Old Age Story: बेड नंबर 4 वाले मरीज के साथ कौन आया है? सिस्टर जरा जल्दी से बुला कर लाओ।” डॉक्टर राधिका दास ने मेरे अस्सी वर्षीय पति का चेकअप करने के बाद अपने कैबिन में जाते वक्त नर्स से कहा।
“जी डॉक्टर.. कल रात से ही एक बुजुर्ग महिला बाहर बैठी है । वही इन्हें एडमिट करवाने के लिए लाई थी जब उन्हें सांँस लेने में बहुत ज्यादा दिक्कत आ गई। “
“इनके बेटे बेटी या पोते पोती साथ में जरूर होंगे… जाओ उन्हें बुलाकर लाओ।”
नर्स मेरे पास खड़ी हो इधर उधर देख रही है .. “अम्मा जी ..”
मैं इतनी देर से किसी नर्स के आने का ही तो इंतजार कर रही थी । अपनी छड़ी टेक कर खड़ी होती हूँ तो पैर लड़खड़ा जाते हैं और दुबारा वहीं बैंच पर बैठ जाती हूँ।
“अब कैसे हैं मिश्रा जी। डॉक्टरों ने क्या कहा है? क्या हुआ है उन्हें? जल्दी ही ठीक हो जाएंगे ना वो।”
मैंने अपनी कांपती हुई आवाज में प्रश्नों की झड़ी लगा दी।
“अम्मा जी आपका बेटा बेटी जो भी आपके साथ में आया है उसे डॉक्टर राधिका दास के कैबिन में भेज दीजिए।”
इतना कहकर नर्स चली गई , मेरी बात सुने बिना। मैं अपनी झुकी हुई कमर और कमजोर आंँखों से छड़ी के सहारे डॉक्टर के कैबिन की ओर चल पड़ी। कल से जब से मिश्रा जी को यहाँ हॉस्पिटल में लेकर आई हूँ लग रहा है मैं कुछ ज्यादा ही बूढ़ी हो गई हूँ… और इस छड़ी का सहारा लेकर चलना पड़ रहा है वरना मिश्रा जी जब मेरे पास रहते हैं तो यह छड़ी मुझसे दूर ही रहती है। वो अक्सर कहते हैं मिश्राईन हम दोनों ही अपने अंतिम समय तक एक दूसरे का सहारा हैं। मुझे कभी छड़ी की भी जरूरत नहीं पड़ेगी जब तुम मेरे साथ हो।
शादी के दो साल बाद से ही मिश्रा जी की माँ परेशान हो गई थी हमारी संतान न होने पर उन्होंने अपने पोते पोती का मुंँह देखने के लिए कितनी मन्नतें की। पूजा पाठ यज्ञ तो करवाया ही साथ हमें शहर के बड़े से बड़े डॉक्टरों के पास इलाज के लिए भी भेजा। हम दोनों माँ का मन रखने के लिए उनकी सारी बातें मानते तो थे पर मिश्राजी मुझसे हमेशा कहते,” परेशान मत रहा करो मेरी मीना हमारे बच्चे नहीं हुए तो क्या हुआ? हम दोनों एक दूसरे का सहारा बनेंगे और हमेशा साथ रहेंगे। जब तू 95 साल की हो जाएगी और मैं 100 साल का… देख छड़ी तो मैं कभी पकड़ूंगा नहीं और ना ही तुझे जरुरत पड़ेगी।
तो तू मेरी छड़ी बनेगी ना और मैं तेरी। एक दूसरे को पकड़कर हम अपने जीवन की शाम को भी पार कर देंगे।”
मैं राधिका दास के कैबिन में पहुंची तो देखा एक 24-25 साल की लड़की गले में स्टेथोस्कोप टांगें खिड़की से बाहर देख रही है। मैंने दरवाजे पर नौक किया और अंदर चली आई, अपने हाथ जोड़कर मिश्रा जी के बारे में पूछा।
“आप मिश्रा जी की वाइफ है आपके बच्चे नहीं है आए क्या? मैंने नर्स को कहा था कि आपके बेटे बेटी से बात करनी है।”
“आप निसंकोच कहिए मुझसे उनकी पत्नी हूँ मैं, हमारी संतान नहीं है।”
“माफ कीजिएगा मुझे नहीं पता था। हमारे हॉस्पिटल में ज्यादातर बुजुर्गों के साथ उनकी संतान आती हैं और कई बार उन्हें एडमिट करा कर उनकी खोज खबर लेती ही नहीं है। कई बार तो हमारी फीस भी जमा नहीं कराती।”
“आप चिंता मत कीजिए डॉक्टर मैंने अभी तक की हॉस्पिटल में इलाज के सारे पैसे जमा करा दिए हैं आगे भी जितना खर्च आएगा मैं समय पर जमा करा दूंगी।”
“आपने बिल्कुल समय पर उन्हें यहां एडमिट करवाया। हल्का सा पैरालाइसिस अटैक आया है जोकि इलाज के बाद ठीक होने की संभावना है लगातार एक महीने तक फिजियोथैरेपी रोज करवानी होगी। “
“जी डॉक्टर क्या मैं उनसे अभी मिल सकती हूंँ?”
“हांँ जाइए और मिल लीजिए, वह शायद आपको ही बुला रहे थे और मुझे लगा कि अपनी बेटी को पुकार रहे हैं । मीना आपका ही नाम है क्या?”
“हांँ मिश्रा जी मुझे इसी नाम से बुलाते हैं वैसे मेरा नाम मीनाक्षी मिश्रा है।”
मैं केबिन से निकलकर उनके पास गई और जैसे ही उनके पास पहुंची मुझे अपने हाथ में पकड़ी छड़ी याद आई जिसके सहारे से चल रही थी। मैंने उसे एक तरफ रख दिया क्योंकि जानती थी उन्हें यह देखकर बहुत तकलीफ होगी कि मैं इस छड़ी के सहारे चल रही हूंँ।
मुझे देखकर उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे। मेरे हाथ को पकड़ रोने लगे..
” यह क्या हो गया मीना…”
उनकी आवाज स्पष्ट नहीं थी पर मैं तो उनके दिल की धड़कन भी सुन सकती थी।
” मैं तुझे अकेला छोड़ कर हॉस्पिटल के इस बैड पर लेटा हूंँ और पता नहीं कब तक इसी तरह यहांँ लेटा रहूंगा। पता नहीं अब कभी अपने पैरों पर खड़ा भी हो पाऊंगा या नहीं ।अभी तो हाथ भी नहीं हिला पा रहा हूंँ।”
“आप चिंता मत कीजिए जल्द ही हम दोनों फिर से पार्क में जाएंगे और घंटों वहां बैठेंगे बातें करेंगे।”
“पता नहीं मीना मैं अब कभी ठीक हो पाऊंगा या नहीं? काश! हमारे बच्चे होते तो मैं चैन की नींद सो सकता था इस दुनिया से विदा हो सकता था.. पर अब मेरे जाने के बाद तुम बिल्कुल अकेली हो जाओगी।”
मैंने अपने कांपते हाथों से अपनी उंगली उनके मुंह पर रखी ..
“ऐसा मत कहिए … आप जल्दी ठीक हो जाएंगे.. और ऐसा किसने आपसे कहा कि अगर हमारे बच्चे होते तो हमें संभालते ही आज। अगर ऐसा सबके साथ होता कि बुढ़ापे में उनके बच्चे उनके साथ रहते और उनकी देखभाल करते जिस तरह मांँ बाप बच्चों को जन्म दे बच्चों को पालते पोसते हैं इस उम्मीद में कि वह भी बुढ़ापे में उनका सहारा बनेंगे। यह अगर सच होता तो इस दुनिया में वृद्धाश्रम होते ही नहीं।”
एक सप्ताह हॉस्पिटल में रहने के बाद मैं उन्हें लेकर घर आ गई । रोज शाम को फिजियोथैरेपिस्ट घर आता । दवाइयां समय पर चल रही थी। मेरे काम में हाथ बटाने के लिए शांति थी ही, जो हम दोनों का खाना बना देती और घर की साफ सफाई कर देती जिसके बदले हम हर महीने उसे पैसे दिया करते।
हमारा खर्चा हम दोनों की पैंशन से निकल ही जाता था यह बैंक से रिटायर्ड हुए थे और मैं भी सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल की पोस्ट से कुछ साल पहले ही रिटायर हुई थी।
रिटायरमेंट के बाद हम दोनों फिर से बच्चे ही बन गए थे। अब अधिकतर समय हम दोनों का साथ ही बीतता था कभी लूडो और कैरम बोर्ड खेलते तो कभी मैं उन्हें कहानियां पढ़ कर सुनाया करती। मिश्रा जी मुझे किशोर कुमार के गाने सुनाते। अपने बगीचे में बैठे घंटों हम बातें करते अपने बचपन की। रोज शाम को मंदिर जाया करते फिर वहां से लौटते वक्त यह मुझे चाट की दुकान पर ले जाते हमें गोलगप्पे एक ही प्लेट में खाते देख आसपास के बच्चे एक दूसरे को कोहनी मारते और इशारा करते।
मैं समझ जाती वह लोग क्या कहना चाहते हैं..
इस उम्र में भी इन दोनों में इतना प्यार है।
हांँ यह सच ही था कि जैसे जैसे हमारी उम्र बढ़ रही थी इस बढ़ती उम्र के साथ-साथ प्यार भी बढ़ता ही जा रहा था।
मेरे घुटनों में दर्द होता तो वह अपने हाथों से मेरे पैरों की मालिश करते। मैं मना किया करती …
“अच्छा नहीं लगता जी…आप मेरे पैर छूते हैं। यह काम तो मेरा है मुझे आपकी सेवा करनी चाहिए। “
वो हंँस कर कहते,” जब सेवा का मौका मिलेगा तब तुम ही करोगी ना और कौन करेगा। अभी तुम्हारे पैरों का दर्द कम हो जाएगा तब ही तो चलेंगे हम लोग घूमने बिना छड़ी के सहारे।
जब मैं पार्क में अपने पड़ोसी शर्मा जी को उदास अकेले बैठा देखती तो मन दुखी हो जाता। बढ़ती उम्र के इस समय जब उन्हें अपनी पत्नी की सबसे ज्यादा जरूरत थी वो उनसे अलग रहने पर मजबूर थे ।
चार बेटे और चारों अलग-अलग शहर में रहते हैं।
मिश्रा जी के साथ ही बैंक में काम किया करते थे रिटायरमेंट के बाद बच्चों ने प्रापर्टी का बंटवारा कर लिया और बटवारा हो गया दोनों पति-पत्नी का भी।
अपना घर बेचकर और शर्मा जी की रिटायरमेंट के बाद मिले सारे पैसों को चारों बेटों ने अपनी सुविधा के अनुसार फ्लैट खरीद लिया।
बरसों साथ रहने के बाद अब उन्हें अलग-अलग रहना पड़ता है जबकि अभी ही उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत थी। कभी-कभी सोचती हूँ कि अच्छा ही हुआ जो हमारे बच्चे नहीं हुए वरना कहीं हमें भी शर्मा जी और उनकी पत्नी की तरह अलग-अलग रहना पड़ता।
हम दोनों साथ में तो हैं अपने घर में अपनी मर्जी से जो चाहे वह कर सकते हैं। वो अपनी पत्नी को हमेशा याद करते हैं, उन्हें फोन करने के लिए भी वो मिश्रा जी से उनका फोन मांगते हैं। उनका मोबाइल पोते ने तोड़ दिया। कई बार चारों बेटों को कह चुकें हैं ठीक करवाने के लिए पर किसी ने उसे ठीक नहीं करवाया।
महीने भर के इलाज के बाद ही मेरे मिश्रा जी ठीक हो
गए ।अब यह बिना छड़ी का सहारा लिए मेरे कंधे पर हाथ रखे पार्क में टहल रहे थे।
यह भी देखे-बहू का जन्मदिन-गृहलक्ष्मी की कहानियां
