Hindi Kahani: “इतना ख़र्च किया मैंने घूमने के लिये कि किसी भी तरह तुम्हारा मन बदल जाये ,पर वहाँ भी तुम्हारी सुई बस उन्ही नामों पर टिकी रही..”
रश्मि के कानों में बन्द दरवाजों से छनकर आती आवाज़ ये मिस्टर वर्मा की थी .
आमतौर पर गम्भीर रहने वाले रघुवेन्द्र जी के मुँह से आज खीझ भरे शब्द निकल रहे थे .
और दूसरी ओर से बस रह रहकर हल्की-हल्की सिसकियों की आवाज़ आ रही थी..
उनके घर का यह परिदृश्य बड़ा आम था
सबके लिये…
अब तो कोई उन्हें उदास देखकर कुछ पूछता भी न था ,ख़ुद ही समझ जाया करता था कि बात क्या होगी.
अन्जू के दुःख की जड़ हर किसी को पता थी,सब समझाकर थक चुके थे ,क्योंकि वो किसी की कुछ सुनने को भी तैयार न होती थीं
आख़िर क्या करूँ ,बीमारी कुछ निकलती नहीं और ठीक तुम होती नहीं चाहती क्या हो तुम आगे पीछे फिरूँ तुम्हारे?
उनके अपार्टमेंट के बरामदे में खड़ी पशोपेश में पड़ी रश्मि के कानों तक भी वो आवाज़ें आ रही थीं.
सोच रही थी कि घण्टी बजाऊँ या नहीं
फिर…कुछ सोचकर उसने आखिरकार घण्टी बजा ही दी.
“तो इसमें मेरी क्या गलती है ,जो मैं बार बार बीमार हो जाती हूँ”,अन्जू ने मायूसी से कहा.
अरे योग क्लासेज,मेडिटेशन सब व्यवस्था तो कर रहा हूँ,तुम्हारे लिये जो कोई कुछ भी बता देता है पर रत्ती भर असर तो दिखे,तुम पर हर वक़्त उजड़ा चेहरा..
सी टू इट …अब नाम भी मत ले लेना उन लोगों का मेरे सामने…
अब दूर से आती हुई मिस्टर वर्मा की आवाज़ स्पष्ट होती हुई रश्मि के कानों में पड़ रही थी..
इतने साल हो गये हमारी शादी को लेकिन तुम्हारा मन अभी तक उसी दहलीज़ में अटका हुआ हैं .
अरे कहाँ से बुला दूँ तुम्हारे भाइयों को जो मतलब नहीं रखना चाहते तुमसे ..
दरवाज़े खोलते ही इतना बोलते बोलते सामने अन्जू को बुलाने आई पड़ोसन रश्मि को देख सकपका गये मिस्टर वर्मा..
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आँखों से टपटप आँसू बहाती उनकी पत्नी अन्जू का मन हमेशा की तरह फिर से भारी हो गया.
उधर रघुवेन्द्र जी ने ज्यों रश्मि को देखा.. तो,शीघ्रता से बोले
“अन्जू !…जाओ तुम्हारे मेडीटेशन का टाइम हो गया “,इतना कहकर वो सोफ़े पर बैठकर अपना माथा ख़ुद ही दबाने लगे.
अन्जू जी भी अपना बैग उठाकर चुपचाप रश्मि के साथ चल दीं..
अन्जू आँटी की भरी आँखे और उतरा हुआ चेहरा देखकर भाँप ही लिया रश्मि ने कि उनका चित्त आज फिर बहुत ज्यादा भटका हुआ है .
मेडिटेशन हॉल में यूँ तो गुरुजी के प्रवचन सबको ही अच्छे लगते थे ,और उनकी प्रेरणादायक बातें असर भी करतीं थीं.
पर अन्जू जी की जिन्दगी सदा बेअसर ही रहीं उनकी बातों से.
वो यूँ भी अक्सर उदास ही पाई जाती थीं और .. सावन के महीने में तो उनकी आँखें भरी ही रहा करती थीं.
वो दिखने में गरिमामयी उम्र का अर्धशतक पार कर चुकी, राजपत्रित अधिकारी की पत्नी और दो योग्य बेटोँ की माँ हैं..
उनके दोनोँ बेटे भी अपने पिता की तरह काबिल,समाज के हिसाब से मोस्ट एलिजिबल बैचलर,
आज के दौर में भी उनकी आँख के इशारे पर चलने वाले ऊपरी तौर से देखने पर उनके जीवन से किसी को भी जलन हो सकती थी,लेकिन मन से एकदम ख़ाली ही मिलतीं.
प्यार करने वाला पति और आज्ञाकारी बेटे भी उनके मन के पतझड़ में बसन्त न ला सके..
अन्जू जी के पीठ पीछे कई पड़ोसिनें उन्हें रोंदू आँटी बोलतीं.
बेहद आत्ममुग्ध और हर कला में स्मार्ट अन्जू जी यूँ तो किसी से भी किसी मामले में कम न थीं,देखा जाये तो सब सुख थे उन्हें ..
विवाह के इतने वर्ष बीत जाने पर भी वो अपने बेटों की बड़ी बहन सी लगतीं ,अक्सर बीमार रहतीं और जब उनकी बीमारी किसी की भी पकड़ में न आती.
तो थक हारकर डॉक्टर उन्हें हवा पानी बदलने की सलाह दे डालते ,कुछ दिन सब ठीक रहता बाद में नतीज़ा फिर वही ढाक के तीन पात..
दोनोँ ही मेडिटेशन सेंटर की ओर बढ़ चलीं आज का माहौल तो ऐसा था कि दोनों में पूरे रास्ते में कोई संवाद स्थापित नहीं हुआ.
आज रश्मि भी उनकी हालत देखकर, ध्यान गुरु अनिरुद्धजी से उनकी समस्या का हल जानने का मन बना ही चुकी थी..
उसने एकांत में मौका देखकर गुरुजी से अन्जू के में बारे सारी समस्याओं के बारे में बता कर प्रश्न किया ,
” ये स्वस्थ क्यों नहीं रहतीं,सारे टेस्ट नॉर्मल हैं कोई बीमारी पकड़ में ही नहीं आ रही ?इनके बच्चे और पति बहुत परेशान रहते हैं .
मेडिटेशन इनका इलाज करने में असफ़ल क्यों हो रहा है ,सब तरफ़ से हारकर इधर आईं हैं इधर भी कोई सुधार नहीं इनमें?
क्योंकि ये स्वस्थ होना नहीं चाहतीं इनका चित्त वासना से ग्रस्त है ,गुरुजी ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया.
वासना शब्द सुनते ही दोनों का चेहरा लज्जा से रक्तवर्ण हो गया कि आख़िर शान्त और शिष्ट अनिरुद्ध जी यह क्या कह बैठे.
देखिये आप मेरी बातों का गलत मतलब न निकालें,उन्होंने बात सँभालते हुए कहा।
अब इस उम्र में इन बातों क्या मतलब बनता है अब तो राम-रहीम करने की उम्र है अन्जू ने झेंपते हुए गड़बड़ा कर कहा।
अनिरुद्ध जी ,”अन्जू जी !वासना का अर्थ है,
निवास करना या आसक्ति”कई तरह की होती है जैसी हमारी इच्छाएँ होती हैं … प्रेमवासना,कामवासना ,भोगवासना आदि.
“ओह “उन दोनों के मुँह से सम्मिलित स्वर निकला
मेरा मतलब है हमारे मन का किसी से गहरा लगाव.आमतौर पर लोग इसे फिल्में देखकर कामवासनाओं से अधिक जोड़ लेते हैं पर ऐसा हैं नहीं ..
तो फिर ?
“आप सबसे ज्यादा किसे प्रेम करती हैं दुःख की जड़ वहीं मिलेगी. कभी कभी तन नहीं मन बीमार होते हैं और देह में लक्षण आते हैं.”
इतना सुनते ही अन्जू के मन का बाँध टूट गया और फिर वो रोने लगीं.
गुरुजी पीहर से मेरा लगभग नाता ही खत्म है कहने को पाँच भाई हैं,पर मेरी कोई सुध नहीं लेता,वो सिसकते हुए बोलीं.
पापा के आँखे मूँदते ही माँ ने कहा ,अब तुम आनाजाना सीमित कर दो,अब बाप का राज चला गया।
और जिस घर में मुझसे पूछकर फैसले लिये जाते थे उन्होंने अब मुझे दूध में पड़ी मक्खी की तरह एक कोने में कर दिया..
राखी-दूज पर भी मेरे भाई एक फ़ोन की ज़हमत नहीं उठाते,मैं इसी दुःख में दिन रात घुलती रहती हूँ..
हूँ .
तुमने अपना दुःख खूँटी पर टाँग लिया है,कहने को वो घर बरसों पहले छूट गया,समय आगे बढ़ गया पर आपका लगाव वहाँ से छूटने को तैयार नहीं।
“अपनी जड़ें कौन भूलता है गुरुजी मरने तक मायके का मोह रहता है,चोरी पकड़े जाने जैसे भाव चेहरे पर लाते हुए अन्जू ने कहा.
आप यहाँ क्या कहीँ भी ठीक नहीं हो सकतीं क्योंकि आप ठीक होना ही नहीं चाहतीं.अनिरुद्ध जी ने शब्दों को चबाते हुए कहा..
क्योँ?रश्मि ने सवाल किया.
रश्मि आप बताइये, जाल में फँसी मछली पानी के बाहर निकल जाने के कुछ देर बाद ही क्यों मर जाती है ,जबकि पानी को कुछ नहीं होता?अनिरुद्ध जी ने कहा.
“गुरुजी क्योंकि मछली को जल से प्रेम है”,रश्मि ने उत्तर दिया ।
अनिरुद्धजी- यही तो उत्तर है ,पानी की आसक्ति मछली में नहीं वो आगे बढ़ जाता है और वासना ने जलासक्त मछली मृत हो जाती है।
आप भी समझदार होने पर भी ,कुछ -कुछ वैसी ही हैं अन्जू जी.
अन्जू को यह नज़रिया कुछ अलग लग रहा था,समझाया तो उसके पति और बेटों ने भी कितनी बार था,फिर भी वह साधिकार जाती और अपमानित हो कर लौटती।
फिर अनिरुद्ध जी ने लगातार अगला सवाल किया.
आप जितना पीहर को याद करतीं हैं क्या पीहर आपको उतना याद करता हैं?अगर प्रेम बराबर नहीं तो आसक्ति हुआ न ,
पानी की वासना में अँधी मछली जब मरती है तो आसपास में दुर्गन्ध छोड़ती है या नहीं।बस मृत नातों की यही बदबू आपके जीवित सम्बन्ध खराब कर रही है..
अन्जू की आँखे अब झुकी हुई थीं और सिर सहमति में हिल रहा था ।
आशा है आप मेरा इशारा समझ गयी होंगी,यही वासना है। इकतरफ़ा नाते कभी लम्बे नहीं खिंचा करते।
जो आपके साथ हैं उन पर ध्यान दीजिये वरना उन्हें भी खो बैठेंगी अपने स्वास्थ्य के साथ साथ ,ठीक है?
जी गुरुजी आज मुझे सच मे आसक्ति की ताकत दिखी और वह हँस पड़ी,आज से… बल्कि अभी से.. मैं आपकी बातों पर अमल करूँगी..
मुझे बहुत अच्छा लगेगा उन्होंने मुस्कुरा कर उत्तर दिया।
आज मेडिटेशन सेंटर से लौटते समय रश्मि को अन्जू में सुखद परिवर्तन महसूस हो रहा था.
आज उसने फ़ुर्सत से आसपास लगे पेड़ों, फूलोँ और आसमान में उड़ते बादलोँ पर बरसों बाद ध्यान दिया था.
आज उन दोनोँ की बातों में मायके की उपेक्षा या अन्य सम्बन्धों की निन्दा नहीं वर्तमान की बात थी,जाने अनजाने अन्जू के बहाने रश्मि को भी उसकी कई उलझनों का हल मिल गया था.
आज आराम से टहलते हुए घर तक आने में न उसे थकान थी और न सिरदर्द.
आज उसका मस्तिष्क अपने मायके नहीं पति और बच्चों पर केंद्रित था।
उसने सिर्फ़ अपनी पसंद की चाट ही नहीं खरीदी बल्कि घर लौटते वक्त आज उसने मिस्टर वर्मा के फेवरेट अरबी के पत्ते भी खरीदे अरबी वड़ा बनाने के लिये.
जब मिस्टर वर्मा ने दरवाजा खोला तो उन्हें बरसों बाद मुरझाई अन्जू नहीं उनकी खुशमिजाज पत्नी वापस मिली
