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परिक्रमा-21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां पंजाब: Long Story in Hindi
Parikrama

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Long Story in Hindi: सुबह उठते ही बैल समान बोझिल हुए सिर को नल की धारा तले रखा और आंखों पर पानी के कई छींटे मारे। पता नहीं उन्नींद के कारण या रात को रोते रहने के कारण आंखों की पतलियां अभी भी सजी हई लग रही थीं। इसलिए मैंने आंखों को मल कर धोने की कोशिश की। कई बार आंखों को झपका कर देखा लेकिन सुबह की लौ धुंधली ही दिखाई दी।

अपने कमरे में खडे हो. मैंने कल की घटी घटनाओं के बारे में सोचा. जिसका कोई सिरा मेरे हाथ में नहीं आ रहा था। कमरे के अंदर दिन चढ़ने का उजास तो है परन्त बाहर जैसी सफेद रोशनी नहीं। जिसे देख कर मेरी आंखें चुंधिया रही हैं। इसलिए बाहर की ओर पीठ कर, मैं कल की घटना के बारे में एकाग्र होकर सोचने लगा।

कमरे की दीवारों की सफेदी झड़ गई है और जगह-जगह पर सीलन के निशानों के कारण दीवारें बदरूप हो गई हैं। मेरी नजर घूमते हुए सामने अंगीठी पर जा पड़ी। जिस पर मां और बापू अपनी-अपनी फोटो फ्रेम में बैठे हैं। जिसे मैंने अभी कपड़े से साफ किया और उन दोनों पर सलीके से संयुक्त माला डाल दी। दोनों अपनी-अपनी जगह शांतचित बैठे हैं और उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान बिखरी हुई है। बाएं हाथ जोगिया रंग की पगड़ी बांधे बापू तिरछी निगाह से एक ओर देख रहा है। वह इसी प्रकार सामने वाले से नजर घुमा कर रखता था। बस ध्यान अपने काम की ओर और मुंह से सभी के लिए हाजिर जवाब।

मुझे जब भी बापू की याद आती, मेरा मन भर आता, बहुत जल्दी चला गया था वह सब कछ बीच में अधरा छोड कर। बाप को बिच्ची खरोडेवाले (चिकन-सूप) के तौर पर हर कोई जानता था। माया सिनेमा की दीवार के साथ रेहड़ी लगाता था वह। जहां वह लगातार ग्राहकों से घिरा रहता था। अधिकतर रिक्शेवाले और अन्य दिहाड़ीदार बापू के ग्राहक थे। जो सड़क किनारे बने फटपाथ कुटपाथ पर एक-दूसरे को देखते हुए घुटनों के बल बैठ कर. मांस की बोटियां खाते और चम्मच से शोरबा पीते हए दनिया-जहान की लुच्ची बातें करते और खूब हंसते थे। बापू मुझे भी कई बार एल्यूमीनियम की चिब्बी सी डोलची देकर सामने बैठे ग्राहकों को और शोरबा देने के लिए भेजता था। मुझे देखते ही सभी प्लास्टिक की बदरूप-सी प्लेटें एक-दूसरे से बढ़ कर मेरे आगे करने लगते। ‘देना दो चम्मच’ ‘देना दो चम्मच’ की रंग-बिरंगी आवाजें मुझे उलझा देतीं। मुझसे शोरबा प्लेट की बजाए इधर-उधर गिर जाता। यह देख कर बापू मुझे डपट देता, ‘कंजर के, हाथ सीधा नहीं रखा जाता। ध्यान से काम नहीं कर सकता तू।’ ‘बड़े होकर कौन-सा डीसी लगना था हमें। यही धंधे रास आते थे हमें।’ बापू ठीक कहता था। मैं ना डीसी बना, ना ही उस जैसा कुछ और। लेकिन बापू का धंधा मेरे लोट ना बैठा। बैठता भी कैसे, बापू तो खुद ही सब कुछ बीच रास्ते में छोड़ कर, चुपचाप ही चला गया। कड़कती दुपहर में रेहड़ी पर तनी तिरपाल के तले खड़े ही उसके दिमाग की नस फट गई थी। किसी डॉक्टर के पास जाने का अवसर ही ना मिला। पल-क्षण में ही सब कुछ खत्म हो गया। बापू के बिना हम डावांडोल हो गए। उजड़ गए थे घर से भी और बाहर से भी।

मां ने घर परिवार संभालने की पूरी कोशिश की। मुझे साथ लगा कर बापू का काम चलाने की। हम समय पर जा कर रेहड़ी लगाने लगे। मां हाथ-मुंह धोकर, बापू के स्थान पर खड़ी होती और कितनी देर तक हाथ जोड़, आंखें बंद कर, परमात्मा के आगे प्रार्थना करती। उसके होंठ हल्के-हल्के फड़कते। वह कानों को हाथ लगाती और धीरे से आंखें खोलती और दूर कहीं देखते हुए काम-धंधे की खैर मांगती। मैं लोबान की दो बत्तियां रेहड़ी के दो किनारों पर जला देता। हम दिन भर दौड़-दौड़ कर काम करते। ग्राहक भी बहुत आते परन्तु अब उनमें से कोई भी फुटपाथ पर नहीं बैठता था। सभी रेहड़ी के आस-पास झुरमुट डाल कर खड़े होकर तांक-झांक करते। उनकी बातें बेशर्मी की हदें पार कर जातीं। मैले दांतों से हंसते हुए वे बदमाश लगते। मां अपनी ओर से उनकी बातें अनसुनी करने की कोशिश करती। लेकिन वे और भी मचल जाते। मां कई बार किसी को प्लेट थमाते हुए जल-भुन कर कह भी देती, “भा-जी, वो सामने जाकर बैठो आराम से। कुछ और चाहिए तो लड़के को आवाज दे देना।” मां के हाथ से नखरे से प्लेट लेते हुए, कोई लचर-सा इशारा करते हुए अगला कहता, “अरे शाहणी! जो स्वाद गर्म खाने और तम्हें देखने का है. वो दर बैठने पर कहां आ सकता है। वहां बैठ कर कौन भडआ. गाडियों की चिल्लम-पों सने और धूल फांके।” मां कच्ची पड़ जाती। बाल्टी में जूठे बर्तन धोते हुए मेरे हाथ रुक जाते। मैं मां की ओर देखता। उसके पीछे खड़े कोई रिक्शेवाला उसकी कमर में उगुली चुभाते हुए रौब से कहता, “शाहणी! हमारी ओर भी देख ले, तेरे पीछे खड़े ही बूढ़े हो रहे हैं।” मां पसीना-पसीना हो जाती। वह माथे पर आए पसीने को पल्ले से पोंछने की कोशिश करती। उसके चेहरे पर शर्म और मायूसी की परत गहरी हो जाती और वह मुझसे आंख मिलाने पर भी झिझकने लगती। मां को इतना बेबस मैंने पहले कभी नहीं देखा था। काम करते हुए मेरे हाथ रुक जाते। रेहड़ी के आस-पास खी-खी करती भीड़ मुझे कुत्तों-सी प्रतीत होती। जिनसे मुझे नफरत होने लगी थी। इनकी जूठन धोने का मेरा रत्ती भर जी न चाहता। दिल करता, पत्थर मार कर इनमें दो-चार लोगों के सिर फोड़ दूं। बाकी के अपने आप सीधे हो जाएंगे। परन्तु मां ने मुझे ऐसा कुछ करने नहीं दिया। पता नहीं, उसने अंदर उफनती नफरत को भांप लिया था या फिर वह स्वयं ही इस जलालत से उकता और थक गई थी। इसलिए उसने रेहड़ी लगानी बंद कर दी।

जूठे लोगों और उनकी जूठ धोने से निजात दिलाई थी मां ने। मुझे मालूम था, रेहड़ी छोड़ने का फैसला लेना मां के लिए सरल नहीं था। वह कितने समय तक उन लोगों की अश्लील हरकतों और फिजूल बातों को ‘ग्राहक भगवान का रूप समझकर’ नजरअंदाज करती रही लेकिन उनकी अश्लील हरकतें कम होने की बजाए बढ़ने लगीं। प्रतिदिन वे लोग मां के और भी निकट खड़े होने के लिए आपस में झगड़ने भी लगते, “साले, तुम्हारी बहन लगती है, इतने पास खड़े हैं उसके। हम भी पैसे दे कर सौदा खरीदते हैं, मुफ्त में नहीं।’ और भी कई तरह की बकवास करते हुए वे आपस में हाथपाई तक जा पहुंचते। एक-दूसरे के बाल खींचते, मां-बहन की गंदी गालियां देते और ललकारने लगते। मां डरते हुए अपने सिर पर दुपट्टे को संभालते हुए उनसे परे जा खड़ी होती। हम दीवार से लग कर उनका तमाशा देखते। हमें कुछ सूझता ना। वे रेहड़ी का सामान उठा कर एक-दूसरे पर फेंकने लगते। कोई बीच-बचाव करता और धीरे-धीरे भीड़ छंटने लगती। बाद में हम सड़क पर बिखरे पड़े अपना सामान समेटने लगते। यह शोरगुल एक दिन का नहीं था, नित्य का था। बात बढ़ते हुए पुलिस तक जा पहुंची। एक दिन बड़े थानेदार ने खुद आकर मां को रेहड़ी छोड़ कर कोई अन्य काम करने का दबाव दे डाला। उसके बाद मां ने रेहडी की ओर मंह नहीं किया। थोड़े ही दिनों में मेरे लिए नए काम का बंदोबस्त करते हुए मुझे खुद जाकर बैंड-बाजेवालों के चौबारे में छोड़ आई।

सामने कुर्सी पर बैठे उस्ताद के मैंने जाते ही पांव छुए। उन्होंने मुझसे छोटी-मोटी पूछताछ की। फिर किसी निर्णय पर पहुंचते हुए उसने मेरे हाथ में झुनझुना थमाते हुए कहा, “लो बेटा। इसे बजाना सीख लो। दाएं-बाएं हाथ का तालमेल तुम्हें बिठाना पड़ेगा, जो इतनी जल्दी बैठता नहीं लेकिन एक बार बैठ गया तो फिर इन्हें बजाते हुए तुम मुंह से ‘हीर’ भी गा सकते हो।”

मैंने झुनझुना हाथ में लेकर घुमा-फिरा कर देखा। उसकी झनझन ने मेरे भीतर एक तरंग छेड़ दी। पता नहीं इस तरंग के कारण या कुछ अन्य वजह से मैं बकायदगी से उस्ताद के पास चौबारे में जाने लगा।

उस्ताद मुझे किसी ना किसी आयोजन में भेजने लगा। कभी घोड़ी, कभी डोली, कहीं कोई शगुन इत्यादि। मैं अन्य बाजोंवालों के साथ खड़े होकर अपनी कला का प्रदर्शन करने लगा। खड़े रहने पर भी मुझे कोई थकावट महसूस नहीं होती थी। शाम को घर लौटने पर मां गुनगुने पानी का पतीला गुसलखाने में रख देती। मैं मुंह-हाथ धोता। कपड़े बदलता और तकिए पर सिर रखते ही टेढ़ा हो जाता। मां काम करते हुए छोटी-मोटी बातें करती और जरूरतों के बारे में बताती। मैं अपनी जेब के कोनों में रखे शगुन के करारे नोटों के साथ दिहाड़ी मां के हाथों में रख देता। वह एक-एक नोट को सीधा करती। उन्हें करीने से संभालती और एक दिन पहले पैसों का खर्च बताने लगती। मां की ये बातें सुन कर मुझे लगता, मैं समय से पहले सयाना हो गया हूं। मां भी उस दिन कुछ ऐसे ही कह रही थी, “मेरा राजा बेटा, अभी बारहवें में गया है, लेकिन खेलने के दिनों में तेरे सिर पर जिम्मेवारी का बोझ आ पड़ा। तू अपनी उम्र से कहीं अधिक समझदार हो गया है।”

अब मैं अपनी ओर से घर-बाहर संभालने की कई योजनाएं तलाशता। कई तरह के महल बनाता-ढाहता। मां खुद भी खाली नहीं बैठती थी। वह अन्य औरतों के साथ किसी विवाह-शादी या अन्य आयोजन में काम करने के लिए दिहाडी पर जाने लगी। मैं मन ही मन सोचता. कल को मैं भी उस्ताद समान आयोजनों की बुकिंग किया करूंगा। थोड़ा काम चलने लगा, तब मां को कहीं बाहर काम करने नहीं जाने दूंगा। जो सुख उसे बापू के समय मिलता रहा था, वही उसे मिले।

वैसे अब घर का गुजर-बसर होने लगा था। मां के चेहरे पर थोड़ी रौनक लौट आई थी। उसका गेहुआ रंग खिलने लगा था। बातें करते हुए, जब वह हाथ मार कर हंसती तो बहत सन्दर लगती। मैं कितनी देर तक मां के चेहरे की ओर देखता रहता। वह भी कई छोटी-मोटी बातें करती रहती। निचले कमरों में रहने वाला चाचा कभी-कभी ऊपर आ बैठता। मुझसे बाजेवालों के बारे में कई बातें पूछता। कभी हम टी.वी. पर पुराने फिल्मी गाने सुनते। मां भी हमारे पास आ बैठती। हम बातें करते हुए खिलखिला कर हंसते। वे दोनों भी मेरे साथ बच्चा बन जाते। मां हर बात में बराबर का हिस्सा लेती। कभी-कभी लगता, मां अब बापू के असमय जाने के गम को भुलाने लगी थी।

मां ठीक ही कहती थी, ‘सुख भाग्य से ही मिलता है।’ ऐसा ही हुआ। हंसने-खेलने के दिन अधिक देर तक ना रहे। हमारे पास बैठने के कारण चाचा-चाची के घर में क्लेश रहने लगा। चाची और मां की पहले ही नहीं बनती थी। वे जरूरत अनुसार ही एक-दूसरे से बोलती थीं। चाची तैश में आकर मां और चाचा के संबंधों का इल्जाम लगाने लगी। कुछ दिन बात उनके कमरे तक सीमित रही, फिर धीर-धीरे चलते हुए बाहर आंगन और चलते हुए गली-मुहल्ले तक जा पहुंची।

नीचे तंग आंगन में चाची के पास औरतों का जमघट लगा रहता। एक आती, एक जाती। चाची बिना किसी संकोच के औरतों से कहती, ‘रंडी ने जादू-टोने से मेरे पति को अपने पीछे लगा लिया।’ उसकी इन बातों पर चाचा उस पर झपट पड़ता। चाची और भड़क उठती। गली-मुहल्ला इकट्ठा होने लगता। चाची और भी ऊंची आवाज में रोते हुए कहती, “जिस रंडी के कहने पर मुझे मारने को दौड़ता है, जा उसी पर चादर डाल (बिना फेरे के विवाह बंधन) ले। लुक-छिप कर क्यों मिलता है, सबके सामने जाकर मिल। चाचा कुछ कह ना पाता। वह शर्मिन्दा होकर आसपास झांकने लगता। चाची फिर आगे बोलने लगती, “निपूती, पता नहीं किस-किस के पास जाती है। अच्छे-भले मेरे आदमी को पागल बना दिया। इसे अपनी उम्र का लिहाज नहीं रहा। अपने बच्चे दिखाई नहीं देते।”

कोई औरत उसे समझाने की कोशिश करती, वह और भी भड़कने लगती। कभी अपने आंसू पोंछते हुए कहने लगती, “कौन औरत अपने घर में क्लेश चाहती है।” फिर पति की ओर इशारा करके कहती, “यह मुझे टोकता है, कहता है, क्या हरदम मुंह बना कर रहती हो। भाभी की ओर देखा कर, कैसी बन ठन कर रहती है। दो बच्चे हो गए। आधी उम्र बीत गई, अब मेरा मुंह ही इसे अच्छा नहीं लगता।”

औरतें चाची को दिलासा देती। कभी वह कहती, “इस रंडी को मेरा घर मिला था. उजाडने को। कहीं और मंह मारती।”

मैं देखता, मां किसी न किसी बहाने इस शोरगुल से दूर ही रहती। वह मुझे भी चाची की बातें सुनने ना देती। वह मुझे किसी काम पर भेज देती। हम दरवाजा बंद कर टी.वी. ऊंचा कर देते। फिर भी आवाजें कम ना होतीं। मैं इस रोज-रोज के क्लेश से उकता गया था। मुझे मां पर भी खीझ उठती। क्यों चाची के सामने गंगी बनी रहती है। उसकी ऊंट-पटांग बातों का कोई जवाब क्यों नहीं देती। मां के खामोश चेहरे की ओर देखते हुए मैं सोचता, मां को गली की औरतों के सामने चाची को खरी-खोटी सुनानी चाहिए। मुझे इन बातों का कोई जवाब ना सूझता। मैं और भी उलझ जाता।

पता नहीं, यह मां की समझदारी थी या कुछ और, वह बिना वजह बात को बढ़ाना नहीं चाहती थी। लेकिन ऐसा करते हुए भी बात खत्म ना हुई। एक दिन बात हद से बाहर हो गई। चाची कहीं बाहर गई हुई थी। चाचा दबे पांव ऊपर आ गया। मां ने भी माथे पर सिलवट नहीं डाली। उससे पहले की तरह ही पानी के लिए पूछा। मां ने मेरे साथ ही चाचा को भी खाना परोस दिया। चाचा भी चुपचाप खाने लगा। मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा। मुझे मालूम था, चाची फिर से शोर मचाएगी। मां को गालियां देगी। अड़ोसी-पड़ोसी इकट्ठे हो जाएंगे। रात की नींद हराम हो जाएगी। इसी चिन्ता में मुझसे खाना नहीं खाया जा रहा था।

चाचा को कोई जल्दी नहीं थी। वह बहुत आराम से, स्वाद लेकर खाना खा रहा था। मुझे बेचैनी होने लगी। मैं सोचता, चाचा को इस नित के क्लेश के कारण ऊपर नहीं आना चाहिए या फिर मां ही उसे ऐसा करने से रोक दे। मां की इस मामले में खामोशी मेरी समझ से बाहर थी। मेरी चिन्ता के बावजूद उस दिन कुछ नहीं हुआ। चाचा जिस प्रकार ऊपर आया था, उसी तरह वापस चला गया।

हम लेटने लगे तो नीचे से चीखने-चिल्लाने की आवाजें आने लगीं। मैं भी तेजी से मां के पीछे-पीछे नीचे उतर गया। अड़ोस-पड़ोस से भी लोग इकट्ठे हो गए। दोनों बच्चे चीखते हुए, रो रहे थे। चाचा दीवानों की तरह अंदर-बाहर हो रहा था। मैंने भी आगे बढ़ कर कमरे में झांका। चाची अंदर चारपाई पर चौफाल पड़ी थी। उसका धड़ चारपाई पर और टांगें हवा में लटक रही थी। गर्दन एक ओर टेढ़ी थी और उसके मुंह से झाग निकल रही थी। कमरे में अजीब-सी गंध फैली हुई थी। औरतें चाची को बार-बार हिला-डुला रही थीं।

औरतें अपने ही अनुमान लगा रही थी। कोई कहती, ‘पति के कारण दुखी थी…।’

दूसरी कहती, ‘गेहूं में रखी गोलियां फांक ली।’ ‘नित्य का क्लेश घर उजाड़ देता है।’

इसी शोरगुल में ही किसी औरत ने चाची को नमक के घोल का पानी पिलाया। उसने एक-दो बार आंखें खोली। मां मंह-सिर लपेट कर चुपचाप दीवार से सटी खड़ी थी। उसने किसी बात में कोई हिस्सा नहीं लिया। पड़ोस के कुछ लोग मिल कर चाचा के साथ चाची को डॉक्टर के पास ले गए।

उनके जाने के बाद, औरतें मां को घेर कर खड़ी हो गईं। एक ने झिझकते हुए बात शुरू की, “राजा की मम्मी, सच-झूठ तो भगवान जानता है, लेकिन अगली के मन में शक बैठ गया है। नित्य के क्लेश के कारण ही आज यह हालत बन गई।” बात करते हुए वह मां के और पास सरक आई, “राजा की मम्मी, समझदारी कर। आदमियों का क्या है, उन्हें कोई कुछ नहीं कहता लेकिन औरत पर लगा दाग उम्र भर नहीं उतरता। इसलिए हमारा कहा मान, इसे ऊपर आने से मना कर दे। नहीं तो इस सच-झूठ में तुम दोनों के बच्चों को भुगतना पड़ेगा।” पास खड़ी अन्य औरतें इस बात का समर्थन करने लगीं। पड़ोसन ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “तुम पहले से ही दुखी हो। भगवान ने तुम्हारे साथ न्याय नहीं किया।” मैंने देखा, मां की आंखों से नीर बहने लगा था। उसके होंठ फड़कने लगे लेकिन स्वर साथ नहीं दे रहा था। वह अगूठे से जमीन खुरचने लगी। पड़ोसन मां की स्थिति को भांप गई। बात का रुख मोड़ते हुए बोली, “चलो, समय एक-सा नहीं रहता। सुख से तुम्हारा पुत्र अब कमाने लगा है और दो-चार बरस की बात है। दिन फिर जाएंगे तुम्हारे।” पड़ोसन मां का चेहरा ताकने लगी। मां के चेहरे पर चिन्ता और उदासी का मिला-जुला रंग झलकने लगा।

अगले दिन लोगों में इस बात की बहुत चर्चा रही। वास्तव में चाची ने डराने के लिए नींद की गोलियां ली थीं। चाची के इस कदम से मां बहुत डर गई। उसने कहीं भी आना-जाना बंद कर दिया। उसके चेहरे पर पहले जैसी रौनक ना रही। वह बेमतलब ही घर में इधर से उधर चक्कर काटती। पता नहीं, वह खुद को उलझाने की कोशिश करती या उसका घर में दिल नहीं लगता था।

कई बार रात को नींद खुल जाने पर मैं देखता, मां बल्ब की मद्धिम रोशनी में बापू की तस्वीर को एकटक देख रही होती। मैं चुपचाप पड़ा रहता। मां मुंह में बुदबुदाती, “भले लोग, तुझे दीवार पर इस तरह बैठने की बहुत जल्दी थी? जाते हुए हमारे बारे में कुछ सोचा ही नहीं। तुम्हारे जाने के बाद मेरी जान सांसत में आ चुकी है। दिन-रात चैन नहीं। कोई कुआं-तालाब मुझे भी बता जाता, जहां मैं खुद को खत्म कर लेती।”

मां की ये बातें सुन कर, मेरा गला भर आता। कभी मन करता, उठ कर मां को दिलासा दूं। उसके साथ छोटी-छोटी बातें करूं। लेकिन मेरी हिम्मत ना पडती। मैं मां की तरह सोचों में उलझा रहता।

उसके बाद मां को ना अपना और ना ही घर संवारने का कोई चाव रह गया था। वह घर में होने वाले नित्य के क्लेश से थक गई थी। उसने अब चाचा से दूरी बना ली थी।

इन्हीं दिनों में मां का निकट मुहल्ले की भोली आंटी के साथ आना-जाना बढ़ गया। उसी ने ही मां को फिर से काम की ओर लौटा लिया। जिस दिन काम से फुरसत होती, भोली आंटी सारा-सारा दिन मां के पास बैठी रहती। बातें करती, आंटी मां के साथ हंसी-मजाक करती। मां भी धीरे-धीरे बदलने लगी। आंटी मुझसे दूरी बना कर बैठती और मां के कान में फुसफुसा कर बात करती। उस समय मां के चेहरे के रंग बदलते रहते। वह बात सुनते लपेटती रहती। वह किसी उधेड़बुन में उलझी रहती। काम करते हुए भूल जाती। कभी-कभी मेरी ओर देखती। मुझसे नजर मिलते ही आंखें चुराने लगती। मैं अनुमान लगाता। उन दोनों की कानाफूसी का कोई सिरा मेरे हाथ ना लगता। परन्तु मुझे इस बात की तसल्ली थी कि मां अब खुश रहने लगी थी। उसकी बुझी आंखों में चमक लौटने लगी थी। वह घर के कामकाज में ध्यान देने लगी थी।

मैं अपने काम में डूबने लगा था। उस्ताद कहीं भी भेजता, मैं खुशी से जाता। बारात के आगे खड़े होकर झुनझुना बजाता। मुझे लगता, लोग मेरी ही ताल पर नाच रहे हों। उस समय मैं भी किसी अन्य दुनिया में पहुंचा महसूस करता।

इसी प्रकार उस दिन रंधावा फार्म के बाहर मुझे होश नहीं रहा था। साहूकारों के लड़के का ब्याह था। नोटों की बारिश हो रही थी। लड़के-लड़कों के नाचने के कारण पैरों में पड़े नोट उठाने में मुश्किल हो रही थी।

इसी शोरगुल में हम उल्टे पैर फार्म हाउस के गेट की ओर सरकने लगे। उस्ताद घूरते हुए वहीं खड़े रहने की हिदायत दे रहा था। उसी समय किसी ने पीछे से मुझे कंधे से पकड़ कर आवाज भी दी। लेकिन मेरा ध्यान नोटों की ओर था, मैंने ध्यान नहीं दिया। तभी किसी ने मेरे कान के पास मुंह लिजा कर मुझे जोर से आवाज दी। मैंने मुड़ कर देखा, हमारी गली का रिंकू खड़ा था। मुझे मालम था, वह आगे भी कई बार विवाह-शादी में रुपए लूटने के लिए आता था।

मैंने फिर मुंह फेर लिया। तब उसने तल्खी से कहा, “राजा, बात तो सन ले। फिर बजाता रहना झनझना…।”

मैंने गर्दन घुमा कर आंखों से पूछा, क्या बात है। इस बार रिंकू ने मेरी आंखों में देखते हुए कहा, “यार, हमारी गली में सुबह से इस बात की शोर है कि आज तेरी मां का विवाह है।” इतना कह कर वह चुप हो गया।

मेरा जी चाहा, यही झुनझुना इसके मुंह पर दे मारूं। उसने बिना रुके फिर कहा, “मेरी मां कह रही थी, वो जो मोटी-सी आंटी आती थी न तुम्हारे घर। उसी ने कहीं बात पक्की करवाई है।”

सुनते ही मेरी आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा। जी चाहा, सब कुछ छोड़ कर घर लौट जाऊं और घर से जाने वाली मां को रोक लूं। उसकी बांह मरोड़ते हुए उससे पूछ्, “मां ! हम अच्छे-भले रह रहे हैं। अब तुम क्या चाहने लगी हो।” तभी मुझे उस्ताद ने घूरा और आंख के इशारे से आगे बढ़ने को कहा। मेरे हाथ के झुनझुने मन भर के हो गए। खड़े-खड़े ही टांगे कांपने लगी। मेरे लिए कदम उठाना मुश्किल होने लगा। मैं आपे सिर फोड़ दूं।

आसपास का शोर मुझे बापू की मौत-सा सुनाई देने लगा। उस्ताद द्वारा सारा काम समेटने के बाद ही मेरी खलासी हुई। शाम को मैंने अनमने ढंग से घर लौटते हुए गली का मोड़ मुड़ा। गली में चुप्पी पसरी थी। मैंने घर आते तक कई गुरुओं-पीरों का ध्यान किया और कहा, परमात्मा! रिंकू की बात गलत साबित हो। मां घर का ही छोटा-मोटा काम करती मिले। मुझे गले लगाए। मुंह-सिर चूमते हुए, बिना किसी बात के मुझे चपत मारते हुए हंसे और पानी वगैरह पूछे। जैसे वह अक्सर करती है। सामने कमरे का अधभिड़ा दरवाजा देख कर मुझे ऐसा ही कुछ आभास हुआ, जैसा मैं सोचते हुए आ रहा था। घर की हर शै अपने-अपने स्थान पर करीने से पड़ी थी। लेकिन मां घर में कहीं नहीं थी। सूने घर की दीवारें मुझे काटने को दौड़ने लगीं। सां सां करते घर से मझे खौफ महसस होने लगा।

मां घर को कभी भी इस प्रकार सूना छोड़ कर नहीं जाती थी। मुझे अंधेरे में कहीं जाने नहीं देती थी। इस प्रकार चुपचाप मां द्वारा किया गया फैसला मेरी समझ से बाहर था। बाहर फैलता अंधेरा अब भीतर से मुझे जकड़ने लगा था। रात का डर मुझे मौत से भी भयानक दिखाई देने लगा। बाहर आंगन में मैं अंधेरे में खड़ा था। पड़ोस के घर से एक बिल्ली ने छलांग लगाई। डर से चीख निकलते ही मुंह से निकला, ‘हाय मां!’ वहीं खड़े-खड़े ही मेरे आंसू बहने लगे। दिल तेजी से धड़कने लगा। मैं पैर घसीटते हुए बाहर की मुंडेर के पास आ खड़ा हुआ।

पता नहीं मेरे रोने की आवाज सुन कर या वैसे ही सामने वाली आंटी और मेरी चाची आगे-पीछे सीढ़ियां चढ़ ऊपर आ गईं। आंटी ने एकदम मुझे गले से लगा लिया। चाची के हाथ से पानी का गिलास ले, मेरे होंठों से लगाया। पानी गले से नीचे ना उतरा। मैं हिचकियां ले रहा था। मुश्किल से ही होंठ गीले किए। पता नहीं, कैसे मेरे मुंह से निकला, “आंटी, मां जाते समय किसी से कुछ कह कर गई है?” आंटी का गला भर आया। उसने गर्दन घुमा कर अपनी आंखें पोंछी। वह मुझे दिलासा देने लगी लेकिन उसने मां के बारे में कुछ नहीं कहा।

चाची आज खमोश थी और तनाव मुक्त भी। उसने हम दोनों से कोई बात नहीं की, पता नहीं मां के इस प्रकार चले जाने के कारण या किसी अन्य कारण से, उसके चेहरे पर निखार और कदमों में तेजी थी। उसने कमरे में जाकर बल्ब जला दिया और दरवाजा भिड़ा दिया। फिर कुछ सोच कर मेरा हाथ पकड़ कर, सीढ़ियों की ओर खींचते हुए बोली, “आ जा राजा, नीचे आ जा। क्या करेगा तू ऊपर बैठ कर। तेरा चाचा भी आने वाला होगा।”

उसकी बातें छुरी-सी मेरे कलेजे को चीर रही थीं। मेरा उसके साथ चलने को रत्ती भर भी जी नहीं चाह रहा था। लेकिन मेरे आसपास पसरती काली रात का खौफ मेरी रूह को कंपा रहा था। आंटी ने भी मुझे चाची के साथ जाने का इशारा किया। दुविधा में फंसे ही मैं सीढ़ियां उतरने लगा। मेरे पास इसके अलावा और कोई चारा नहीं था।

पैर घसीटते हुए मैं निचले कमरे में चारपाई पर जा बैठा। चचेरी बहन ज्योति ने मुझे बुलाया लेकिन मेरा मन किसी से कोई बात करने का नहीं हो रहा था। आंगन में औरतें जुड़ने लगीं। मैं उनकी बातों की ओर कोई ध्यान नहीं देना चाहता था लेकिन वह बहाने से दहलीज के पास आकर मुझे देखतीं। मेरे लाख यत्न करने पर भी उनकी बातें मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थीं।

एक कह रही थी, “ठंडे दूध को फूंक मारने गई है और चार बरस में लड़का ब्याहने योग्य हो जाता।”

“हीरे जैसा पुत्त है इसका, उसे लात मार कर जाना कहां की समझदारी है।”

एक अन्य कहने लगी, “इस तरह पुत्र को दुख देकर कौन-सा सुख मिलेगा उसे।”

“ऐसी औरतों को बच्चों से कैसा मोह। सभी जानते हैं, संग-शर्म तो कब से छोड़ चुकी थी। उसे तो आदमी चाहिए था।”

मुझे लगा, ये औरतें मां के साथ-साथ मेरा भी मजाक उड़ा रही थीं और जलील कर रही थीं। मैंने अपने कानों में अंगुलियां दे दी। उन बातों ने सारी रात मेरा पीछा ना छोड़ा।

दिन चढे चाचा ने मुझे आवाज देकर जगाया और काम पर जाने के बारे में पूछा। बेशक उस्ताद ने कल भी समय पर आने की ताकीद की थी परन्तु मेरा मन काम पर जाने का नहीं कर रहा था। इसलिए हाथ-मुंह धोते समय मैंने अपना सिर नल के नीचे कर दिया और सूजी हुई आंखों पर भी पानी के कई छींटे दिए। मैं चुपचाप ऊपर आ गया। सूरज अभी नीचे ही था। लेकिन उजास फैल रहा था। मेरी निगाह सामने अंगीठी पर रखी बापू की तस्वीर पर जा टिकी। कितने अमन से बैठा था वह। मैं बापू की तस्वीर की ओर देखता रहा और मन रात को आंगन में औरतों की बातों से जा जुड़ा। उनकी बातें अभी तक मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थीं। उनमें से ही किसी ने कहा था, “बाप की मौत पर तो बच्चे ने रो-धोकर सब्र कर लिया लेकिन इस प्रकार चुपचाप घर से चली गई, मां की चोट का जख्म यह कैसे सहन करेगा।”

फिर पता नहीं, क्या सोच कर मैंने कोने की अलमारी के ऊपर धूल से अटी पड़ी मां की धुंधली तस्वीर को उतार लिया। उसे बापू की तस्वीर के साथ रख दिया। चारपाई पर पड़े तौलिए से दोनों को बारी-बारी से साफ किया। दीवाली पर पूजा के लिए लाई गई माला को साफ कर दोनों की तस्वीर पर इकट्ठा ही चढ़ा दिया।

मैंने मां की तस्वीर की ओर देखा, वह बापू की तरह टेढ़ी तरह नहीं, एकदम सीधे मेरी ओर देख रही थी। उसका पल्ला सिर से सरक गया था और दांतों में दिखाई देती हल्की-सी विरल से वह मुस्कुराने का यत्न कर रही थी।

रात का दृश्य मेरे सामने फिर से साकार हो गया। जब चाची बेमतलब ही कमरे में जा घुसी थी, तब मैंने पड़ोसन आंटी से फिर पूछा, “आंटी, क्या मां सच में कुछ कह कर नहीं गई?” तब आंटी भर्राए गले से मेरे चेहरे को अपने हाथों में लेकर धीरे से बोली थी, “राजा बेटा! तुम ऐसा बिलकुल मत सोचना कि मां ने तुम्हारी परवाह नहीं की। वह जाते हुए खड़ी हुई थी पल भर मेरे पास। उसने कहा था, “दिलासा देना मेरे राजा को। मेरा बच्चा सयाना है। बताना मैं स्वयं चाहती थी उसे, परन्तु झिझकती रही। उससे कह नहीं पाई। बहन, तुम उससे मेरी ओर से कह देना, “मैं घर से भाग कर नहीं जा रही, घर बसाने जा रही हूं।”

आधी-आधी रात को बापू की तस्वीर को एकटक निहारते हुए, किसी कुएं-तालाब को तलाश करती, मां मेरी सोच का हिस्सा बन गई। घर-परिवार चलाने के लिए बेबस और लाचार मां, जिसे रेहड़ी के पास खड़े होकर बुरे लोगों की बुरी नजरें और गंदे बोल सुनने पड़ते। जिसने विवाह-शादी में लोगों के जूठे बर्तन मांज कर गुजारा किया। चाची द्वारा लगाए गए इल्जाम सुनते हुए अगूंठे से जमीन खुरचती, शर्मिन्दगी और जलालत के बोझ से दबी मां को देख कर मेरा मन भर आया। मेरी आंखें फिर से भर आई।

मैंने आंखें फैला कर फिर से मां की तस्वीर की ओर झांका। उसका चेहरा शांत था। होंठों पर हल्की-सी फैली मुस्कान और आंखों की चमक कोई नया संदेश देती प्रतीत हुई। मैंने उसकी तस्वीर से माला उतार कर परे फेंक दी। रोशनदान की दरारों से सूरज की किरणें अंदर दाखिल होने लगीं। आस-पास फैलती इस रोशनी में मुझे मां का चेहरा और भी निखरा-निखरा सा दिखाई देने लगा।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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