Hindi Kahani: दिसंबर की एक ठंडी शाम में वह जल्दी- जल्दी काम निपटा रही थी कि घड़ी पर नज़र पड़ी। शाम के छः बज गए तो माया ने अपना पर्स उठाया और तेज़ कदमों से चलती अपने केबिन के बाहर आई। वहीं उसकी नज़र रिसेप्शन पर पड़ी। मिस मेरी एक अल्पव्यस्क युवक को कुछ समझा रही थी।
“क्या बात है..आज इतनी देर तक काम चल रहा है..”
“वो आज एक नया रिक्रुटमेंट है तो ऑडिटिंग समझा रही थी…” मिस मेरी ने मुस्कुरा कर जवाब दिया। आदतन उसकी बातों से बेतकल्लुफ माया यह कहते हुए निकली,
“नो नो मिस मेरी…काम अपनी जगह है और परिवार अपनी जगह..वक्त पर घर जाया करो!”
आभास जिसका पहला दिन था ऑफिस में भी और इस शहर में भी वह माया की बातों से प्रभावित हुए बिना न रह सका। उसे सहसा नर्सरी राइम याद आ गई।
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“वर्क वाइल यू वर्क एंड प्ले वाइल यू प्ले”
उफ़ वह बार- बार अपने बचपन में क्यों चला जाता है। ये भी सच है कि जो छूट जाता है वही तो याद आता है। स्वभाव से भावुक आभास अपने आप से बात करने लगा।
जब सभी बाहर की ओर निकलने लगे तो वह भी मिस मेरी के साथ हड़बड़ा कर बस की ओर बढ़ा। दरअसल यह एक ट्रैवल एजेंसी थी। जिसकी बस सभी एम्प्लॉई को घर तक छोड़ती थी। बस में काफ़ी दोस्ताना माहौल था। आभास आदतन चुप- चुप था तो मैनेजर खन्ना ने खड़े होकर सभी से उसका परिचय कराया,
“गायीज.. ये आभास हैं और मिस्टर आभास ये हमारी ट्रेवल टीम है। पहले दिन सबके नाम बताया तो तुम्हें कुछ भी याद न रहेगा ..धीरे धीरे सबसे मिलोगे तो बेहतर जान लोगे।”
“थैंक यू मिस्टर खन्ना” धन्यवाद की मुद्रा में हाथ जोड़े वह उठा मगर माया पर नजर पड़ते ही चुपचाप अपनी सीट पर बैठ गया।
माया की ओर से एक स्वाभाविक मुस्कान मिल गई जो उनके बीच एक सकारात्मक शुरुवात थी। तब से माया उसके रूटीन में शामिल हो गई। वह किसी और से बात करे या नहीं मगर ऑफिस आते – जाते माया का अभिवादन करना नहीं भूलता। जैसे – जैसे दिन बीतने लगे इस बात को ऑफिस स्टाफ भी नोटिस करने लगे। रीमा जो माया की मित्र थी अक्सर आभास की बात पर टोकने लगी थी।
“क्या बात है माया…युवाओं में तुम बड़ी लोकप्रिय हो रही हो..”
“मैं समझी नहीं…”
“गुड मॉर्निंग माया मैम.. बाय माया मैम! क्या चल रहा है..यह अब भी नहीं समझी.…।”
“क्या कुछ भी बोल रही हो ……।”
“मत समझो पर आगे के लिए तैयार रहो..कहीं कोई और सरप्राइज़ न मिले..।”
रीमा ने ऐसे कहा कि उसकी बातें माया के मन पर जा लगीं। आखिर उसने ऐसा क्यों बोला होगा ये बात मस्तिष्क में जा अटकी। वह तो सभी से अच्छी तरह बात करती है इसमें नया क्या है..आभास भी तो उसकी हर बात मानता है..शायद इसी वजह से रीमा ने ऐसी बातें सोच ली होगी…यही सब सोचती घर आई तो एक पुरानी दोस्त नीति का फ़ोन आ गया।
बातचीत के दौरान जब आभास के बारे में उसे बताया तो वह रीमा से एक कदम आगे निकली। उसने भी घुमा – फिरा कर वैसी ही बातें कर दी।
“युवा उम्र की संवेदनाएं अलग होती हैं और फिर तुम उसे जानती ही कितना हो। काम के जगह पर थोड़ी दूरी बनाकर रखना बहुत सी समस्याओं का हल होता है।”
“नहीं..नहीं! तुम गलत सोच रही हो! वह ऐसा नहीं है..!”
बस इतना ही कह सकी। पता नहीं क्यों उसे उसकी मासूम निगाहों पर यकीन होने लगा था और उस रोज उसका यकीन विश्वास में बदल गया जब नए साल की पिकनिक के दौरान सब चाय के लिए रास्ते में रुके थे। हमेशा की तरह वह बेखबर कार का दरवाजा खोल बाहर खड़ी थी तभी बगल से आते तेज़ ट्रक को देख आभास बिजली की गति से आया और खींचकर कार के अंदर बैठाया। उसे आवाक देखकर बोला,
“नैशनल हाइवे पर बड़ी गाड़ियों से सावधान रहना चाहिए..अभी कुछ हो जाता तो ..आपका परिवार है..बच्चे हैं कम से कम उनके लिए तो अपना ध्यान रखिए!”
पहली बार उसकी आवाज़ में गुस्सा था। जहां सभी लोग अपने में मशगूल थे वहीं उसे माया मैम का ध्यान था। उस दिन आभास ने सचमुच उसके मन में अलग स्थान बना लिया था।
कहते हैं न दो विपरीत गुण वाले दोस्त बन जाते हैं,वही हुआ। दो अलग उम्र और बेहद अलग शख्सियत के लोग दोस्त बन गए थे। जहां माया बड़ी होकर भी बिंदास थी वहीं वह छोटी सी उम्र में संजीदा था। माया आत्मविश्वास से लबरेज़ थी और आभास में मासूमियत कूट कूट कर भरी थी। आभास उसका ध्यान रखने लगा था और माया भी उसके लिए फ़िक्रमंद रहने लगी थी। कुल मिलाकर सब कुछ अच्छा चल रहा था कि अनायास ही सब बदल गया। उसके घर से टेलीग्राम आया तो उसे वापस अपने शहर जाना पड़ा।
फिर कुछ दिनों तक उसकी कोई ख़बर नहीं आई। ऐसा लगा जैसे यह सब बस इतने ही दिनों का था। कुछ लोग कम ही समय के लिए मिलते हैं और अच्छी यादें देकर चले जाते हैं ऐसा सोचकर माया ने भी संतोष कर लिया कि मदर्स डे के दिन माया के घर का डोरबेल बजा। जब दरवाज़ा खोला तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। हाथों में मिठाई का डब्बा लिए आभास खड़ा था।
“मैम! पापा ने तार देकर बुलाया था क्योंकि मेरी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर उन्हें ये खुशखबरी देने आए थे कि मेरा रिसर्च पेपर पब्लिश हो गया है। कई फॉरेन यूनिवर्सिटी से पीएचडी में दाखिले के लिए लगातार ही मेरे इंटरव्यूज चल रहे थे इसलिए कुछ खबर नहीं कर पाया। आज रात की फ्लाइट से न्यूयॉर्क जा रहा हूं। आपका आशीर्वाद लेने आया हूं।”
“मैं बहुत खुश हूं आभास! इस खुशी के मौके पर मुझसे क्या चाहिए बताओ…”
“बस आपका आशीर्वाद! आप नहीं जानती कि आपने मुझे क्या दिया है..मैं जब आपसे मिला था..अकेला था और आपसे मिलकर आत्मविश्वास से भरता चला गया..मेरी यह सफलता बस आपकी देन है!”
“बस बस! इतनी तारीफ़ मत करो.. सदा खुश रहो और ऐसे ही उन्नति करते रहो ..!”
माया ने उसके हाथों से मिठाई का डब्बा लेकर उसे गले से लगा लिया और उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए ढेरों शुभकामनाएं दीं।
शाम को जब उसे छोड़ने एयरपोर्ट पहुंची तो विदा करते वक्त बेहद भावुक थी। आभास जिसे सभी ने अलग- अलग दृष्टिकोण से देखा और परखा था,आज उसके स्नेह व समर्पण ने यह साबित कर दिया माया के प्रति उसके दिल में सच्ची भावनाएं थी।
इस नए शहर में वह न केवल दोस्त थी..सहारा थी .. बल्कि उसका पहला प्यार थी जो कोई भी शिशु निर्दोष रूप में अपनी मां से करता है। माया को बेटा मिल गया था। आभास जैसा बेटा पाकर वह आत्मविभोर थी।
