Mein Apni Parchai se Bhaybhit
Mein Apni Parchai se Bhaybhit

Hindi Story: परछाई तो परछाई होती है। परछाई स्वयं की भी हो सकती है और दूसरे की भी। यहां तक कि पेड़ों की, पर्वतों की, मकानों की, महलों की, कोठियों की, चूहे की, बिल्ली की और शेर की भी होती है। कोई जीव, पदार्थ या वस्तु जो भौतिक रूप में होते हैं उनकी परछाई अवश्य होती है। परछाई इसलिए बनती है क्योंकि वह प्रकाश यानी उजाले के सामने होती है। यह प्रकाश सूर्य का भी हो सकता है और चंद्रमा भी। दीपक का भी हो सकता है, मोमबत्ती का भी हो सकता है और बल्व़ या ट्यूब लाईट का भी। कहने का सीधा अर्थ है कि हर जीव- जंतु और वस्तु  की परछाई होती है। लेकिन सुनने में आता है कि भूत -प्रेतों की परछाई नहीं होती है। यदि भूत -प्रेत देखे मैंने देखे होते तो उनके बारे में मैं प्रकाश अवश्य डालता। लेकिन ज़ब देखे ही नहीं तो उनके बारे में कैसे लिखता। भूत -प्रेतों ने भी कभी आकर मुझे बताया नहीं कि हम भी होते हैं और हमारी परछाई भी होती है। भूत प्रेत भले ही न होते हो या वे नहीं, लेकिन उनके नाम का भय ही इतना तगड़ा होता है कि मैं ही क्या अच्छे से अच्छे और बड़े से बड़े फ़न्नेखां की भी सीट्टी पिट्टी ग़ुम हो जाती हो जाती है। भूत क्या उसकी परछाई से भी डर लगता है। प्रश्न उठता है कि क्या कोई किसी की परछाई से डरता है? उत्तर मिलता है – ” नहीं।  “

           दूसरों की परछाई से भला कोई क्यों डरेगा और डरने की ज़रूरत भी क्या है। वह तो परछाई मात्र होती है। उससे किसी के नुकसान होने का अंदेशा भी नहीं रहता। इसके साथ ही यह भी कि परछाई भला किसी का क्या बिगाड़ सकती है। वह तो इतनी सीधी, सरल और स्लेटी कलर की होती है कि वह न तो किसी का बुरा ही करती है और न भला। ऐसी स्थिति में यदि परछाई अपने ओरिजनल रूप में भी सामने आ जाए तो भी डरने की कोई बात नहीं है। 

         अब दूसरा चौंकाने वाला प्रश्न उठता है – ” क्या कोई अपनी ही परछाई से डरता है? “

          इसका सीधा सा उत्तर मिलता है – ” बिलकुल भी नहीं। ” 

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           भला अपनी ही परछाई से कोई क्यों डरेगा ? आज तक तो ऐसा कभी सुनने में नहीं आया। शायद ही कोई माई का लाल अपनी ही परछाई से डरा होगा। लेकिन हो सकता है कि किसी भाग्यशाली को ऐसा सुअवसर मिला हो और उसे अपनी ही परछाई से डरने का सौभाग्य मिला हो। लेकिन इसकी संभावना बहुत कम यानी ज़ीरो बटा ज़ीरो ही होगी। अपनी ही परछाई से डरने की घटना अभी तक न तो किसी अख़ब़ार में  छपी और न कभी सुनने में आई। यदि कोई इस तरह की बात करता है तो लोग उसे ‘ गेलिया ‘ समझने की बुद्धिमानी तो कर ही सकते हैं। आदमी तो आदमी कभी पशु पक्षी भी ऐसी गुस्ताख़ी नहीं कर सकते। बुद्धि से विहीन विद्वान भी ऐसा करने की कभी ज़ुर्रत  नहीं करेंगे।  सीधी सी बात है कि कोई भी ‘ चतुर सुजान ‘ ऐसी  बुद्धिमत्तापूर्ण ह़रक़त नहीं कर सकता। लेकिन मेरे प्रिय मित्रों ! आपको यह जानकर परम आश्चर्य का झटका लगेगा कि मैं ही एकमात्र वह बंदा हूँ, जो इस महा ‘ मारी ‘ का शिकार हूं। मैं वह महान हस्ती हूं जो खुद ही से तो डरता हूं, लेकिन साथ ही अपनी परछाई से भी डरता हूं। है न मज़े की बात..! आप मेरी बात पर  हंसेंगे, खिलखिलाएंगे और शायद हंसते हंसते रो भी पड़ेगे और उसी दशा में रोते हुए कहेंगे -” भैयाजी ! इतना बड़ा और भयंकर मज़ाक हमसे क्यों रहे हो? भला ऐसा भी कभी होता है।कोई अपने आपसे भी डरता है? रही परछाई की तो यह तो यह असंभव और अनहोनी बात है। यह तो सरासर ग़लत बात है कि आप अपनी परछाई से डरते हैं। भला इसे कौन मानेगा। अपनी ही परछाई से डरने का तो कोई  स़वाल ही नहीं उठता है। लेकिन आपकी दिल खोल कर तारीफ़ करनी पड़ेगी। वाकई आप अच्छा नहीं, बहुत अच्छा और ऊंचे दर्जे का मज़ाक कर लेते हैं !”

            अब  मैं ऐसे विराट महापुरूषों को कैसे समझाऊं कि यह मेरे साथ होने वाली सच्ची घटना है। अब पहले जैसी बात नहीं रही है और न पहले जैसा माहौल रहा है। हर कोई डरा डरा, सहमा सहमा रहने लगा है। हर कोई एक अनजाने भय से भयभीत है। हर कोई किसी से मिलने से कत़राता है। कोई किसी की बात पर विश्वास नहीं करता है। झगड़े -फ़साद और हंगामे का कोई भरोसा नहीं। कब, क्या हो जाए कोई ठिकाना नहीं। ऐसी बात नहीं है कि अब सब कुछ ठीकठाक है। अब शहर का ही नहीं देश का हाल भी ठीक नहीं चल रहा है। देश ही नहीं अब तो विदेशों में भी बहुत कुछ घटित हो रहा है। अपने शांतिप्रिय देश में  माहौल बिगड़ता हुआ नज़र आने लगा है। मुझे तो बहुत बेचैनी और घबराहट होने लगी है। ऐसे माहौल को देखते हुए मैं बहुत डर गया हूं और डरता ही जा रहा हूं। आए दिन हिंसा, लूट, चोरी, बलात्कार, अपहरण, हत्या, खून ख़राबा, दंगा, मारपीट, झगड़ा आदि आदि। इन सब से माहौल बहुत बिगड़ गया है और बिगड़ता ही जा रहा है। मां, बहन और बेटियों की इज्जत दांव पर लगी है। हर आदमी दूसरे आदमी से भयभीत है। कब, कहां, कैसे, कोई उसके साथ कुछ भी कर सकता है। गला घोट सकता है, रूपये पैसे छीन सकता है।औरतों के साथ तो गले की चेन के अलावा और कुछ भी छीन सकता है। झूठ, बेईमानी, दगा़बाजी़ और लूट इस हद़ तक बढ़ गयी है कि हर कोई घर से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। मेरी तो हिम्मत ही नहीं होती घर से बाहर निकलने की। फिर भी इधर उधर देख कर, बहुत कुछ सोच और समझ कर घर निकलता हूं। अब तो एक्सीडेंट भी इतने बढ़ गये ज़रा सी “नज़र हटी कि दुर्घटना घटी ” वाली नौब़त आ जाती है। 

           लोगों से डरता ही हूं  लेकिन अब अपने आपसे भी मुझे डर लगता है। ऐसा लगता है की मैं मैं नहीं कोई और हूं। पता नहीं कब आवेश में आकर मैं ही अपना दुश्मन बन जाऊं। आजकल के बिगड़े माहौल में रहना और  सांस लेना मुश्किल हो गया है। पत्नी, बच्चे, बहू, बेटे, पोते, पोती आदि के प्रति एक अनजाना भय समा गया है। कहीं इनके साथ कुछ अनहोनी न हो जाए। हर कोई एकदूसरे का जैसे खून का ही प्यासा हो। समझ में नहीं आता कि मैं अपने आपसे ही क्यों भयभीत हूं। 

           अब अपनी तो ठीक ठीक, लेकिन ज़ब कभी मैं अपने ही घर या घर के आसपास घूमते फिरते अपनी ही परछाई देख लेता हूँ तो सिहर उठता हूं। मैं उस परछाई से इतना घबरा जाता हूं कि मैं वापस अपने पलंग पर जाकर बैठ जाता हूँ। मुझे इस तरह डरा, सहमा, घबराया हुआ देख कर मेरी अर्द्धांगिनी चिंतित होकर मेरे पास आकर पूछ बैठती है – ” अजी, क्या हो गया जो ऐसे डरे -चमके और  भयभीत हो! किसी ने कुछ कह तो नहीं दिया, किसी ने धमका तो नहीं दिया, किसी का कोई ख़तरनाक मैसेज़ तो नहीं आ गया।”

          मैं अपनी घबराहट और भय को काब़ू में करके कहता हूं – ” कुछ नहीं हुआ है मुझे, बस कभी कभी अपने आपसे डर जाता हूं..! “

          मेरी धर्मपत्नी बड़ी हिम्मतवाली है। वह बोली – ” अरे, तुम भी क्या हो?  अपने आपसे कबसे डरने लगे। तुम्हें तो मुझसे डरना चाहिए और तुम हो कि अपने आपसे डर रहे हो। “

           मुझे उसकी बात सुन कर हंसी आने वाली थीं, परंतु मैंने उसे रोक ली। मामला बिगड़ सकता था। मैंने धीरे से कहा – ” तुम ठीक कह रही हो, आजकल मैं अपने आपसे ही नहीं अपनी परछाई से भी डर जाता हूँ ।”

         ” अच्छा, यह तो वाकई बड़े अचरज़ की बात है। इससे पहले तो तुमने मुझे कभी बताया ही नहीं। खैर कोई बात नहीं अब लगे हाथ यह भी बता दो कि तुम खुद की परछाई से क्यों डरने लगे .. उस परछाई में तुमने ऐसा क्या देख लिया…!  “

             मैंने अपने भय पर काब़ू पाते हुए कहा – ” सच कहूं  ज़ब ज़ब मैं अपनी परछाई देखता हूँ तो वह मुझे अपनी नहीं किसी और की लगती है और वह मेरे पीछे इसलिए पड़ी रहती है ताकि वह मेरा अनिष्ट कर सके। मुझे तो ऐसा लगता है जैसे वह मेरा खात्मा करना चाहती है। “

            पत्नी ने मेरी ओर घूर कर देखा और बोली – 

            ” तुम्हारी ऐसी दशा होना स्वाभाविक है। आजकल लूट, ठगी, मर्डर, गुंडागर्दी आदि करके बड़ी राशि हड़पने के लिए बदमाश नये नये हथकंडे और त़रीके अपना रहे हैं। माहौल अब पहले जैसा नहीं रहा। जिधर देखो उधर हुड़दंग, नारेबाज़ी, जुलूस, रैली, जय श्री राम और अल्लाहू अकब़र के नारे उछाले जा रहे हैं। हिंदू -मुस्लिम, मंदिर – मस्ज़िद पर टी वी पर बहस और खुलेआम जनसभाओं में ये सारे मुद्दे उठाये जा रहे हैं। इन सबसे शांति तो भंग होगी ही। यह तो अपने देश की बात है, विदेशों में भी यही सब चल रहा है। रूस -यूक्रेन का युद्ध साल भर से अधिक हो गया है। अभी भी किसी निर्णय पर नहीं पहुंचा है। अरब -इज़राईल का युद्ध शुरू हो गया है। ऐसे और भी देश हैं जो लड़ लड़ कर इंसान और इंसानियत को खत्म करने पर तुले हुए हैं। अखबारों, टी वी चैनलों और दूसरे माध्यमों से बुरी, ख़राब और नकारात्मक खब़रों से बड़ी चिंता हो रही है। ऐसे हालात में तनाव और बेचैनी तो बढ़ेगी ही। एक प्रेम, शांति, सहिष्णुता और मानवीय भावनाओं वाला आदमी परेशान और दुखी तो होगा ही। तुम इन सब झंझटों के बारे में सोचना छोड़ दो। अपने दिमाग़ को इधर उधर भटकने मत दो। तुम खुद से डरना छोड़ दो और खुद की परछाई से डरना तो बिलकुल ही छोड़ दो। अपने आप पर भरोसा रखो। अपने आत्मविश्वास को जिंदा रखो। किसी और के बारे में सोचना बिलकुल ही छोड़ दो। तुम खुद के बारे में सोचो और आत्मचिंतन करो बाकी सब ठीक हो जाएगा। “

         मेरी धर्मपत्नी के इस तरह से समझाने और हिम्मत बढ़ाने से मुझमें आत्मबल का संचार हुआ। अब मैं अपने और केवल अपने बारे में ही चिंतन कर रहा हूँ।