एक नया सूर्योदय-गृहलक्ष्मी की कहानियां: New Beginning Story
Ek Naya Suryodya

New Beginning Story: बाहर सड़क में सन्नाटा पसरा हुआ था इक्का-दुक्का जाते हुए वाहनों के शोर सुशील जी के कानों में शोर मचाते हुए पार हो जाते थे।

कई बार वह सोचते काश कोई उनके दरवाजे आकर रुके और उनसे उतर कर उनके तीनों बच्चों में से कोई उन्हें सरप्राइस कर जाए।
“… पापा हम आ गए ….!”
लेकिन यह शब्द उनके कानों में एक भ्रम बनकर गूंजता रहता।
ठंड में सन्नाटे के साथ कोहरे के परतें बढ़ते जा रहे थे और वैसे ही उनके अंदर निराशा के भाव।

कोहरे के धुंध में लिपटी ठंडी सड़कें उनके मन को भी वैसी ही ठंडी बना रहे थे।

अनुराधा जी दो कपों में चाय लेकर ड्राइंग रूम में आईं।
अपने पति सुशील को बाहर पथराई आंखों से सड़क को निहारते देख उनके उनके मन में एक गहरी टीस सी उठी।

उनकी आंखों के कोर भीग गए।

अपने जज्बात को काबू में रख कर उन्होंने धीरे से कहा
“लीजिए जी, चाय पीजिए..!ठंडी हो जाएगी।”

सुशील बाबू थोड़ी देर तक खामोश रहे फिर उन्होंने चाय का कप उठा लिया।

दो लोगों के बीच एक सन्नाटा सा पसर आया था।

सन्नाटे में चाय की चुस्कियों की आवाज आ रही थी।
उनकी खामोशी देखकर अनुराधा जी ने कहा

” क्या करते हैं जी बच्चों को अपनी जिंदगी जीने दीजिए !
हम ही ने तो उन्हें ये जिंदगी दिया है न कि वह इस काबिल हो गए, फिर हम उन्हें अपने लिए अपने स्वार्थ के लिए क्यों बोलें?”

” हम्म…!, एक लंबी सांस लेकर सुशील जी ने कहा यू आर राइट अनु …लेकिन यह जो बाप का दिल है ना यह चाहता है कि उसके बच्चे उसके साथ रहें।

इस बुढ़ापे में आखिर हम दोनों का है कौन ?हमारे तीन बच्चे ही तो!”

अनुराधा जी ने कहा
” हम दोनों का साथ सिर्फ हम दोनों ही निभाएंगे जी।
यह आप क्या कह रहे हैं यदि बच्चों को ले जाना होता तो क्या वे लोग एक बार भी नहीं करते कि हमारे साथ चलिए …!”

सुशील जी–” मैं वहां एडजस्ट भी नहीं कर पाता हूं। उन लोगों के नियम कानून मुझे अच्छे नहीं लगते।”

अनुराधा जी–” तो फिर हम दोनों यही भले ..मैं और आप !”

सुशील जी लंबी सांस लेकर बोले
“यही तो डर लगता है ना अनु, मैं और तुम जिंदगी के उस पटरी पर हैं जहां कब किसका साथ छूट जाए कोई नहीं जानता।
इसलिए मैं चाहता हूं कि हमारे बच्चे कम से कम भूले भटके हालचाल तो ले लें।”

अनुराधा जी बेबसी में सिसक उठीं
” क्या कहते हैं जी ,कुछ भी बोल देते हैं? ऐसी बातें मत बोलिए ।मुझे बहुत डर लगता है ।”

सुशील जी ने उनके हाथों को पकड़ कर कहा
” देखो अनु ,हम उस पड़ाव पर पहुंच गए हैं कब किसका साथ छूट जाए कोई नहीं जानता, इस बात से भागने की जरूरत नहीं है।”

अनुराधा जी बोली “नहीं मैं भाग नहीं रही हूं पर सच्चाई से डर लगता है।
हर दिन भगवान से प्रार्थना कर सकती हूं.. हे भगवान …!,सब कुछ ठीक रखना। मेरा सुहाग ना उजड़े !..
आप बिल्कुल सही रहेंगे जी, आपको कुछ भी नहीं होगा ।”

सुशील जी –“अगर तुम्हें कुछ हो गया भाग्यवान तो मेरा क्या होगा ?यह बुढ़ापे में जो सुख की चाय नसीब है ,वह कैसे मिलेगा ?”

“कैसी बातें करते हैं जी। तीनों बहुएं बहुत ही अच्छी और लायक है।
हां तीनों वर्किंग है तो फिर वह कैसे पूरा टाइम दे सकती है?
हम दोनों एक दूसरे के लिए ही है ना तो हम एक दूसरे के साथ ही निभाएंगे।

जब तक सांस है तब तक आस है ।हम क्यों जाया करें!”

चाय पीजिए और चलिए हम मॉर्निंग वॉक करने चलते हैं ।”

सुशील जी-” इस ठंड में कहीं मुझे स्ट्रोक आ गया तो?”

” कुछ नहीं आएगा आप मफलर जैकेट सब लपेट लीजिए ।मैं भी शॉल ले ले लेती हूं ।

हम दोनों खुली धूप में चलते हैं। किसी का इंतजार करने से अच्छा है हम दोनों खुशी से अपनी जिंदगी जीएं।

” शायद तुम यह ठीक ही कहती हो ,अनु..!,मैं ही थोड़ा स्वार्थी हो गया था।

हम दोनों एक दूसरे के लिए ही बने हैं। एक दूसरे के साथ ही तो हमने जिंदगी गुजारने का संकल्प किया था।”

चाय पीने के बाद सुशील जी तरोताजा हो चुके थे।

उन्होंने अपना ओवरकोट पहना। स्टिक लेकर अनुराधा जी का हाथ पकड़ कर बाहर निकल गए।

आज अनुराधा जी का हाथ पकड़ कर चलते हुए वह बहुत ही रिफ्रेश महसूस कर रहे थे।