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दिन दीदी रुको, अभी रुक जाओ (दिन दीदी, जाग-जाग)-21 श्रेष्ठ लोक कथाएं उत्तराखण्ड: Hindi Kahaniya
Din Didi Ruko, Abhi Ruk Jao

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Hindi Kahaniya: बहुत पहले की बात है, किसी घर में दो सास-बहू रहते थे। बहू तो सीधी व सरल स्वभाव की थी, किन्तु सास दुष्ट थी। बहू को जब मायके गये हुए बहुत दिन हो गये तो एक दिन उसने मायके जाने का प्रसंग छेड़ा। मायके का नाम सुनते ही सास खौलते तेल में पानी की बूंदों की तरह चिड़-चिड़ाने लगी। बहुत अधिक अनुनय-विनय करने के बाद सास ने अन्त में बहू से कहा, अपने मायके से वापस आने तक के लिये आटा-चावल कूट पीस कर रख जा. लकडी. घास. पानी का प्रबन्ध कर सातों गौशालाओं का गोबर साफ कर तो तू चार दिन के लिये मायके जा सकती है। काम करके मायके जाने के लिये सास ने अनुमति तो दे दी किन्तु ओखली में चावल कूटने के लिये मूसल छिपा दिया, घास काटने के लिये दराती व रस्सी छिपा दी तथा पानी भरने के लिये घड़ा छिपा दिया। इस प्रकार उसे इतना परेशान कर दिया कि वे मायके जा ही न सके।

अपनी सास की आज्ञानुसार वह सात सूप धान लेकर उन्हें कूटने के लिए ओखली में गई। बिना मूसल के वह बेचारी क्या करती थी। उसको देखकर चिडियों के झुण्ड ने दयालु होकर चावलों को धान के छिलकों से अलग कर दिया। फिर वह प्रसन्न होकर घर में गई। सास ने जब चावलों को मापा तो एक दाना कम हो गया। पुनः वह एक दाने की खोज में आई। यह दाना किसी वृद्ध चिड़िया की चोंच में अटक गया था। उससे वह दाना लेकर फिर बहू घर आई।

बहुत कठिनाई से उसने सातों गौशालाओं का गोबर साफ किया और वह घास के लिए चली गई। जंगल में चूहों ने घास काटने में तथा सांपों ने उनके गट्ठर बांधने में सहायता की और वह एक-एक करके उन गट्ठरों को घर पहुंचाती रही। अभी उसे अन्य कार्य भी करने थे। सूर्य अस्तांचल को जाने लगा था। उसने सूर्य को हाथ जोड़कर उससे निवेदन किया कि यदि न्याय और अन्याय का विचार करने वाले हो तो मेरे मायके पहुंचने तक रूके रहें। इस प्रकार वह काम करती गई। सूर्य से ‘दिन दीदी रूको, अभी रूक जाओ’ कहती गई। घास रखकर पुनः वह लकड़ियाँ लेने गई। भालू ने लकड़ियां तोड़ कर रख दी। इसी प्रकार उसने सब कार्य किए और प्रसन्न होकर मायके को प्रस्थान करने लगी।

सूर्य अस्त होने को था, किन्तु उसके दिन दीदी रूको, अभी रूक जाओ’ के स्वर को सुनकर सूर्य देखता रहा और अस्त न हुआ। जब वह अपने मायके में पहुंची तो खुशी के कारण वह सूर्य को जाने की आज्ञा देना भूल गई। बहुत देर तक सूर्य देखता रहा। अन्त में वह उसे श्राप देकर चला गया। वह बेचारी मायके में ही मृत्यु को प्राप्त हो गई और मरने के बाद पक्षी की योनि पाकर आज भी ‘दिन दीदी रूको-रूको’ डाल-डाल पर उड़ती-बैठती पुकारती रहती है।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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