murkh badayi, hitopadesh ki kahani
murkh badayi, hitopadesh ki kahani

Hitopadesh ki Kahani : यौवनश्री नामक एक नगर में मन्दमति नाम का एक बढ़ई रहता था । उसकी पत्नी कुलटा थी । सारा नगर इस बात को जानता था और उसके कानों में भी इसकी भनक पड़ चुकी थी। इतना होने पर भी उस बढ़ई ने उसको कभी अपने प्रेमी के पास आते- जाते देखा नहीं था । किन्तु लोकापवाद के कारण वह चिन्तित रहता था ।

तब एक दिन बढ़ई ने निश्चय किया कि अब उसको पत्नी की परीक्षा कर ही लेनी चाहिए। उस दिन उसने अपनी पत्नी से कहा, “मैं कल प्रातः काल दूसरे गांव जाने वाला हूँ । मेरे लिए कुछ चना चबैना बांध देना।”

दूसरे दिन प्रातः काल होने पर बढ़ई उठा और नित्य कर्म से निवृत्त होकर अपना चबैना लेकर दूसरे गांव के लिए चल दिया। बढ़इन ने अपने पति के दूसरे गांव जाने की सूचना अपने प्रेमी को दे दी। उधर बढ़ई दूसरे गांव गया ही नहीं अपितु अपने घर के आस- पास ही छिपा रहा और जब उसकी पत्नी अपने प्रेमी को सूचना देने गई तो उस समय अवसर पाकर वह पिछले द्वार से अपने घर के भीतर घुसा और पलंग के नीचे छिप गया ।

कुलटा के प्रेमी को जब पता चला तो वह शाम होने से पहले ही अपनी प्रेमिका के घर चला आया। वह पलंग पर बैठा तो बढ़ई की पत्नी भी उस पलंग पर आकर बैठ गई। फिर वे प्रेमालाप करते रहे। उसी समय जब एक बार उस कुलटा ने अपना पैर पलंग से नीचे किया तो असावधान पड़े बढ़ई के शरीर से उसका स्पर्श हो गया ।

कुलटा समझ गई कि उसका पति किसी गांव नहीं गया है अपितु इसी पलंग के नीचे छिपा बैठा है। यह विचार आते ही वह अनमनी सी हो गई। उसके व्यवहार को देखकर उसका प्रेमी कहने लगा, “क्या बात है, आज तुम मेरे साथ प्रेम से रमण क्यों नहीं कर रही हो? क्या बात है, मुझसे रुष्ट हो ?”

वह कुलटा बोली, “तुम तो निरे मूर्ख हो । आज मेरे प्राणपति, जिनका बचपन से ही मेरे साथ प्रेम है, वे दूसरे गांव गए हैं। उनके बिना मनुष्यों से भरा यह गांव मुझे जंगल से भी सूना लगता है। उस पराये गांव में उन पर न जाने क्या बीत रही होगी। उन्होंने खाना खाया भी होगा कि नहीं। सोने के लिए कैसा स्थान मिला होगा, यह सब सोच- सोच कर मेरी छाती फटी जा रही है।”

उसका प्रेमी कहने लगा, “तो क्या उस बढ़ई पर तुम्हारा इतना प्रेम है ?”

वह कुलटा बोली, “अरे दुष्ट! तू यह क्या कहता है। सुन “जो स्त्री कठोर बातें सुनकर और क्रोध-भरी आंखों से देखी जाने पर भी पति के सम्मुख प्रसन्न होकर जाती है वह स्त्री धर्मगामिनी होती है।

“और भी कहा गया है कि नगर में हो या वन में, पापी हो या दुराचारी, कैसा भी पति हो वह जिसको प्रिय रहता है उस स्त्री को उत्तम लोक प्राप्त होते हैं।

” और भी कहा है कि स्त्री के लिए सबसे उत्तम उपहार उसका पति है, गहने नहीं । यदि स्त्री पति प्रेम के आभूषण से रहित हो तो गहनों से लदी होने पर भी वह सुन्दर नहीं लगती ।

“तुम तो पापी प्रेमी हो। मन की चंचलतावश फूल और पान की भांति मैं कभी तुमसे मिलूंगी और कभी नहीं भी मिलूंगी। किन्तु वर तो मेरा पति है। वह चाहे तो मुझे बेच सकता है। चाहे तो देवता और ब्राह्मण को दान में दे सकता है। अधिक क्या कहूं। मैं तो उसके जीते जी रही हूं। और उसके मर जाने पर मर मिटूंगी। मेरी यही प्रतिज्ञा है।

मनुष्य के शरीर में साढ़े तीन करोड़ रोयें होते हैं। जो पति, पत्नी के मर जाने पर स्वयं भी सती हो जाती है वह साढ़े तीन करोड़ वर्ष तक स्वर्ग लोक में निवास करती है।

“और भी कि सांप पकड़ने वाला मदारी जिस प्रकार चतुराई से बिल से सांप को बाहर निकाल कर पकड़ लेता है उसी प्रकार पतिव्रता स्त्री अपने पति को नरक से निकाल कर स्वर्गलोक में पूजित होती है ।

“यह भी कहा गया है कि जो पतिव्रता स्त्री मरे हुए पति की चिता पर उस का आलिंगन करके अपना शरीर त्यागती है, उसने भले ही सैकड़ों पाप क्यों न किये हुए हों वह अपने पति को साथ लेकर स्वर्ग में जा पहुंचती है। “

यह सब सुनकर वह बढ़ई मन ही मन कहने लगा, “मैं धन्य हूं। मेरी पत्नी तो प्रिय वादिनी और पति परायणा है । “

यह सोचकर उसके मन में उमंग उठी और उसने प्रेमी सहित अपनी पत्नी के पलंग को उठाया और उसको सिर पर रख कर आनन्द के साथ नाचने लगा ।

“इसी से मैं कहता हूं कि प्रत्यक्ष अपराध देख लेने पर भी मूर्ख पुरुष चिकनी-चुपड़ी बात से फिसल जाता है।”

यह कथा सुनकर बगुला कहने लगा, “इसके बाद राजा ने मेरा यथोचित सत्कार किया और फिर मुझे विदा कर दिया।

राजा का दूत वह शुक भी मेरे साथ आया है। यह सुनकर अब आप जो उचित समझें, वह कीजिये।”

राजहंस के प्रधानमंत्री चकवे ने हंसकर कहा, “स्वामिन्! इस बगुले ने परदेश में जाकर भी यथाशक्ति अपने राज्य का कार्य किया है। किन्तु प्रभो ! यह तो मूर्खों का स्वभाव ही है ।

“समय पड़ने पर वे सैकड़ों रुपया दे देंगे परन्तु झगड़ा नहीं करेंगे। यह तो समझदारों को सोचना चाहिए कि बिना प्रयोजन लड़ना मूर्खता का लक्षण है।”

राजा कहने लगा, “बीती रात पर विवाद करने से क्या लाभ? जो विषय सम्मुख है उस पर विचार करो ।”

प्रधानमंत्री बोला, “महाराज! मैं एकान्त में अपना अभिमत व्यक्त करूंगा। “क्योंकि वर्ण, आकार, ध्वनि, आंख और मुख के विकार से भी समझदार जन मन की बात जान लेते हैं। इसलिए मन्त्रणा तो एकान्त में ही करनी चाहिए।”

राजा उसको लेकर एकान्त में चला गया। तब चकवे ने कहा, “महाराज ! मैं तो समझता हूं कि हमारे किसी विरोधी की प्रेरणा से बगुले ने यह झगड़ा खड़ा किया है।

“क्योंकि वैद्य के लिए रोगी, विरोधी के लिए दुखी, विद्वानों के लिए मूर्ख और सज्जनों के लिए अच्छे वर्ण के जन ही जीवन होते है । “

राजा ने कहा, “जो तुम कह रहे हो वह ठीक हो सकता है। किन्तु कारण की खोज तो बाद में हो ही जायेगी। इस समय तो ऐसी अवस्था में अपना जो कर्तव्य है उस पर विचार करना है । “

चकवा कहने लगा, “महाराज ! इसके लिए तो यही उचित होगा कि उस राज्य में अपना गुप्तचर भेजकर उसका बलाबल जाना जाये ।

” अपने और पराये राज्य के कार्य तथा अकार्य का अवलोकन करने के लिए राजा के पास गुप्तचर रूपी नेत्र अवश्य होने चाहिए। जिस राजा के पास यह नेत्र नहीं हैं, वह अन्धा है।

“मैं तो यही उचित समझता हूं कि वह गुप्तचर एक अन्य व्यक्ति को भी अपने साथ ले जाये, इससे यह लाभ होगा कि गुप्तचर वहां रहता हुआ वहां की सब बातें जानकर उस अन्य व्यक्ति के द्वारा हमारे पास पहुंचा दिया करेगा ।

“कहा भी है कि किसी तीर्थ, आश्रम और देवता के स्थान पर शास्त्र की बातें समझाने के बहाने तपस्वी का भेष बनाए हुए अपने गुप्तचर विभाग से बात करे ।

” गुप्तचर वही हो सकताहै कि जो जल तथा स्थल दोनों ही स्थानों पर चल फिर सके। इसलिए बगुले को ही इस काम पर नियुक्त किया जाये। ठीक इसी के समान कोई अन्य बगुला इसका साथी बन कर जाये ।

“किन्तु महाराज ! यह सब काम भी गुप्त रीति से होने चाहिये। जिससे कि तीसरा व्यक्ति न जान सके । अभिप्राय यह कि तीसरे व्यक्ति के सामने पहुंची मन्त्रणा का भेद खुल जाता है। यही बात सन्देश भेजने में भी है। इसलिए राजा को चाहिए कि वह स्वयं मंत्री से एकान्त में बात करे ।

“देखिए, भेद खुल जाने पर जो उपद्रव खड़े हो जाते हैं उनका किसी भी प्रकार समाधान नहीं हो सकता। यह नीति के जानने वालों का मत है।”

मन्त्री की बात सुनकर राजा ने विचार किया और फिर बोला, “मुझे उत्तम श्रेणी का गुप्तचर मिल गया है ।”

मंन्त्री बोला, तब तो महाराज ! समझ लीजिए आपने संग्राम में भी विजय प्राप्त कर ली है । “

उसी समय प्रतिहार भीतर आया और प्रणाम करके कहने लगा, “महाराज ! जम्बूद्वीप से आया हुआ शुक द्वार पर विराजमान है।”

यह सुनकर राजा ने मन्त्री की ओर देखा । मन्त्री ने कहा, “अभी उसको अतिथिशाला में टिकाओ और बाद में यहां उपस्थित करना । “

प्रतिहारी दूत को लेकर अतिथिशाला में चला गया।

राजा कहने लगा, “अब तो समझो कि लड़ाई सिर पर आ गई है।” चकवा बोला, महाराज पहले ही लड़ाई छेड़ देना उचित नहीं है।

“क्योंकि वह सेवक अथवा वह मन्त्री दुष्ट है, जो बिना समझे पहले ही अपने स्वामी को युद्ध का या अपनी भूमि त्यागने का परामर्श देता है ।

” और भी कहा गया है कि शत्रु को युद्ध से जीतने का प्रयत्न न करे। क्योंकि विजय न तो निश्चित है और हो जाने पर वह नित्य भी नहीं है। दो योद्धाओं में किसकी विजय होगी इसका पूर्वानुमान करना अत्यन्त कठिन है।

” और भी कहा गया है कि साम से, दाम से, भेद से अथवा इन तीनों या एक-एक से शत्रु को तो टालना ही चाहिए।

“जब तक युद्ध सम्मुख नहीं होता तब तक तो जिससे बात की जाये वही अपनी वीरता की बात करेगा। दूसरे की सामर्थ्य देखे बिना किसको अभिमान नहीं होता ?

“यदि कोई चाहे कि वह अकेला ही किसी बड़े पत्थर का भार उठा लेगा तो यह सम्भव नहीं है। किन्तु यदि थोड़ा उपाय किया जाय तो यह भी सहज ही उठाया जा सकता है।

“यदि फिर भी युद्ध की स्थिति आ ही जाये तो परिस्थिति देखकर काम करना चाहिए। क्योंकि जिस प्रकार समय पर उद्योग करने से खेती सफल होती है वैसे ही नीति की रक्षा करने से चिरकाल में वह फलवती होती है ।

“प्रबल शत्रु जब तक अपने से दूर रहे तब तक उससे डरना चाहिए। किन्तु जब वह सम्मुख उपस्थित ही हो जाये तो फिर वीरता से उसका सामना करना चाहिए । विपत्ति आने पर धैर्य धारण करना ही वीरता का लक्षण है।

“वैसे भी चित्रवर्ण राजा बलवान् है। बलवान् के साथ युद्ध करना बुद्धिमत्ता नहीं कहलाती । यदि मनुष्य हाथी के साथ युद्ध करेगा तो उसको मृत्यु का ही सामना करना पड़ेगा।

“इसलिए मेरा निवेदन है कि जब तक दुर्ग न बना लिया जाये तब तक किसी न किसी प्रकार राजा चित्रवर्ण के दूत को यहां रख लेना ही उपयुक्त होगा ।

“क्योंकि दुर्ग की दीवार पर बैठा एक धनुर्धारी भी अनेक वीरों से और अनेक वीर हजारों से युद्ध कर सकते हैं। जो देश दुर्ग रहित होता है उसको कोई भी जीत लेता है। “दुर्ग लम्बी-चौड़ी खाई वाला बनाया जाना चाहिए। ऊंचे-ऊंचे प्राकार बनाये जायें और उन पर यन्त्र लगे हों। जल की भरपूर व्यवस्था हो । खाद्यसामग्री का वहां संग्रह हो, आने- जाने का गुप्त मार्ग हो और आकार-प्रकार में वह काफी बड़ा दिखाई दे । “

राजा ने पूछा, “दुर्ग के निर्माण कार्य में किसको नियुक्त किया जाये?”

चकवा बोला, “किसी निपुण व्यक्ति को ही नियुक्त करना चाहिए। अनजान व्यक्ति के हाथ में काम सौंपने से धोखा हो सकता है। मेरा विचार है कि सारस इसके लिए उपयुक्त व्यक्ति है । “

मंत्री के कथनानुसार सारस को बुलवाया गया ।

सारस के आने पर राजा ने उससे कहा, “सारस ! आप शीघ्र ही दुर्ग के योग्य स्थान खोजिए । “

सारस बोला, “महाराज, यह समीप ही जो इतना बड़ा सरोवर है इससे सुन्दर दुर्ग और क्या हो सकता है? बस इसके बीच वाले द्वीप में सब सामग्री जुटानी रहती है।

“तो ठीक है, तुम शीघ्र जाकर यह सारा कार्य कर डालो।”

उसी समय प्रतिहारी ने आकर सूचना दी, “महाराज सिंह द्वीप से मेघवर्ण नामक कौआ सपरिवार आया है। आपसे भेंट करने की इच्छा से वह द्वार पर बैठा है।”

राजा बोला, “कौवे तो सर्वज्ञ और दूरदर्शी होते हैं. इसका संग्रह कर लेना चाहिए।” मन्त्री बोला, “आपका कथन तो ठीक है। किन्तु कौआ स्थलचर है जलचर नहीं । . इसलिए अपने विपक्ष में नियुक्त व्यक्ति का संग्रह करना कहां तक उचित होगा। जो प्राणी अपना पक्ष त्याग कर पराये पक्ष में जा मिलता है वह मूर्ख अपने शत्रुओं द्वारा उसी प्रकार मार दिया जाता है जिस प्रकार एक बार एक नीलवर्ण नाम का सियार मारा गया था । “

राजा ने पूछा, “यह किस प्रकार ? “

मन्त्री ने कहा, “सुनाता हूं, सुनिये ।”