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कौन श्रेष्ठ?-21 श्रेष्ठ बुन्देली लोक कथाएं मध्यप्रदेश: Mythological Stories
Kaun Shresth

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Mythological Stories: किसी समय किसी राज्य में एक राजा था। दरबारियों ने उसके मन में यह बात बैठा दी कि योगी तो पाखंडी होते हैं। कोई काम-काज किए बिना खाते-पीते मौज मनाते हैं। कुछ दरबारी इस राय से सहमत नहीं थे। वे दबे स्वर में कहते सब अंगुलियाँ एकसमान नहीं होतीं, सब दिन भी एक समान नहीं होते फिर सब योगी एक जैसे तपस्वी या एक जैसे भ्रष्ट कैसे हो सकते हैं? तर्क-वितर्क से कोई समाधान नहीं हो सका तो राजा ने पूरे राज्य में डुगडुगी पिटवा दी कि जो सच्चा योगी हो केवल वही उनके राज्य में योगी के रूप में रह सकता है जो सच्चा योगी नहीं है. उसे गहस्थ होना होगा। सब योगियों को राजा के तीन प्रश्नों के उत्तर देने होंगे। जो सही उत्तर देगा उसे ही सच्चा योगी माना जाएगा।

एक-एक कर सब योगियों को राजा के सामने लाया जाता, राजा उनसे प्रश्न करता और संतोषजनक उत्तर न मिलने पर उन्हें योग छोड़कर गृहस्थ जीवन स्वीकार करना पड़ता। महीनों बीत गए, अनेक योगी गृहस्थ बन गए किंतु कोई भी राजा के प्रश्नों के सही उत्तर नहीं दे सका। जितने योगी बचे थे, वे गृहस्थ बनने से बचने के लिए राज्य छोड़कर चले गए।

एक दिन सवेरे-सवेरे एक योगी अपने आप ही राज महल पहुँचा कि राजा के प्रश्नों के उत्तर देना चाहता है। राजा को सूचना भिजवाई गई तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ। राजा ने उसे ससम्मान दरबार में पहुँचाने का आदेश दिया। द्वारपालों ने राजाज्ञा का पालन किया। राजा ने अपने दो प्रश्न पूछे कि योगी जीवन श्रेष्ठ है या गृहस्थ जीवन? तथा अच्छे योगी और अच्छे गृहस्थ को कैसा होना चाहिए?

योगी ने कुछ देर सोचकर उत्तर दिया कि इन प्रश्नों का उत्तर वह एक माह बाद दे सकेगा। राजा को उत्तर चाहिए तो उसके एक माह रहने-खाने की व्यवस्था करे या जाने दे।

राजा के मन में उत्तर पाने की प्रबल इच्छा थी इसलिए उसने योगी की शर्त स्वीकार कर ली और उसके लिए समुचित व्यवस्था किये जाने का आदेश दिया। योगी वहीं रहने लगा। जब एक माह पूरा होने में एक दिन रह गया तो योगी राज दरबार में आया और राजा से बोला कि प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए आप अकेले साधारण नागरिक की वेशभूषा में मेरे साथ चलें। मंत्री आदि ने राजा के अकेले जाने पर आपत्ति की किन्तु राजा के हठ के आगे उनकी एक न चली।

राजा और योगी दरबार से बाहर चले गए और चलते-चलते एक जंगल में जा पहुँचे। जंगल पार कर बाहर निकलने पर योगी ने राजा से कहा कि वे दूसरे राज्य में आ चुके हैं इसीलिए वह राजा को साधारण वेशभूषा में लाया था। यहाँ की राजकुमारी का स्वयंवर आयोजित है। हम उसे देखते हुए आगे चलेंगे। राजा ने स्वीकृति दे दी।

राजा और योगी दोनों स्वयंवर में पहुँचे। समय पर स्वयंवर आरंभ होने की घोषणा की गई और यह बताया गया कि राजकुमारी जिसे भी चुनेंगी उसी के साथ उनका विवाह कर दिया जाएगा। कुछ देर बाद सखियों सहित सजी-सँवरी राजकुमारी का आगमन हुआ और वह एक-एक कर उपस्थितों के सामने से आगे बढ़ने लगी। वह जिसके सामने आती वह राजकुमारी का अभिवादन कर अपना परिचय देता और राजकुमारी हाथ जोड़कर आगे बढ़ जाती। राजकुमारी योगी के सामने आई तो योगी न खड़ा हुआ, न अभिवादन कर अपना परिचय दिया। सबको आश्चर्य तब हआ जब राजकमारी ने बिना कुछ सोचे-विचारे योगी के कंठ में वरमाला डाल दी।

इस पर घोषणा की गयी कि यह गलती से हो गया क्योंकि योगी ने न तो अपना परिचय दिया, न विवाह के लिए सहमत है। राजकुमारी को अपना वर चुनने के लिए दुबारा कहा गया किन्तु उसने फिर योगी के गले में वरमाला डाल दी। तीसरी बार भी यही हुआ तो योगी से अनुरोध किया गया कि वह राजकुमारी से विवाह करना स्वीकार कर ले, उसे आधा राज्य दे दिया जाएगा ताकि वह राजा बनकर राजकुमारी को अपनी रानी बनाकर खुश रख सके। योगी ने यह स्वीकार नहीं किया और वहाँ से चल पड़ा। उसे जाते देख राजकुमारी भी उसके पीछे-पीछे जाने लगी। योगी ने राजा से तेज गति से चलने को कहा और रात होने पर किसी प्रकार राजकुमारी से पीछा छुड़ाकर, राजा सहित फिर एक जंगल में चला गया।

वर्षा होने लगी तो योगी और राजा ने एक सघन पीपल के वृक्ष के नीचे शरण ली। उस पेड़ पर अनेक पक्षियों के साथ एक हंस परिवार भी रहता था। वे पूर्व जन्म में मनुष्य योनि में सद्गृहस्थ थे। उस जीवन के संस्कार उनमें पक्षी योनि में भी थे। योगी और राजा को पेड़ के नीचे भूखा-प्यासा, वर्षा में भीगा देखकर हंसिनी ने हंस से कहा कि हे स्वामी! हमारे द्वार पर दो अतिथि पधारे हैं। इनका उचित सत्कार न हुआ तो हमें दोष लगेगा। हंस ने सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि इन्हें सर्दी से बचाने का जतन करना चाहिए। तुम वृक्ष की सूखी टहनियाँ गिराओ, मैं कहीं से आग लेकर आता हूँ। हंस उड़ गया और हंसिनी ने टहनियाँ गिराना आरंभ कर दिया।

तब हंसों की भाषा समझकर योगी ने राजा को उसका मतलब बताया और राजा से टहनियाँ बटोरने के लिए कहा। राजा ने टहनियाँ बटोरी ही थीं कि हंस कहीं से एक जलती हुई टहनी अपनी चोंच में लाया और टहनियों पर गिरा दी। योगी ने आग सुलगाई और राजा तथा योगी दोनों शीत भगाने लगे। हंसिनी ने फिर हंस कर कहा कि योगी तो शाकाहारी है, उसके लिए कुछ फल लाकर गिरा दो तो उसका काम चल जाएगा। दोनों ने ऐसा ही किया। अब हंस बोला कि राजा तो मांसाहारी होते हैं, उसका पेट फलों से नहीं भरेगा। क्या करूँ? फिर सोचकर बोला कि हे प्रिये! तुम्हारे बिना ये छोटे-छोटे चूजे मैं नहीं पाल सकूँगा लेकिन मेरे बिना तुम इनको पाल सकोगी इसलिए मैं अतिथि राजा की भूख मिटाने के लिए उसका आहार बन जाता हूँ। यह कहकर हंस जलती हुई आग में कूद पड़ा।

योगी के कहने पर राजा ने उसे भूनकर खा लिया। हंसिनी कोटर में चूजों के लिए रखे गए फल गिरा रही थी, कुछ फल खाकर योगी ने ईश्वर को धन्यवाद दिया। हंसिनी समझ गई कि योगी तृप्त हो गया है किन्तु राजा की भूख नहीं मिटी। इस पर अपने चूजों को समझ-बुझाकर हंसिनी भी आग में कूद पड़ी। राजा ने उसे भी भूनकर खा लिया। चूजों ने अब भी राजा को अतृप्त देखा तो वे भी अग्नि में कूद पड़े। उन्हें भून-खाकर राजा की क्षुधा मिट गई। राजा और योगी दोनों उसी झाड़ के नीचे सो गए।

सुबह जागने पर राजा ने योगी को याद दिलाया की उसकी शर्त के अनुसार एक माह पूरा हो चुका है और उसे अपने प्रश्नों का उत्तर चाहिए। इस पर योगी बोला कि हे राजा तुम मूर्ख और राजा होने योग्य ही नहीं हो। कल जो कुछ घटा, क्या उससे तुमको अपने प्रश्नों का उत्तर नहीं मिला? तुमने पूछा था योगी को कैसा होना चाहिए? कल एक राजकुमारी ने योगी के गले में तीन बार वरमाला डाली और राजा ने आधा राज्य देने की घोषणा की फिर भी योगी उसे ठुकरा कर प्रभु भक्ति के पथ पर चल दिया। योगी को ऐसा ही होना चाहिए कि सांसारिक प्रलोभन उसे भक्ति के पथ से डिगा न सके। तुमने दूसरा प्रश्न यह किया था कि गृहस्थ कैसा होना चाहिए? यह हंस-हंसिनी तथा उनके चूजों ने अपने आचरण से बता दिया कि द्वार पर आया अतिथि देव सदृश्य होता है, अपने प्राण देकर भी अतिथि का सत्कार करना चाहिए। तुम्हारा अंतिम प्रश्न था कि योगी और गृहस्थ में से कौन श्रेष्ठ है? इसका उत्तर यह है कि योगी हो या गृहस्थ अपने धर्म का पालन करने वाला ही श्रेष्ठ होता है। तुम राजा हो, तुम्हारा धर्म क्या है?

योगी की बात सुनकर राजा का सर शर्म से झुक गया। वह समझ गया कि राजा प्रजा का पालक होता है। उसका धर्म प्रजा का पालन करना और उन्हें उनकी रुचि के अनुसार धर्म का पालन करने देना राजा का धर्म है। अपने राज्य में योगियों को उनके धर्म का पालन न करने देकर और सत्ता का भय दिखाकर योगियों को धर्मच्युत करके यह सिद्ध हो गया है कि वह राजा होने योग्य नहीं है। राजा ने योगी के चरण पकड़कर अपनी भूल स्वीकार की और स्वयं को योगी बनाने की प्रार्थना की। तब योगी ने कहा कि हे राजन! भूल करने के बाद उसे सुधारना ही धर्म है। भूलकर पलायन कर जाना सही राह नहीं है। तुम वापिस अपने राज्य में जाओ और धर्मपूर्वक अपनी प्रजा की रक्षा और पालन करो। अपना जीवन सात्विक रखो विलासी नहीं। यदि तुम्हारी क्षुधा प्रबल नहीं होती तो तुम भी फलों से संतुष्ट हो पाते और हंस-हंसिनी व चूजों को प्राण नहीं देने पड़ते। राजा शर्म के कारण अपना सिर तक न उठा सका और रोते-रोते योगी के चरण पकड़कर वचन दिया कि वह राजा होते हुए भी योगियों की भाँति केवल प्रजा-हित के लिए जिएगा, किसी तरह का मोह नहीं पालेगा और हंस परिवार का कृतज्ञ होते हुए नीर-क्षीर बुद्धि से न्याय करेगा।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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