सीमा दीदी, मेरी इकलौती ननद जब भी मौका लगे, मायके आ जाती हैं। सीमा दीदी के आते ही घर का पूरा माहौल बदल जाता है। उनके बार-बार मायके आने से मुझे कोई परेशानी नहीं है, बल्कि वह स्वयं ही परेशान रहती हैं। नवनीत जीजाजी तो उनका बहुत ध्यान रखते हैं, उनकी हर इच्छा पूरी करते हैं। उनके सास-ससुर भी बहुत अच्छे हैं, उन्हें बेटी की तरह रखते हैं। न पहनने-ओढऩे की पाबंदी, न घर के काम की जबरदस्ती। सीमा दीदी प्यारे-प्यारे जुड़वा बच्चों की मां हैं, एक बेटा, एक बेटी। बहुत ही प्यारा और खुशहाल परिवार है उनका। हर लिहाज से सीमा दीदी बहुत ही खुशनसीब हैं।
मेरी और मोहन की शादी को अभी दो साल ही पूरे हुए हैं। मेरे सास-ससुर बहुत ही नेक दिल हैं। मम्मीजी-पापाजी ने मुझे हर तरह की आजादी दे रखी है। मैं अपनी मर्यादा को पहचानती हूं। मैं मम्मीजी-पापाजी का बहुत ख्याल रखती हूं। समय पर खाना-पीना समय पर दवाइयां, उनकी हर जरूरत का ध्यान रखने की कोशिश करती हूं। मेरा प्रयास यह होता है कि उन्हें किसी तरह की कोई परेशानी न हो। मम्मीजी को तो मैं कोई काम नहीं करने देती हूं। मेरा मानना है कि जैसे मेरे मम्मी-पापा हैं, इस उम्र में मैं उन्हें सुखी देखना चाहती हूं, वैसे ही मोहन के माता-पिता का ख्याल रखना हमारी जिम्मेदारी है। जब हम चीजें दिल से स्वीकारते हैं तो कुछ भी करने में हमें परेशानी नहीं, वरन सुकून मिलता है और अपनों के लिए कुछ करने से न सिर्फ सुकून मिलता है, बल्कि घर की सुख-शांति भी बनी रहती है।
मम्मीजी-पापाजी और मोहन को मुझसे कोई शिकायत नहीं है। हमारा आपस में अच्छा तालमेल बना हुआ है। बस सीमा दीदी मुझसे नाखुश हैं। उन्हें मेरे हर काम में मीनमेख निकालना ही होता है। मेरे काम के तरीके पर तंज कसना, ताने देना, मेरे पहनने-ओढऩे के तरीके पर व्यं ग्य करना। फिर भी मैं उनका आदर करते हुए कभी पलट कर जवाब नहीं देती। मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करती कि दीदी को शिकायत का मौका न मिले, लेकिन दीदी कुछ न गलतियां फिर भी ढूंढ़ ही लेती हैं। दीदी मम्मीजी को समझाती, ‘बहू को काबू में रखो। जहां भी मीरा की गलती दिखे, उसे टोक दिया करो। उसे यूं सिर पर बिठा कर रखती हो, हर वक्त मीरा का गुणगान करती हो, एक बार हाथ से निकल गई तो फिर तुम्हारी भी नहीं सुनेगी। मां, तुम सास हो, सास की तरह रहा करो। मोहन को समझातीं, ‘लगाम कस कर रखो, वरना मीरा छाती पर मूंग दलेगी।’
कितनी अजीब बात है न, हमारे घर के लोग हमे आजादी दे तो वह हमारा हक है, लेकिन हमारे मायके में हम चाहते हैं कि बहू वही पुरानी परंपरागत बहू की तरह रहे, जिसका कर्तव्य है, घर के सभी लोगों का ख्याल रखना, लेकिन उसके बारे में अच्छा सोचने की हमें जरूरत महसूस नहीं होनी चाहिए। मैं खाना बनाने की तैयारी कर रही थी, तभी मम्मीजी रसोई में आ गईं। मुझसे कहने लगीं, ‘मैं सब्जी छौंक देती हूं, तुम बाकी के काम निपटा लो।’
मैंने उन्हें जबरन उनके कमरे में भेज दिया और कहा, ‘दीदी आई हैं, आप दोनों बैठकर बात करें, यहां के काम मैं कर लूंगी।’ दीदी को बड़ा अटपटा लगा कि मेरे मायके में मेरी मां, अपने मन का कुछ नहीं कर पाती हैं। वे मम्मीजी से कहने लगीं, ‘मां मीरा ने तो आपको रसोई से बाहर कर दिया। आपकी तो इस घर में कोई इज्जत ही नहीं रही। देख लो, जुम्मा-जुम्मा चार दिन हुए हैं इसे घर में आए, पर पूरा घर अपने हाथ में ले लिया। सबको अपनी मर्जी से चलाने लगी हैं। मां, जरा संभल जाओ, वरना यह पूरा घर बिगाड़ देगी।’
मम्मीजी बोलीं, ‘अरे नहीं, ऐसा नहीं है, बहुत प्यारी हैं मीरा, हर काम बड़े प्यार से करती हैं। हमारा बहुत ख्याल रखती हैं। हमें ठेस भी नहीं लगने देती हैं। हमारी बहुत इज्जत करती हैं। बहुत सेवा करती हैं। हर काम वक्त पर और सही तरीके से करती हैं।’
‘मां, तुम बहुत भोली हो, यह सब दिखावा है। तुम हमेशा याद रखना, वह तुम्हारी बहू है। बेटी नहीं। बेटी जितनी मां-बाप की चिंता करती है, उन्हें प्यार व इज्जत देती है, उतना बहू नहीं कर सकती है।’ आगे दीदी कहने लगीं, ‘मुझे तुम लोगों की बहुत फिक्र होती है, इसीलिए बार-बार आ जाती हूं। तुम तो अपने मुंह से कुछ बोलोगी नहीं, पर मैं बेटी हूं। मैं समझती हूं, इसीलिए आ जाती हूं कि तुम लोगों का ध्यान रख सकूं।’
मम्मीजी समझ चुकी थीं कि सीमा कुछ अच्छा सुनना नहीं चाहती हैं। वह सिर्फ इस उम्मीद से आती हैं कि उससे माता-पिता अपने मन की बात कहे कि बहू के आ जाने से वे कितने दु:खी हैं। घर में माता-पिता का स्थान हिल गया है। बहू मालकिन बन बैठी है। बहू से वे परेशान हैं। बहू उनका बिल्कुल भी सम्मान नहीं करती हैं। बहू को न की बिल्कुल फिक्र नहीं है। फिक्र तो सिर्फ बेटी ही कर सकती हैं। बहू अगर सास-ससुर की चिंता करे तो या तो वह दिखावा है या फिर पक्का कुछ स्वार्थ छिपा है। तभी मैंने खाना लगा दिया, लेकिन सीमा दीदी
के चेहरे पर नाराजगी मैं पढ़ पा रही थी।
खैर…दूसरे दिन दीदी ससुराल जाने वाली थीं। रात को मैं मम्मीजी के कमरे में गई और उनसे पूछा, ‘दीदी को बिदाई में क्या देना है। मैंने मिठाइयां मंगा ली हैं। क्या मैंने जो साड़ी खरीदी है, वह उन्हें दे दूं? उन्हें पसंद आएगी? मम्मीजी बोलीं, ‘नहीं मीरा, हर बार तुम अपने लिए शौक से कुछ लेती हो, सीमा आ जाती है और तुम उसे दे देती हो, लेकिन वह तुम्हारे प्यार को नहीं समझती है। वह तो तुम्हारी बुराई सुनने आती है और निराश होकर जाती है। सीमा मेरी बेटी है, लेकिन उसके विचारों को जानकर मैं खुद बहुत दु:खी हूं, क्यों ऐसी मानसिकता होती है कि बहू, बहू है और बेटी, बेटी। मेरे लिए तो मेरी बहू मेरी सबसे अच्छी दोस्त है। यह बात सीमा समझना ही नहीं चाहती हैं। जाने कब अकल आएगी इसे।’
कमरे के बाहर खड़ी दीदी ने हमारी बातचीत सुन ली। उन्हें अपनी सोच पर पछतावा होने लगा, ‘क्यों हम बिना देखे-परखे किसी के प्रति पूर्वाग्रह बना लेते हैं।’ जब दीदी ससुराल जाने लगीं तो मैंने रोली टीका कर उन्हें कपड़े, शगुन के रुपये और मिठाई दी और फिर आने का आग्रह किया। पहली बार उनकी आंखें नम थीं। हम यही उम्मीद कर सकते हैं कि यह बिदाई उन्हें सही समझ दे और वह अपनी ससुराल में खुश रहें। हमें दीदी का इंतजार रहेगा कि वह जब भी मायके आएं, खुशी से आएं, खुशी-खुशी हमारे साथ रहें।
सीमा दीदी जान चुकी थीं कि उनके माता-पिता क्यों बहू को इतना सम्मान देते हैं, क्योंकि उनकी बहू उनकी दोस्त बन चुकी है। दोस्ती का रिश्ता हर लिहाज से बड़ा होता है। दोस्ती में कभी स्वार्थ नहीं होता है, होता है तो सिर्फ नि:स्वार्थ प्रेम और विश्वास। आज सही अर्थ में सीमा दीदी मायके से विदा हुई हैं, त्याग, प्रेम और विश्वास की सीख गांठ बांधकर। भगवान उन्हें प्रेरणा दे कि वह अपने घर को स्वर्ग बना सकें। घर में सभी से प्यार से रहे और सबका प्यार पाएं, यही भगवान से हमारी प्रार्थना है।
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