मनोज के लिए जैसे कुछ हुआ ही न हो, इस तरह रहने लगा। अब तो वह पहले से ज्यादा खुश रहने लगा था। सब को हंसाता, छोटे-छोटे बच्चों से तरह-तरह के मजाक कर के उन्हें खेलाता और कोई भी मुश्किल काम हंसते-हंसते मजाक-मजाक में कर डालता। इसलिए कभी-कभी कुछ लोग उसे पागल समझते कि इसे जैसे किसी से कोई लगाव ही नहीं है, एकदम भावना शून्य है। मां-बाप के खोने का भी दुख नहीं है, बेवकूफ की तरह हंसता रहता है।

 कहा जाता है कि आप अच्छा करो या खराब, लोगों के मुंह में लगाम नहीं लगाई जा सकती। पर कुछ ही दिनों बाद पूरा गांव मनोज को हंसी-मजाक के लिए बुलाने लगा। जैसे सभी को उसके हंसी-मजाक की आदत सी पड़ गई थी। कोई शुभ अवसर होता या खेतों में काम हो रहा होता, सभी मनोज को हंसी-मजाक करने के लिए ले जाते। उसकी हंसी-मजाक की बातों में कब काम पूरा हो जाता, पता ही न चलता। बदले में मनोज को दो जून का खाना मिल जाता, यही बहुत था।

गांव के लड़के उसके घर इकट्ठा रहते। मनोज तरह-तरह के हंसी-मजाक कर के उनका मनोरंजन करता। इसलिए सभी उसे प्रेम से मजाकिया मनोज कहने लगे। वह घर में अकेला ही रहता था, इसलिए लोग उसके घर महफिल जमाए रहते। मनोज का घर सभी के लिए हंसी-मजाक का अड्डा बन गया था। खाली हुए नहीं कि पहुंच जाते अड्डे पर। मां-बाप से खाली हुआ घर हमेशा भराभरा रहता। मनोज सभी का चहेता बन गया था।

किसी को कोई भी तकलीफ होती, वह मनोज के घर पहुंच जाता। देखते-देखते मनोज उसकी तकलीफ भुला कर हंसा देता। एक दिन अचानक हुए एक्सीडेंट में गांव के प्रधान के बेटे राजू की आंखें चली गईं। काफी प्रयत्न के बाद भी उसके आंखें ठीक नहीं हुईं। उसे जीवन भर अंधेरे में रहना पड़ेगा, यह सोच कर वह गुमसुम रहने लगा। प्रधान उसे मनोज के पास ले आते, वह उसे हंसाता, निराश होने पर समझाता, “यह सब तो भगवान की लीला है, हम सब को बस हंसते रहना है, अपनी भूमिका को अदा करते रहना है।”

मनोज की इस बात पर राजू ने कहा, “यह तो जिसे तकलीफ होती है, उसे ही पता होता है, बाकी सलाह देना तो आसान है।”

“अरे तुम चिंता मत करो, मैं हूं न।”

“तुम हंसी-मजाक के अलावा और क्या कर सकते हो? जिंदगी जीने के लिए हंसी-मजाक के अलावा भी बहुत कुछ है मनोज।”

“पता है।” कह कर मनोज हंसता रहा। पर राजू को उसकी यह हंसी समझ में नहीं आई।

एक सप्ताह से मनोज गायब था। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि हमेशा खुश रहने वाला, कभी लगता ही नहीं था कि उसे कोई तकलीफ है, इस तरह अचानक वह कहां गायब हो गया। सभी ने उसे खोजने की कोशिश की, पर उसका कुछ पता नहीं चला। उसके जाने के बाद हंसी-मजाक का अड्डा सूना हो गया। मनोज के बिना उस जगह का कोई महत्व नहीं था , उस जगह के मालिक का अता-पता ही नहीं था।

तभी गांव वालों को पता चला कि राजू की आंखें ठीक हो गई हैं। अब वह देख सकता है। सभी खुश हो गए। बात ही खुश होने वाली थी। आते ही वह मनोज की तरह हंसी-मजाक करने लगा, जैसे मनोज ही आ गया हो। उसकी बातों से सभी को मनोज की याद आ गई। मनोज की याद आते ही सब के चेहरे मुरझा गए। सब के मुरझाए चेहरे देख कर राजू ने कहा,”मेरी ये आंखें मनोज की ही हैं। मैं उसकी रंगीन दुनिया को बेरंगी नहीं होने दूंगा। आज से मैं मजाकिया मनोज हूं।”

किसी की कुछ समझ में नहीं आया। सभी प्रधान की ओर देखने लगे। सभी की उदास देख कर प्रधान ने कहा, “मनोज के मां-बाप को रक्त का कैंसर था और वही कैंसर मनोज को भी हो गया था। यह बात वह जानता था। पर पैसा न होने की वजह से वह इलाज नहीं करा सका। इसलिए अब मात्र उसकी आंखें हम सब के बीच हैं।”

यह सुन कर सभी की आंखों से आंसू बहने लगे । अब हंसी-मजाक कर के हंसाने वाला कोई नहीं था। सभी की ओर ताकते हुए राजू ने कहा, “बहुत हंसने वाला चेहरा ही सब से अधिक दर्द छुपाए बैठा रहता है।”

राजू की इस बात से सभी की आंखों के सामने हंसी-मजाक करता हुआ मनोज का चेहरा तैर उठा।

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