gvalin ki kutiltaa,hitopadesh ki kahani
gvalin ki kutiltaa,hitopadesh ki kahani

Hitopadesh ki Kahani : पश्चिम देश में द्वारावती नाम की एक नगरी है। उसके एक भाग में एक ग्वाला रहता था। उसकी पत्नी बड़ी कुलटा थी। अपने नगर के प्रधान और उसके पुत्र, दोनों के ही साथ उसके अवैध सम्बन्ध थे I

कहा गया है कि जिस प्रकार काठ से आग, नदियों के जल से समुद्र, और प्राणियों से यमराज तृप्त नहीं होते उसी प्रकार कुलटा स्त्रियां पुरुषों से तृप्त नहीं होतीं ।

और भी कहा गया है कि स्त्रियां तो न दान से, न मान से, न चाटुकारी से, न सेवा से, न शास्त्र से और न शास्त्रोपदेश से ही सुधर सकती हैं। इसी कारण उनको भयानक माना जाता है।

क्योंकि गुणी, यशस्वी, सुन्दर रतिकला में निपुण, धनी और युवा पति को छोड़कर स्त्रियां झटपट ऐसे पुरुष के साथ निकल जाती हैं जो सदाचार और गुण से सर्वथा शून्य होता है। और भी कहा गया है कि विचित्र सेज पर भी नारी उतनी प्रसन्न नहीं होती जितनी कि पर-पुरुष के साथ दूब और कूड़े से भरी भूमि पर सोकर सुखी होती है।

एक बार वह कुलटा मुखिया के बेटे के साथ विहार कर रही थी कि उसी समय मुखिया स्वयं भी उसके साथ रमण करने के लिये उसके घर पर आ पहुंचा। उसे आया देख उस कुलटा ने मुखियां के पुत्र को तो बड़े बखार के पीछे छिपा दिया और स्वयं मुखिया के साथ आनन्द करने लगी।

संयोग की बात है कि उसी समय उसका पति भी अपने कार्य को समाप्त कर घर आ गया। उसे आया देखकर उस कुलटा ने उस मुखिया से कहा, “मुखिया जी ! तुम तो दण्डधारी हो । गुस्से से अपना दंड दिखाते हुए तुम यहां से निकल जाओ ।”

मुखिया ने वैसा ही किया ।

जब मुखिया चला गया तो ग्वाले ने आकर अपनी पत्नी से पूछा, “यह मुखिया यहां किस लिए आया था ?”

कुलटा कहने लगी, “किसी कारणवश यह अपने पुत्र से रुष्ट था। इसका पुत्र इसके क्रोध से डर कर भागा हुआ मेरी शरण में आया तो मैंने उसको बखार के पीछे छिपा दिया। मुखिया उसका पीछा कर रहा था । उसको सन्देह हुआ कि उसका बेटा यहां छिप गया है । वह भीतर आया और यहां खोजबीन करता रहा। किन्तु उसको अपना पुत्र मिला नहीं तो वह क्रोध में बड़बड़ाता हुआ यहां से चला गया है।”

यह कहकर उसने मुखिया के बेटे को बखार से बाहर निकलने के लिये कहा। मुखिया का बेटा बाहर आ गया। उसे देखकर ग्वाले को अपनी कुलटा पत्नी की बात पर विश्वास हो गया ।

कहा भी गया है कि पुरुष की अपेक्षा स्त्री का आहार दुगुना होता है, उसकी बुद्धि चारगुणा अधिक होती है, कार्यपटुता छः गुनी होती है और काम का वेग तो आठ गुना अधिक होता है।

दमनक कहने लगा, “इसीलिए मैं कहता हूं कि संकट उपस्थित होने पर उसका उपाय करना चाहिए ।”

करटक कहने लगा, “यह तो ठीक है । परन्तु दोनों में परस्पर इतना स्वाभाविक प्रेम हो गया है कि बस कुछ मत पूछो। इसमें फूट डलवाना अब उतना सरल नहीं रहा । वह तुम किस प्रकार कर पाओगे?”

दमनक कहने लगा, “उपाय तो करना ही होगा ।

“कहा भी है कि जो कार्य उपाय से हो सकता है वह पराक्रम से सम्भव नहीं है । एक कौए की पत्नी ने सुवर्ण सूप का आश्रय लेकर काले सांप तक को मरवा दिया था । “

करटक ने पूछा, “यह किस प्रकार ?”

दमनक बोला, “सुनाता हूं, सुनो।”