saras aur chatur kekda panchtantra ki kahani
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जब सारस बूढ़ा और कमजोर हो गया तो उसे मछलियाँ पकड़ने में मुश्किल होने लगी। कई बार तो उसे भूखे पेट ही रहना पड़ता था। उसे डर लगने लगा कि कहीं वह भूख से ही न मर जाए।

उसने एक तरकीब सोची। एक दिन, वह तालाब के किनारे उदास सा चेहरा – बना कर खड़ा हो गया। उसने मछली पकड़ने की भी कोशिश नहीं की। एक केंकड़े ने आ कर पूछा- “मामा क्या बात है? आज आप कुछ खा भी नहीं रहे?”

सारस बोला-मैंने अपनी सारी जिंदगी इस तालाब में बिता दी लेकिन अब सब कुछ बदलने जा रहा है। कुछ लोग इसे मिट्टी से भरने जा रहे हैं, वे वहाँ खेती करेंगे। तालाब की सारी मछलियाँ मारी जाएँगी और मैं भी भोजन के बिना मर जाऊँगा।

तालाब की मछलियाँ, केंकड़े और मेंढ़क यह बात सुन कर चिंता में पड़ गए। उन्होंने सारस से पूछा-“अब हमें क्या करना चाहिए।”

सारस ने सुझाव दिया-पास ही एक बड़ा तालाब है, वहाँ तुम सब सही-सलामत रहोगे। अगर चाहो तो, मैं वहाँ ले जा सकता हूँ।”

उन सबने चैन की साँस ली और सारस को उसकी मदद के लिए धन्यवाद कहा। सारस पहली बार में कुछ मछलियाँ ले जाने के लिए मान गया। उसने चोंच में कुछ मछलियाँ पकड़ी पर उन्हें पास वाले तालाब में ले जाने की बजाए पहाड़ी पर ले गया और खा लिया। जब उसे दोबारा भूख लगी तो उसने वही चाल चली। इसी तरह वह मछलियों को तालाब ले जाने के बहाने से एक-एक करके खा लेता। वह काफी मजबूत और ताकतवर हो गया।

तालाब का केंकड़ा भी सुरक्षित स्थान पर जाना चाहता था। उसने सारस से विनती की कि उसे भी तालाब में ले जाए। सारस कई दिन से मछलियाँ खा-खा कर उकता गया था। उसने सोचा कि चलो नया स्वाद मिल जाएगा इसलिए वह सारस को ले जाने के लिए मान गया। सारस केंकड़े को लेकर उड़ने लगा। थोड़ी देर बाद केंकड़े ने पूछा-“मामा, बड़ा तालाब कहाँ है?”

सारस हँसा- “हा-हा, तुझे पहाड़ी नहीं दिखती, हम वहीं जा रहे हैं।” केंकड़े ने नीचे झाँका तो उसे मछलियों की हड्डियों के ढेर पड़े हुए दिखाई दिए। वह एक पल में उस दुष्ट की चाल समझ गया। उसने अपनी हिम्मत बटोरकर, तीखे पंजों से सारस की गर्दन दबोच ली।

सारस ने उसकी पकड़ से निकलने की कोशिश की लेकिन नाकामयाब रहा। जल्द ही सारस के प्राण निकल गए और वह जमीन पर आ पड़ा।

शिक्षा :- लालच बुरी बला है।

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