Hindi Best Story: श्रीमति जी ने मेरे निर्णय को किसी विपक्षी पार्टी की तरह आड़े हाथों लिया, ‘क्या करोगे बारात में जाकर। जान न पहचान।’
एक समय था जब कोई युवा किसी युवती को मन ही मन अपनी दुलहन मानकर जीवनपर्यंत उसकी पूजा करता था। फिर समय बदला। थोड़ा खुलापन आ गया। युवक-युवतियां आपस में मिलने जुलने लगे। भागकर शादियां रचाने लगे। समय फिर बदला और इंटरनेट का दौर आ गया। असल दुनिया पर आभासी दुनिया हावी
होने लगी। मेरे एक आभासी फेसबुकिया मित्र हैं। दूसरे शहर में रहते हैं। उन्होंने शादी का आभासी निमंत्रण-पत्र फेसबुक पर मुझे टैगियाते हुए लिखा कि उनके सुपुत्र की शादी है। इस निमंत्रण-पत्र को ही असल निमंत्रण
मानते हुए बारात में जरूर पधारें। प्रतीक्षा रहेगी।
मित्र तासीर से कवि हैं। कभी उनसे व्यक्तिगत परिचय नहीं हुआ, लेकिन हमारी खासी मित्रता है। यह मित्रता ‘इस हाथ दे, उस हाथ ले’ पर आधारित है। वे फेसबुक पर मेरे द्वारा पोस्ट की गई रचनाओं पर आंख बंद
करके लाइक देते हैं। तारीफ में बड़े-बड़े कमेंट देते हैं। मैं भी बदले में उनकी रचनाओं को बिलानागा लाइक देता रहता हूं। इस प्रकार हमारी मित्रता खूब फल-फूल रही है।
मैं उनके निमंत्रण को नकार नहीं सका। उनकी होने वाली वधु मेरे कस्बे की ही थी। बारात का आगमन भी कस्बे में ही होना था। अत: मैंने बारात में शामिल होने का निर्णय लिया। श्रीमति जी ने मेरे निर्णय को किसी
विपक्षी पार्टी की तरह आड़े हाथों लिया, ‘क्या करोगे बारात में जाकर। जान न पहचान। फेसबुकिया पहचान भी कोई पहचान होती है भला? वे कौन से अपने रिश्तेदार हैं। कुछ न सही, कुछ तो देना ही पड़ेगा उपहार स्वरुप।
मैंने समझाया, ‘हमारा एक लेखकीय रिश्ता है। बारात दूसरे शहर से आ रही है सो वहां से और भी लेखक आ सकते हैं। उनसे मेल-मुलाकात हो जाएगी। दीगर शहर जाने की पंचायत है नहीं। इसी शहर का मामला
है। अच्छा होगा, हमारी आभासी मित्रता वास्तविक मित्रता में बदल जाए।
मैं विवाह स्थल पहुंचा। वहां पंडाल के सामने स्वागत बोर्ड पर लिखा था- फलां समाज का वैवाहिक उत्सव। मैं फौरन अंदर हो लिया। स्वागत पंडाल एकदम खाली पड़ा था। बारात का कहीं अतापता न था। मैं वहां अकेला बैठा बगलें झांकने लगा। बीच-बीच में वधू-पक्ष वाले कार्यकर्ता आते और टोकते, ‘यहां बैठे-बैठे क्या कर रहे हो, कुछ काम-धाम करवाओ। मैं किस-किस को स्पष्टीकरण देता कि भैया! मैं यहां पर एडवांस में पहुंचा बाराती हूं। इसलिए कुॢसयों की उठा-धरी में उनकी मदद करता रहा। रात्रि बारह बजे बारात पहुंची। खबर लगी कि रास्ते में बारात की बस का टायर पंचर हो गया था बस खाने का आखिरी सहारा रह गया था। तभी वधु-पक्ष वाले कार्यकर्ता आए और उनसे पूछने लगे, ‘आप लोग काफी लेट हो गए हैं। अब आगे का क्या प्रोग्राम है?
‘कुछ नहीं जी…, नाश्ता-पानी भी अभी नहीं लेंगे। बस चाय पिलवा दीजिए। वैसे भी जहां बस का टायर पंचार हुआ था वहीं पर सभी ने थोड़ा खा-खवा लिया था। सो किसी को खाने की जल्दी नहीं है। मेरी रही सही
उम्मीद जो नाश्ते में अटकी थी, जाती रही। चूहों ने पेट में दम तोड़ दिया। हाय! अब क्या होगा? फौरन चाय हाजिर हो गई। मैंने एक प्याला चाय पेट में उढ़ेली और मौका मिलते ही वहां से निकल भागा।
आंखें मलते हुए श्रीमति जी ने दरवाजा खोला। मेरा पेट भूख-भूख चिल्ला रहा था। मैंने मुंह छिपाने की कोशिश की तो श्रीमति जी पास आकर फुसफुसाईं, ‘मेरे प्रिय लेखक जी। आपकी सूरत क्यों उतरी है? चलो भूख
लगी होगी, मै खाना परोसती हूं। हफ्ते भर बाद उन्हीं आचार्य कवि का फेसबुक चैट आया- आप आए नहीं क्या? मैं चौंका, मैं तो था वहां! शायद मुझे पहचान नहीं पाए होंगे। इसलिए बहाना गढ़ते हुए लिखा- जरूरी काम से बाहर चला गया था, आदरणीय। उन्होंने फिर लिखा- चलो अच्छा हुआ! आप आए नहीं वरना बिला वजह परेशान होते। दरअसल शादी टल गई है। लड़की वालों ने एनवक्त पर मना कर दिया था, सो बारात ले जाने का खर्चा-पानी भी बच गया। धन्यवाद। उनका संदेश पढ़कर मेरी बुद्धि सुन्न पड़ गई। बाद में पड़ताल करने पर ज्ञात हुआ कि जिस बारात में मैंने शिरकत की थी, वह भी उसी समाज के किसी खड़ूस कवि के लड़के की थी। उनसे मेरा फेसबुकिया सामना आज तक नहीं हुआ था! उफ! आज अधुनातन आभासी दुनिया के कारनामें भी क्या-क्या गुल खिलाते हैं! मैं उस शादी को याद करके यदा-कदा गुनगुना उठता हूं- आभासी शादी में, फेसबुकिया दीवाना।
