लाल आँचल-गृहलक्ष्मी की कहानियां
Laal Aanchal

Stories in Hindi: होली का त्योहार था। सारा संसार रंग में डूबा था मगर माँ सादे लिबास में थीं। पहली बार ऐसा हुआ कि रंगों भरे त्योहार में माँ का आँचल लाल नहीं था। उनके गोरे रंग पर लाल रंग खूब फबता। माँ जो होली के दिन सुबह से ही पूए पकवान बनाती थकतीं नहीं थीं। पर्व त्योहार के दिन उनका उत्साह देखते बनता था। उनका उत्साहित स्वभाव उनकी खूबसूरती में चार चांद लगा देता आज वह सभी चांद जैसे छुट्टी पर चले गए थे। उन्हें उदास देखना एक बड़ी सज़ा लग रही थी। वह भी ऐसी सज़ा जिससे निजात नहीं था।

कुछ महीनों पूर्व ही मेरे पिता जो इस परिवार की धूरी थे,जिनके इर्द गिर्द हम सारे ग्रह उपग्रह परिक्रमा किया करते थे परलोक सिधार गए थे। मन के स्मृति पटल पर जब भी वह दिन दस्तक देता है शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सुबह के समय हाथ में फ़ोन लिए बालकनी में बैठी बादलों में बनी आकृति देख रही थी तो एक राक्षस सी आकृति नज़र आई तो खुद को यह कहकर झटका दिया कि शायद कोरोना महामारी ने दिमाग पर असर कर दिया है।

सच कहें तो उन दिनों फ़ोन से भी एक भय सा हो गया था। न जाने कब किधर से एक बुरी ख़बर आ जाए। इन्हीं ख्यालों में खोई थी कि फ़ोन की घंटी बजी।

“दीदी मैं पटना जा रहा हूं। पापा ठीक नहीं हैं..।”

यह सुनते ही जब घर पर फ़ोन लगाया तो माँ ने कहा,” आ जाओ! शायद तुम्हें देख कर पापा आँखें खोल दें!”

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उफ़! तो सुबह सुबह बादलों में छुपा राक्षस मेरे ही पिता को लेने आया था। ऐसे भी इस महामारी के राक्षस ने जाने कितने ही माता,पिता व संतानों को लील लिया था।

आनन फानन में घर पहुंची तो पिता अंतिम यात्रा पर थे। माँ का व्याकुल चेहरा ह्रदय भेद रहा था। जिंदगी उस वक्त जैसे ठहर गई थी। सबकी आँखें बरस कर थक गई थीं। उनके अंदर की नमी तक सूख चली थीं जैसे नदिया के जल को समंदर आगोश में समेट लेता है ठीक वैसे ही पिता ने सबके दर्द का वरण कर खामोशी ओढ़ लिया था।

ऐसे में अमूमन जो कुछ होता है वैसे ही हो रहा था। लोग आ- जा रहे थे। पिताजी ने ताउम्र शानदार तरीके से पुलिस महकमें में अपनी सेवा दी थी कि उनके विषय में सभी के पास कहने के लिए कुछ न कुछ था जिसे उनके मित्र व रिश्तेदार साझा कर रहे थे। अपने वक्तव्य द्वारा उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे थे।

इस पूरे घटनाक्रम में मेरी नज़रें माँ पर टिकीं थीं। उनके सुहाग ने उनसे विदा ले लिया था तो माथे से सुहाग चिन्ह नदारद था। सफ़ेद संगमरमर सी रंगत कुछ और सफेद नजर आ रही थी। दुख ने उनके अंदर की लाली को भी सफेद जामा पहना दिया था। मेरे लिए उन्हें ऐसे देखना असह्य हो रहा था। हिम्मत जुटाकर मैंने आहिस्ते से उनके कानों में कहा तो वह मेरी ओर देखने लगीं।

“माँ मेरी एक बात मानोगी..तुम ऐसे रंग मत पहनो ..! हमें तुम्हें ऐसे देखने की आदत नहीं है..”

वो हतप्रभ थी। शोक संतप्त सफेद मुख ने जिस तरह से मेरी ओर देखा कि मेरी बात मुंह में ही रह गई। मैंने अपने दुख को अंदर ही घोंट लिया। यह सब कहने के लिए शायद वह वक्त सही नहीं था। उनसे किसी प्रकार की आशा करना मेरी गलती थी। किसी तरह दिल कड़ा कर वह वक्त गुजारा। कुछ महीनों तक सब ऐसे ही चला। उन्हें जैसे कोई होश ही नहीं था। कभी भी चौंक कर जगतीं कि पापा को दवा नहीं दिया और तब पलंग का वह खाली कोना मन के खाली कोने को कुरेदता तो और भी व्याकुल हो उठतीं!

आखिर ऐसे कैसे चलता। जिंदगी तो चलने का नाम है। चाहे किसी से कितना भी प्यार हो उसके लिए जिंदगी ठहर तो नहीं जाती। वह वक्त आ गया था जब मां को वापस उसी रूप में ढालना था जिसकी हमें आदत थी। कहते हैं वक्त बड़े से बड़े घाव भर देता है। इस बात के नौ माह निकल गए और होली आई तो माँ से मिलने गई।

त्योहार के शोर – शराबे के बीच मौका पाकर माँ से कहा,

” माँ ! तुम्हें पता है जब बच्चे अपनी माँ को देख कर हाथ- पांव मारते हैं तो बिंदी से आकर्षित होते हैं शायद हमलोग भी ऐसा ही करते होंगे…!”

“हां! तुम तो मेरे माथे की बिंदिया की दुश्मन थी। पहले गोद में आने की ज़िद्द करती और गोद में आते ही पहला काम मेरे माथे की बिंदी नोच लेती। “

“उस बिंदी का मैं क्या करती थी माँ …?”

“कुछ नहीं …थोड़ी देर ता.. ता…कर तोतली भाषा में कुछ कहना चाहती..जब मुझे कुछ समझ नहीं आता तो वापस चिपकाने की कोशिश करती थी…!”

“क्या मैं आपके माथे की बिंदी वापस चिपका पाती थी..?”

” ना मेरे बच्चे! उसके प्रति इतनी आकर्षित थी कि मुंह में लेकर उसका गोंद चाट चुकी होती तो भला वापस कैसे चिपकता..”

“अब लगा देती हूं माँ ! इसमें मेरे प्यार की गोंद है। ये तुम्हारे माथे से चिपकी रहेगी..”

मैंने एक मरून बिंदी उनके माथे पर चिपका दी और माँ का मुख वापस उसी ओज से दमक उठा।

“नहीं..नहीं…ये क्या कर रही हो तुम …पिता को गए दिन ही कितने हुए हैं..ऐसे में मुझे ऐसे देख कर लोग क्या कहेंगे..?”

” माँ ! मान लो पापा होते और ईश्वर न करे ..तुम्हें कुछ हो गया होता तो क्या वे अपना पूरा व्यक्तित्व बदल देते ..ठीक है अंदर में दुख होता मगर क्या कोई ऐसा चिन्ह अपनाते जिससे तुम्हारे न होने का तमगा उनके साथ चलता। प्लीज़ माँ ! तुम भी वैसे ही रहो न! प्रेम तो अंदर के भाव हैं उनका दिखावा जरूरी नहीं! तुम खुद सोचो न कि पापा का मन तुम्हें ऐसे देख कर कितना दुखी होता। वह तुम्हें हमेशा खुश देखना चाहते थे।”

मैं अपने दलीलों से उनके ऊपर हावी होने की भरपूर कोशिश कर रही थी। आखिरकार उन्हें मेरी बात माननी ही पड़ी।

मन से न सही पर हम बच्चों के लिए सही उन्होंने अपना पहनावा बदला। सादे कपड़ों की जगह थोड़े हल्के रंग के रंगीन कपड़े पहनने लगीं तो हमारे अंदर भी उत्साह ने जन्म लिया। उनके आँचल में लाल फूल खिल उठे तो हम बच्चे भी पूर्ववत हो गए। माँ ने हम बच्चों के लिए यह रूप अपनाया तो मन के समस्त तिमिर हट गए। अब पापा की जगह माँ हमारी धूरी थीं जिनके इर्द गिर्द हम उनके उपग्रह बन चक्कर काटने लगे।