भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
‘तुम समझती तो हो ना ममता, कि मेरा जाना बहुत जरूरी है?’
सामान बांधते हुए अचानक मकरंद ने ऊपर देखकर उससे पूछा।
शाम के चार बजे थे। बाहर तेज धूप थी। नीचे रास्ते पर से ट्राफिक की आवाज अविरत ऊपर बहती चली आ रही थी। अचानक जोर से ब्रेक लगने की आवाज, कुछ शांति हुई, फिर मोटर के स्टार्ट होने की आवाज। तनिक रुककर जिंदगी पुनः प्रबल वेग से गति करती रही बाहर के रास्ते पर।
परंतु लेस के पर्दो से ढंके उस छोटे से घर में तो जीवन थम गया था। धुंधले उजाले में घर मानो स्वप्न में देखे हुए किसी दृश्य सा परिचित फिर भी अपरिचित लगता था।
मकरंद अलमारी खोलकर अपने कपड़े बैग में रख रहा था। सूट, शर्ट, टाई, जुराब-सब अच्छे से रख रहा था। पलंग पर बैठी वह देख रही थी।
मकरंद ने जो सवाल किया उसके जवाब में उसने गरदन हिलाकर हाँ कहा और बाद में मुंह फेरकर सामने की दीवार को ताकती रही।
मकरंद तो अभी मात्र कपडे ही ले कर जा रहा था। वैसे देखा जाए तो सारे घर में मकरंद की ही चीज-वस्तुएँ थी ना! फर्नीचर, पुस्तकें, लेंपशेड और चित्र सबकुछ मकरंद की इच्छा से और उसकी पसंद का यहाँ लाया गया था, बसाया गया था। ममता का क्या था इस घर में? एक अलमारी, एक ड्रेसिंग टेबल, एक फोटो आल्बम और हाँ, रसोईघर।
पर मकरंद उदार था। उसने सब कुछ ममता को दे दिया। कुछ चीजें वह आते-जाते ले जाएगा- ऐसा कहा। घर छोड़कर जानेवाले को अब सारी वस्तुओं का मोह रखने के लिए कोई वजह भी नहीं थी।
ममता जड़वत् बैठी रही। देखती रही। मकरंद के कोई ‘और’ है, ऐसी खबर हुई तब पैर कट गए हों ऐसे वह चारपाई पर ढेर होकर गिरी थी। तब मकरंद बाहर गया हुआ था। टेबल की सफाई करते वक्त उसकी निजी डायरी हाथ लगी थी, और… राह चलते हुए पीछे से कोई निरा अनजान व्यक्ति पीठ में छूरी भोंक देता तो भी उसे इतना आश्चर्य नहीं होता! ‘आश्चर्य?’ हाँ, ‘आश्चर्य’ ही उसके लिए सही शब्द था। पर क्यों? किसलिए? मेरा क्या गुनाह-कसूर? तत्पश्चात् शुरू हुई एक अविरत पीड़ा। अनरुकी। रात-दिवस। आँखें खाली हुई। हृदय निचुड़ गया।
पर मकरंद बहत प्रामाणिक व्यक्ति निकला। ममता को पता चल गया है ऐसी खबर होते ही उसने ममता को सारी बात बता दी और निखालिसता भी कैसी? ‘ममता, मैं अन्य स्त्री को चाहता हूँ इसलिए तुम्हारा चरित्र थोड़े ही दागदार होता है? मैं तो अब भी तुम्हें भी चाहता हूँ। एक पुरुष दोनों को क्यों नहीं चाह सकता?’
तब उसे एक थप्पड़ मकरंद के मुख पर जड़ देने की इच्छा हो आयी और फिर वह रो पड़ी थी।
पर मकरंद को तो जाना ही होगा। विवाह विच्छेद इत्यादि की औपचारिकताएं पूरी होने पर वह ‘दूसरी’ से शादी कर लेगा। फिर भी उसने ममता से पूछा, ‘तुम समझती तो हो ना…’
किसी नाटक या उपन्यास में चित्रित घर छोड़ने के दृश्य से नितांत भिन्न यह दृश्य था। दहकती हुई रेत का एक खंभा हाहाकार करता हुआ उठा था और फिर ढह गया था। मात्र रेत का फैलाव।
सभी बैग को अच्छे से बंद करके, वह टैक्सी बुला लाया और- ‘चलो, ठीक है, काम-काज हो तो अवश्य बताना हाँ! डोंट बी अपसेट, टेक इट इजी’ – कहकर वह चला गया।
ममता को लगा, मानो घर कफन ओढ़कर सो गया था। अब वह निपट अकेली थी। पति ने जिसके किसी गुण की कभी कद्र नहीं की थी ऐसी ‘परित्यक्ता।’ तीन वर्ष पर्यंत शैयावत रही सास की सेवा-टहल करती हुई, मकरंद की नौकरी की शुरुआत में पाँच सौ रुपयों में घर चलाने वाली, ननदों की प्रसूति कराने वाली ममता…सब लोग ऐसा करते हैं। इसमें क्या? ऐसा ही चलता है। वर्ष बीते और मनुष्य में बदलाव आए। बदलाव नहीं आएगा तो दु:खी होगा।
पाँच बज गए थे। रसोई घर निपट ठंडा लगता था। सफेद फर्श मोर्ग की दीवारों की भांति निष्प्राण श्वेत चमक रही थी। ‘तुम क्या खाओगी?’ ऐसा सवाल मकरंद ने उसे किसी शाम पूछा नहीं था। ऐसा पूछने वाले घर छोड़कर चले नहीं जाते।
निपट अकेली।
उसका कोई नहीं था। पुत्री शुभांगी दूरस्थ पहाड़ों के बीच किसी बोर्डिंग स्कूल में खिल रही है। अपने माँ, बाप…कोई नहीं। मित्र, रिश्तेदार? शादी के बाद अपने कहे जाए ऐसे सम्बन्ध धीरे-धीरे छूटते गए थे और रह गए थे मिसिस मकरंद शाह के सम्बन्ध।
दीवारों से अकेलापन चू रहा था।
घर की चारों दीवारों की ईंटों में जान आयी थी और दीवारें धीरे-धीरे खिसकती हुई उस पर झूल रही थीं।
उसने दोनों हाथों से आँखों को दबा दिया। खूब रो कर जी को हल्का करना चाहिए, पर अन्याय और अपमान का यह जख्म ऐसा कातिल था कि मुंह से तीव्र चीत्कार निकल नहीं सकती थी।
वह ढेर सी बैठी रही। एक पत्थर।
‘क्या है आज खाने के लिए?’
‘आप जो चाहो बना दूँ।’
‘मैं तो क्लब में खा लूँगा।’
‘मुझे तो कुछ भी चल जाएगा।’
‘ऐसा किसलिए? कुछ अच्छा खाना बना लेना ना?’ बाद में झूठी हँसी।
‘ठीक है’ बाद में अपनी भी झूठी हँसी।
एक और पत्थर खिसका। एकदम उस पर लटक रहा।
‘यह पैंटिंग कौन लाया?’
‘मैं, क्यों? आज खरीदा। एक्जीबिशन से।’
‘मैंने कितनी बार कहा है कि मुझे ऐसे रोवासे पैंटिंग्स पसंद नहीं हैं। मेरे घर में मोडर्न पैंटिंग्स चाहिए।’
‘ठीक, तो बेडरूम में रखें।’
‘बेडरूम में? आर यू क्रेजी?’
दीवार से निकला हुआ एक पत्थर कपार पर लगा।
‘तुम्हें झोंपड़-पट्टी में क्यों काम करना है?’
‘झोंपड़-पट्टी में काम नहीं है। यह तो स्लम एरिया के बच्चों के लिए हम एक पाठशाला शरू करना चाहते हैं। जस्ट बालवाडी जैसा। मैं उसमें काम करना चाहती हूँ।’
‘मना कर देना। मैंने कई बार कहा है कि मेरे फ्रेंड्स की वाइब्ज को ब्रिज खेलने के लिए बुलाओं, लेडीज पार्टी करो, पर ना। यह सब छोडकर इस चक्कर में क्यों पड़ी?’
“ठीक।’
घर की दीवारें टूटती चली। स्मृतियों की दीवारें उसे निगल जाए उससे पूर्व उसे घर से बाहर निकल जाना चाहिए। वह खड़ी हुई। कपड़े बदलने का विचार आया। ‘अब किसके लिए?’ यह प्रश्न उठते ही पर्स हाथ में पकड़कर वह उतर गई।
रास्ते में कोई जाना-पहचाना मिलेगा।
‘सॉरी, आपके बारे में सुना! वेरी सॉरी। आप और मकरंद अलग हुए ना?’
‘इट इज ओलराइट।’
‘पर क्या हुआ?’ आपको जरा भी पता नहीं चला?’
‘जाने भी दो। अब उस बात तो छेड़ने से क्या मिलेगा?’
अथवा उसके पीठ पीछे कहेंगी:
‘क्या हुआ होगा? भाई के लक्षण ही ऐसे हैं तो बाई के भी ऐसे ही होंगे ना?’
‘ऊपर से कितनी अच्छी-भली दिखती थी!’
‘हाँ, अकारण किसी का वर-घर नहीं छोड़ता।’
सम्वाद…सम्वाद… उसके और मकरंद के बीच रहे अर्थहीन संवाद। उसके और समाज के बीच उच्चरित होने वाले दंभी संवाद, अथवा उसकी पीठ पीछे बोले जानेवाले सच्चे संवाद!
अब वह अकेली पड़ गई है। रास्ते पर चली जा रही है। कोई दिशा नहीं थी। कोई साथ में नहीं था। वह और उसका दुःख साथ-साथ चल रहे थे।
पीछे से आनेवाली सूर्य की किरणों में उसकी परछाई लम्बी होकर उससे आगे निकल गई। उसके आसपास असंख्य परछाइयाँ थीं- घर की ओर। वह छोटी थी तब उसने सांझ पर निबंध लिखा था। “शाम को पंछी नीड़ की ओर वापसी उड़ान भरते हैं।” आज उसे निबंध लिखना होता तो वह ‘घोंसला छोड़कर जा रहे पंछी’ पर निबंध लिखती। घोंसला खाली। घर खाली। अंतर में एक तानपूरा गूंज रहा था। ‘मकरंद ने छोड़ दिया…’ भयावह तन्हाई की रिक्तता में वह गहरे उतरती जा रही थी।
अचानक उसकी परछाई गुम हो गई और उसके बदले एक छोटी-सी परछाई उसके साथ हाथ फैलाये हुए थी। वह रुक गई। बाद में उसे खयाल आया कि वह एक कोने के आगे आकर खड़ी थी, जहाँ से उसकी परछाई सामनेवाली दीवार पर अंकित थी और कोने में छिपी बैठी एक छोटी सी बच्ची जल्दी से उठकर उसके समक्ष हाथ फैलाये हुए थी।
कितनी उम्र होगी उसकी? पाँच? तीन? दो काली आँखें, निष्पलक, उसकी ओर ताक रही थीं। उन आँखों में दुःख नहीं था। खुशी थी। उसे आश्चर्य हुआ। उसकी नजर वह लड़की जहाँ बैठी थी, उस तरफ गई। देखा तो हाथ-पैर रहित एक टूटी-फूटी गुड़िया के साथ वह खेल रही थी। खेल का आनंद अभी भी उसके मुख पर था।
शुभांगी की पुरानी गुड़िया, पुराने कपड़े आदि ऐसे बच्चों में बाँट दिये हों तो? वैसे भी घर का पुराना सामान निकालना ही था!
मकरंद ने उसे निकाला था ऐसे ही।
वह उस बच्ची के हाथ में दस पैसे का सिक्का रखकर आगे बढ़ी। अब उसने अपनी परछाई को पुनः पकड़ लिया। परछाई आगे ही आगे बढ़ती जा रही थी।
अचानक किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। वह चौंक गई। रुकी। मुड़कर देखा। एक स्त्री खड़ी थी। काली, पतली, निस्तेज। आँखों के नीचे काले गड्ढे और कपार पर झूलते हुए सफेद बाल, पर वह तुरंत पहचान गई। उसकी आवाज में उसे लगी हुई चोट का व्याघात था।
‘अरे किशोरी! तुम?’ एक क्षण में वह पंद्रह वर्ष पीछे लौटी। कॉलेज में उसकी बगल में
बैठनेवाली, काले लंबे बालवाली सुंदर युवती उसकी आँखों के समक्ष खड़ी हो गई।
‘किशोरी।’
‘ममता।’
दोनों एक सेकंड, बस तनिक एक-दूसरे को निहारती रहीं। दोनों के दिल में एक बड़ी दरार पड़ गई थी। पंद्रह वर्ष पूर्व के बरसों के लिए दिल कुछ छटपटी अनुभव कर रहा था।
‘मैंने तो तुम्हें पीछे से देखा फिर भी पहचान लिया। तुम ऐसी की ऐसी ही दिखती हो।’
प्रयत्न करने पर भी वह किशोरी को वे शब्द कह नहीं सकी। किशोरी समझ गई। म्लान हँसी। कहा, ‘तुमने मुझे पहचान लिया यही आश्चर्य। तुम यही ही कहीं रहती हो?’
‘हाँ, तीन एक बस स्टॉप पीछे। पर तुम…तुम यहाँ कैसे?’
‘मैं यहाँ रोज अस्पताल आती हूँ। मेरे हसबैन्ड को वहाँ भर्ती किया है।’
‘क्यों? क्यों?
उनकी दोनों किडनी फेल हो गई हैं। थोड़े थोड़े समय बाद डायालिसिस के लिए यहाँ आना पड़ता है।’
‘ओह…’ ममता आगे कुछ बोल नहीं सकी। वह किशोरी को देखती रही। किशोरी की आँखें भीगी हुई थीं। चेहरा दु:ख के कारण उजाड़ हुआ नहीं था बल्कि उदास और भीना लग रहा था।
ममता की परछाई दूरस्थ दीवार पर झूलने लगी। मकरंद दूर हट गया।
‘कौन से माले पर हो? मैं कल हालचाल पूछने के लिए आऊँगी। तुम्हें यदि रहना हो तो मेरा घर…खाली पड़ा है। कोई नहीं है वहाँ। मैं भी नहीं हूँ।’ उसके मन में ये वाक्य बोले गए पर वह चुप रही।
‘थेक्स। पर अब हम अपने गाँव वापस लौट जाएंगे।’ किशोरी ने कहा। चेहरे पर दुःख का स्वीकार।
‘क्यों? इसमें इतनी निराश क्यों होती हो किशोरी? अब तो किडनी ट्रांसप्लांटेशन भी होता है।’
किशोरी ने हल्का-सा नि:श्वास छोड़कर गरदन हिलायी। आकाश को चीर देनेवाली मेघगर्जना से भी वह इतनी कांप नहीं उठती।
वह कोई आसान थोड़े ही है? डोनर्स पचास हजार मांगते हैं। हम इतने पैसे तो दे ही नहीं सकते।’
अखबारों की सुर्खियों में चमकनेवाले चमत्कारिक ऑपरेशनों के भीतर हो रही इस सौदेबाजी की उसे जानकारी नहीं थी। उसे यह बात कहने के लिए पछतावा हुआ।
किशोरी के गाँव का पता लेकर वह अलग हुई। आगे बढ़ी। फिर रुकी। आगे ही आगे वह
कहाँ जा रही थी? कहाँ?
घर तो पीछे था। घर…घर में पति नहीं है। वह कशमकश में तनिक खड़ी रही।
‘घर में पति नहीं है तो क्या हुआ? घर तो है ना?’
‘हाँ…पर…’ वह सोचती रही।
‘क्यों? क्या वह घर अपने साथ ले गया है?’
‘ना…’
‘वह चला गया। उसने मुक्ति मांग ली। पर ममता, मुक्ति मांगनेवाले मुक्ति देते भी हैं, यह जानती हो ना?’
‘मुक्ति? पर…’
‘मुक्ति अर्थात् मुक्ति। फिर उसमें ‘पर’ की शर्ते कहाँ से आ गयीं?’
‘मेरी जिंदगी की परम वेदना के क्षण मे…।’
‘मुझे हँसी आती है ममता। आप स्त्रियाँ…सच कहना, वह वेदना का परम क्षण है या फिर आप स्त्रियों के मन में ऐसा बैठा दिया गया है?’
‘अर्थात?’
‘जिस जीवन में तुम्हारा अपना कहा जाए ऐसा कुछ भी तुम्हारे पास शेष नहीं था। तुम्हारी इच्छाएँ, तुम्हारे सपने, तुम्हारी स्वतन्त्रता सब कुछ किसी काल सन्दूक में भरकर तुमने गाड़ दिया था। उस जीवन की वेदना का क्षण, क्या गाढ़ वेदना का क्षण हो सकता है?’
वह उस दीवार का सहारा लिए खड़ी रह गई। किसके साथ संवाद चल रहा था यह तो मालूम नहीं था। पर यहाँ सच्चाई आघातजनक रूप से प्रकट होती थी।
वह सूरज के समक्ष खड़ी थी। परछाई पीछे पड़ रही थी।
‘वेदना का क्षण? कौन-सा क्षण? प्रदर्शनी से लाया हुआ चित्र मकरंद ने फेंकवा दिया वह क्षण? तुम चाहती नहीं थी फिर भी शुभांगी को बोर्डिंग स्कूल में रखवाया वह क्षण? झोंपड़पट्टी के बच्चों के लिए काम करने से रुकवाया वह क्षण? तुम्हारे साथ छल करके उसके साथ विदेश घूम आया वह क्षण? तो क्या वे क्षण उत्सवों के क्षण थे?’
वह घर वापस लौटी।
रात हो गई थी। मकान बत्तियों से जगमगाते थे। मात्र उसके घर में अंधेरा था। उसने जाकर दरवाजा खोला। दिनभर कुछ खाया नहीं था फिर भी खाने की इच्छ
ा नहीं हुई।
बाल्कनी का दरवाजा खोलकर वह बाहर बाल्कनी में आकर खड़ी रही।
मुक्ति का क्षण या परम वेदना का? बाहर असंख्य तारे झिलमिला रहे थे। चुपचाप। काफी…
देर तक वह बाहर के अंधकारयुक्त विश्व को तकती रही। उसके गाल भीग गए तब ख्याल आया कि उसकी आँखें निथर रही थीं।
किसलिए रो रही थी? पागल स्त्री! उसके समक्ष किशोरी का निश्वास जिंदा होकर दिखने लगा। कितनी स्वस्थता के साथ वह जिंदगी की सच्चाई को स्वीकार कर रही थी! और वह, टूटे हुए खिलौनों से खेलती, हास्यमंडित आंखोंवाली बच्ची और वे नंगे, भूख के मारे भटकते बच्चे और…’
धीरे-धीरे उसे लगा कि मानो वह अंधकार में पिघलती जा रही थी। उसके हाथ-पैर, धड़ सबकुछ अलग पड़ गया था। उसके अंगों से कोई सत्व निकलकर इस विश्व पर तैर रहा था। मानो वह विस्तार पाती जा रही हो…ज्यादा…ज्यादा…और ज्यादा…
उसका माथा आकाश को छू रहा था। पैर धरती पर थे। उसके फैले हुए सहस्त्राधिक सहस्त्र बाहुओं में रोते हुए असंख्य बच्चे थे।
उसके नीचे धरती घूम रही थी। पृथ्वी पर से आंदोलन उसकी ओर बहे चले आ रहे थे। वह देखती रही, अपार सहानुभूति और गहरी समझदारी के साथ। प्रचंड भूचाल और विनाशक। लहू से सनी हुई धरती पर युग युगादि से होते चले आ रहे विग्रह। उनमें से जन्म लेता मानव जाति का विध्वंस। बेशुमार नारियों के आँसु और अनाथों का क्रंदन। हिटलर के गैस चेम्बर में धकेले हुए यहूदी नर-नारियों की हृदय विदारक चीत्कारें और घोर अकाल में व्याकुलता अनुभव कर रहे मनुष्य, पशु। पृथ्वी पर मनुष्य प्रकट हुआ तब से शरू हआ द:ख और विनाश का इतिहास।
मकरंद उसे छोड़ गया, बस इतना ही? पर वह कहाँ असहाय, दु:खी और निराधार अबला थी?
वह थी जगत के सारे दु:खों की धड़कनें ग्रहण करनेवाली एक विराट संवेदना। घोंसला तो उसने स्वयं छोड़ा था। ममता ने। मुक्त तो वह हुई थी। मकरंद तो ढीले पंखवाला था। नीड़ के बाहर ही कहाँ जा सका है? परम वेदना का क्षण तो यही था। जिसे उसने भगवान माना था वही मंदिर से बाहर निकल नहीं सका। अब मंदिर की दीवारें तोड़कर मानव आत्मा विश्व में विश्वरूप हो गई थी।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
