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hot story in hindi- prem ki pyasi प्यार की खुशबू - राजेन्द्र पाण्डेय

पीछे आप पढ़ चुके हैं, कि प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या हो चुकी थी और लोग सरदारों को आतंकवादी करार देकर उसके साथ खूनी होली खेल रहे थे। जब खूनी भीड़ मेरी ओर बढ़ी तो मैं एक डॉक्टर के क्लीनिक में घुस गई। कई जिस्मों को भोगने का दंभ भरने वाला वह डॉक्टर मुझे भी अपनी मर्दानी बाहों का स्पर्श कराने के लिए मेरे सामने दाना डालने लगा अब आगे पढ़िए…

दंगे-फसाद के बाद की शांति मेरी आँखों के सामने थी। उस शांति में एक अजीब-सा कड़वाहट भरा मातम छाया हुआ था। मेरे मन को ढांढस बंधाने के लिए यह सब काफी था। मैं मन-ही-मन बुदबुदाई, ‘सिर्फ में ही दुखी, असहाय नहीं हूं। दंगे-फसाद के शिकार ये सभी लोग मेरी ही तरह बेबस और लाचार हैं। जब इनमें जीने की शक्ति है, तो मुझे क्या हुआ जो मैं हताश निराश होऊं? टूटी दुकानें फिर से

बनाई जा रही हैं। चोट खाए लोग मरहम-पट्टी करवा रहे हैं। तो क्या में अपनी मरम्मत नहीं कर सकती? जा टूटता है, वही जड़ता भी है। जड़ना जिंदगी है, टूटना मौत… मुझे पुरुषों की

औकात का अंदाज लगाना है। वे अब तक औरतों को ही तोड़ते आए हैं। उनके साथ बलात्कार करने में ही अपनी बहादुरी समझते हैं। अब मैं उन्हें तोड़गी…उनके साथ बलात्कार। करूंगी। उनकी धज्जियां उड़ाऊंगी। यही सोचत-सोचते मैं एक होटल के गेट ‘तो बाहर रहकर क्या करोगी? अंदर जाओगी तो तुम्हें अच्छा-अच्छा खाना मिलेगा। फाइव स्टार होटल का खाना शायद तुमने कभी खाया नहीं होगा।’ वह आग्रहपूर्वक शब्दों में बोला।

‘नहीं, मैंने खाया तो नहीं है, लेकिन मेरे पास पैसे भी तो नहीं हैं।’ मैं एक सांस में ही बोल गई। वह हंसने लगा, ‘मेरे पास तो हैं न? मैं तुम्हें खाना खिलाऊंगा। तुम जैसी हसीन और दिलदार लड़कियों पर मैं अपनी सारी दौलत लुटा दूं, तो भी कम ही है।’ उसके यह कहते ही मैं यह समझ गई, कि बूढ़ा आशिक मिजाज व्यक्ति है। लड़कियां इसकी कमजोरी हैं। इससे पैसे ऐंठे जा सकते हैं। मैं यह सोचते ही खुशी के मारे खिल उठी और उसका हाथ थामे गेट से होती हुई होटल में प्रवेश कर गई।

वह खाने की मेज पर बैठते ही बोल पड़ा, ‘क्या लोगी?’ तभी बैरे ने व्यंजनों के नाम वाली सूची मेज पर रख दी और हमारा मुंह ताकने लगा। मैंने कहा, ‘तुम जो खाना मंगाओगे मैं वहीं खाऊंगी।’

ठीक है, तो चलो चिकन मटन खाते हैं। आज मौसम भी कुछ ठंडा-ठंडा-सा ही है।’ उसके यह कहते ही बैरा चिकन मटन लाने चला गया। खाना खा लेने के बाद वह थोड़ा सहमते हुए बोला, ‘अब तुम कहां जाओगी?’ सुनते ही मेरी तो सांस ही रुक गई, ‘मेरा तो कोई ठिकाना है ही नहीं। अब इसे क्या बताऊ?’ यह सोचते ही मैं काफी नर्वस हो गई। वह एक मंजा हुआ खिलाड़ी था। मेरी ओर देखते हुए उसने फिर वही सवाल दोहराया, तो मैं रुक-रुक कर बोली, ‘मैं कहां जा सकती हूं? मैं तो बेघर हूं।’

‘कौन कहता है, कि तुम बेघर हो। यह इतना बड़ा होटल है। इस होटल में एक कमरा हमेशा मेरे नाम से बुक रहता है। आओ मेरे साथ…।’ यह कहकर वह होटल की सीढ़ियां चढ़कर दूसरी मंजिल पर आया और एक कमरे की ओर इशारा करते हुए बोला, ‘लो यह चाबी और जाकर दरवाजा खोलो।’

मैं चाबी लेकर ताला खोलने लगी। ताला जब खुल गया, तो दरवाजा खोलकर अंदर आ गयरा क्या शानदार कमरा था। तो आंखें ही चुंधिया गयी तभी किसी की मर्दानी के स्पर्श का एहसास हुआ। मैंने कनखियों वह बूढ़ा मेरे कंधों को धीरे-धीरे रहा था। मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ तो इसके लिए पहले से ही तैयार मुझे यह पता था, कि यह बूढ़ा मुझ इतना मेहरबान क्यों है? शायद हम ही मजबूर थे। मैं बेघर थी, मेरे पास नहीं थे। वह अपनी आदत से मजबूर उसे खूबसूरत और कमसिन लड़की की देह से खेलने में मजा आता मेरे कंधे को सहलाते-सहलाते से चिकोटी काट दी। मैं उछल के एक कोने में जा खड़ी हुई। उसने बच्चों वाली हरकत कर दी थी। मैंने गौर से देखा, उसकी आंखों में गजब की मादकता झिलमिला रही थी। वह बड़े ही अजीब ढंग से मुस्करा रहा था। मैंने कई युवा पुरुषों से भी यौन-संबंध बनाए थे, लेकिन उनमें से किसी ने भी मुझे कोई पीड़ा नहीं पहुंचाई थी। अब तक मैंने दस-पंद्रह बूढ़ों से भी यौन-संबंध बनाए थे और वे सभी ही उदंड, उच्छृखल और बदतमीज ही इस मामले में निकले थे। शायद इसकी वजह उनमें यौन उत्तेजनाओं का न होना ही था। वे जिस तेज गति से मुझे छूते-छाते थे, चूमते-चाटते थे, उतनी आक्रमकता सहवास के में नहीं दिखा पाते फिर वे अपनी खीझ चोट पहुंचाकर ही थे। मैं इतना तो पहचान ही गई थी, कि पुरुष में आकर यौन रोगी बन जाता है। महिलाएं इस उम्र में आकर शांत स्थिर पड़ जाती हैं।

मैंने सोचा, क्यों न इस बूढ़े की रगों पर हाथ रखा जाए। फिर मैंने से पूछा, ‘जनाब, इस उम्र में भी तुम लड़कियों के साथ यौन-जीवन जीने की क्यों रखते हो?’

वह हंसने लगा, क्यों, बूढों का दिल शरीर जैसे-जैसे बूढ़ा होता नहीं है।

पुरुष मन कमसिन लडकियों की देह से खेलने के लिए ललचाने लगता है।’

‘तुम्हारी पत्नी की देह क्या इस खेल के लिए उपयुक्त नहीं है?’ मैंने उसे छेड़ा तो वह बोला, ‘वह तो बूढ़ी हो गई है। उसके स्तन लटक गए हैं। उसकी आग कोई ठंडी पड़ गई है। वह तो इन क्रियाओं को करने की इजाजत देना भी पाप समझती है।’ मैं मुस्करा पड़ी, तो क्या तुम बूढ़े नहीं हुए हो?’

‘मैंने कहा न, कि शरीर बूढ़ा हुआ है, मन अभी जवान है।’

‘तो क्या तुम मुझे संतुष्ट कर सकोगे? तुम्हारे शरीर में तो उत्तेजना आती ही नहीं होगी।’ मेरे यह कहते ही वह हंसने लगा, ‘शरीर की उत्तेजना से मेरा क्या लेना-देना…मन की उत्तेजना से मुझे मतलब है।’

‘लेकिन मुझे तो तुम्हारे शरीर की उत्तेजना से मतलब है। मुझे है तुम उत्तेजित कर छोड़ दोगे, तो मैं कहां जाऊंगी?’ मैं यह कहते-कहते चिंतित हो उठी।

‘इसी बात के तो मैं तुम्हें पैसे दे रहा हूं। तुम्हें होटल का इतना शानदार कमरा दिया है। जानती हो, इस कमरे का एक रात का किराया कितना है? पूरे एक हजार रुपए…’ यह कहते-कहते बूढा मेरे करीब आकर खड़ा हो गया। मैं उसे मना नहीं कर पाई। उसके मुंह में असली दांत तो थे नहीं…’ बनावटी दांतों से ही उसने मेरे नर्म और गुलाबी गाल को कसकर काट लिया। मैं दर्द के मारे बिलबिलाकर दो कदम पीछे हट गई। वह मुझे अव्वल दर्जे का यौन-रोगी लगा। मुझे दर्द से कराहते देखकर शायद उसे यौन-संतुष्टि मिल रही थी, क्योंकि वह बहुत ही खुश था। फिर वह मेरे नजदीक आकर बोला, ‘कपड़े उतार दो।’ मैं डर के मारे थर-थर कांपने लगी, ‘अगर मैंने कपड़े उतार दिए और इसने मेरे सारे शरीर को ही नोंच डाला तो क्या होगा? मेरी तो जान ही निकल जाएगी।’

इतने में वह बोला, ‘कपड़े उतारने के पांच हजार रुपए तुम्हें मिलेंगे। विश्वास न हो तो लो यह गड्डी संभाल कर रख लो।’

पांच हजार की गड्डी मुझ जैसी खूबसूरत लड़की के लिए कोई ज्यादा नहीं थी। मैं तुनकती हुई बोली, ‘मेरी कीमत तुमने पांच हजार ही लगाई है? तुम जैसे पोपले बूढ़े के हाथ तो कोई बुढ़िया भी नहीं आने वाली।’

मेरे यह कहते ही वह हंसने लगा, फिर बोला, ‘तो क्या है तुम्हारी कीमत…?’

‘मेरी कीमत तो बहुत है। तुम किश्तों में भी नहीं दे पाओगे।’ मैं इतनी मूर्ख थोड़े ही थी, कि अपनी कीमत लगाती।

उस बूढे ने दस हजार की एक और गड़ी बैग से निकालकर मेरी ओर सरका दी। फिर वह बोला, ‘अब तो तुम खुश हो?’

मैं धीरे से मुस्करा दी और एक-एक करके अपने सारे कपड़े उतार दिए। मेरी चिकनी जांघों देखते ही वह किसी भेड़िए की तरह मेरी जांघों पर टूट पड़ा और उन्हें जीभ से चाटने लगा। पसीने से नहाई मेरी जांघे चाटने में उसे जरा-सी भी घिन्न नहीं आ रही थी। फिर वह मेरी छाती को पकड़कर दांतों से गुदगुदाने लगा।

मैं अचानक ही सीत्कार उठी। मेरे शरीर में ज्वाला-सी धधक रही थी। ऐसी सेक्स की आग की ज्वाला, जो उसके कांपते हाथों की गर्मी पाकर और भड़कती ही जा रही थी। तभी वह मेरी आंखों की पलकों को चाटने लगा।

मैंने घृणा से अपनी सांस रोक ली, क्योंकि उसके मुंह से एक अजीब-सी दुर्गंध आ रही थी। मैंने आंखें मूंदकर दूसरी तरफ जैसे ही फेरनी चाही, उसने मेरे माथे पर अपने बनावटी दांत गड़ा दिए। मैं दर्द से अचानक ही चीख पड़ी और उससे स्वयं को छुड़ाकर कराहने लगी।

लेकिन वह वापस मेरे पास नहीं आया। लाल-लाल आंख किए मुझे ही घूरे जा रहा था। मैंने देखा उसके मुंह पर खून लगा हुआ था, वह अपनी जीभ से आड़ी-तिरछी चाट रहा था। मुझे लगा, अब मेरी नहीं बचेगी, तो मैं दौड़कर बाथरूम आ गई और सिटकनी लगाकर अपने आपको संयमित करने लगी। ‘मर्द कितना जानवर होते हैं।

जब कुछ नहीं कर पाते हैं तो गुस्से में औरत को नोंचना शुरू कर देते हैं। मैं यह सोच ही रही थी, कि वह कमरे से बाहर हो गया। मैं यह सोचने पर मजबूर हो गई, कि दुनिया की अधिक औरतें पुरुषों से पीड़ित हैं। मैं तो विवाह बंधनों से मुक्त हूं। अपना पुरुष बदल सकती हूं, लेकिन उन औरतों की पीड़ा की तो कोई थाह ही नहीं, जो विवाहित हैं। पति के मुंह से शराब की बदबू आए या पान मसाले की दुर्गध आए या फिर सिगरेट की उल्टी ला देने वाली बदबू आए, उन्हें तो बर्दास्त करना ही होता है।

इतना सोचकर मैं भी कमरे से बाहर आ गई और सीढ़ियां उतरती हुई नीचे हॉल में आ गई। इधर-उधर देखा तो काउंटर पर कोई नजर नहीं आया। मैं धीरे से दबे पांव हॉल से बाहर होती हुई गेट की ओर बढ़ गई। तभी मेरी नजर उस बूढ़े की कार पर पड़ी।

मेरा कलेजा धक-धक करने लगा। मैंने देखा, वह कार से शराब की दो-तीन बोतले निकालकर गेट की ओर ही आ रहा था। मैं गेट की दूसरी तरफ मुंह करके खड़ी हो गई। उसने मुझे देखा वह डगमगाते पैरों सं चला गया। शायद वह मुझे के लिए शराब की बोतलें ले जा रहा था।

उसके जाते ही मैं गेट से बाहर आ गई और पैदल ही सड़क पर दौड़ने लगी। मैं बुरी तरह से हांफ रही थी। एक खूबसूरत अकेली औरत के लिए दुनिया की राहें कितने पथरीली और कठिन होती हैं। मेरा तो दम घुटने लगा था। लेकिन मैं अब उतनी परेशान और चिंतित नहीं थी।

मेरे पास पूरे पंद्रह हजार रुपए थे। मैं किसी भी शानदार होटल में कुछ दिनों तक चैन से रह सकती थी। मैं उस शहर को ही छोड़ देना चाहती थी, जहां के पुरुष बूढ़े और मानसिक रोगी थे। मेरे लिए यह कितनी हैरानी की बात थी, कि अब तक मेरे संपर्क में आने वाले अधिकांश पुरुष बूढ़े ही थे।

इससे यह बात तो मालूम हो ही गई, कि एक कमसिन और खूबसूरत स्त्री के कद्रदान अधेड़ उम्र के पुरुष ही ज्यादा हैं। पैसे भी देने के लिए उन्हीं के पास हैं। युवा पुरुष सेक्स में संतुष्टि तो दे सकते हैं, पर पैसे खर्च नहीं कर सकते हैं।

उन्हें घर पर पैसों का हिसाब देना होता है। वे पूरी तरह से घर के मालिक नहीं होते हैं। बूढों का क्या, उनकी पत्नियां उन्हें घास डालती नहीं, बच्चे उनसे रुपए-पैसों हिसाब लेते नहीं, पत्नी की से उपेक्षित और आर्थिक रूप स्वतंत्र बूढे अपनी अय्याशियों पर आए दिन धन लुटाने के लिए पूरी तरह से आजाद होते हैं। मुझे धन कमाना है, तो बूढ़ों को फंसाना होगा। बूढों का साथ थोड़ा जोखिम भरा है, तो क्या हुआ? वे मेरे हुस्न का सही मूल्यांकन तो करते हैं।

तभी मैं फिर एक दूसरे होटल के सामने आ खड़ी हुई। अंदर आकर कमरे का पता किया, तो एक कमरा खाली था। मैं एडवांस पैसे जमा कर होटल के कमरे में आ गई। कमरे के अंदर की व्यवस्था बड़ी ही अनोखी और लुभावनी थी। सारे आधुनिक साजो-सामान कमरे में मौजूद थे। मुझे कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं थी।

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