू हो जाती थी, जो शादी की अंतिम रस्म तक चलती थी। इसके बाद इस शूटिंग का एडिटिंग और उसके बाद सभी मेहमानों और घर आने वालों के लिए सीधा प्रसारण, शूटिंग का दिखावा। अब तो कुल जमा एक दिन की शादी की ही शूटिंग होती है। इसमें दिखावे का ज्यादा स्कोप नहीं रहता।

कुंडली मिलान से ही पंडितजी के फेरे घर में शुरू हो जाते। कभी ये पूजा तो कभी वो रस्म ताकि सबकुछ निर्विघ्न संपन्न हो। पर अब तो पंडितजी भी एक दिन के कॉम्बो ऑफर में सारे विधि-विधान और रस्में निपटा लेते हैं। पंडितजी भी शार्ट कट में जो जरूरी हो वही करते हैं। नो दिखावा।

शादी के कई दिन पहले से रस्में शुरू हो जाती थी, जिनमें मेहंदी की रस्म प्रमुख होती थी। शादी के दिन का माहौल देखते ही बनता था। परिवार के सभी सदस्य किसी एक ‘थीम’ के हिसाब से कपड़े पहनते थे। सभी पुरुष साफा बांधे होते थे। कोई फूफा इसलिए नाराज हो जाया करता था कि सबसे पहले उसे साफा क्यों नहीं बांधा। महिलाएं भी एक ही प्रकार की वेशभूषा में दिखती थीं। अब जब घर से बाहर ही नहीं निकलना तो काहे की थीम।

बैंड बाजे तो शादी की जान हुआ करते थे। एक ढोलक वाला कई दिनों तक परमानेंट शादी वाले घर पर तैनात रहता था। जैसे ही बजाने का इशारा होता। वह शुरू हो जाता। बैंड वालों की टीम में ही पचास लोग होते थे और डांस करने वाले पचास। जब बारात सड़क से गुजरती थी तो हर फर्लांग पर नागिन डांस करते हुए बारात कछुए की गति से आगे सरकती थी। अब तो पता नहीं बैंड वालों को नागिन की धुन बजाना याद भी है या नहीं। डांस करने वाले नागिन डांस करते-करते नेवला डांस न करने लगें। आखिर कई महीनों से दोनों की प्रैक्टिस नहीं हुई है।

यही हाल कैटरर्स का भी था। उसकी टीम में ही पचास लोगों से ज्यादा रहते थे। कई एकड़ के आलिशान गार्डन में पचासों टेबलों पर सैकड़ों पकवान सजा कर रखे जाते थे। हजारों की संख्या में सजे धजे लोग हाथ में लिफाफे लिए एक गार्डन से दूसरे गार्डन आते जाते थे, जिसके पास जितने निमंत्रण उसका उतना बड़ा दिखावा। अब तो कई शादियां घर में ही निपटा दी जाती हैं।

शादी के दिन वरमाला और फिर फेरे में रात के दो कब बज जाते पता ही नहीं चलता था। दुल्हन के बहन-भाई मिलकर दूल्हे के जूते लेने के लिए जो छीना झपटी करते उसे देखकर मजा आ जाता था। उसके बाद जूते लौटाने के लिए दूल्हे के साले सालियां मिलकर दूल्हे को लूट ही लेते थे। अब तो कर्फ्यू के साये में घड़ी की सुई देखकर सभी रस्में निभाई जाती हैं।

शादी के बाद सभी मेहमान अपने घर निकल जाते पर कई मेहमान शादी के कई दिनों बाद तक घर में जमे रहते थे। उन्हें देखकर मन में आता कि अब शादी निपट चुकी है ‘हे अतिथि देव, तुम कब जाओगे’ अब तो मेहमान जितनी जल्दी हो सके अपने घर भागते हैं।

शादियों से कमाने खाने वालों को भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि ये ‘केवल पचास’ वाला प्रतिबंध अब जल्दी समाप्त हो और शादियों की रौनक फिर से लौटे। फिर गार्डन सजे। फिर बैंड बाजे बजे। फिर नागिन डांस हो और सड़क पर ट्रैफिक जाम हो। फिर सैकड़ों पकवानों की खुशबु लौटे। फिर दूल्हा-दुल्हन के ब्यूटी पार्लर से लौटने के इंतजार में मेहमान रुकें। फिर शादी का दिखावा हो और दिखावे की शादी शुरू हो।

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