Pankh Story: अवनी अपने नाम के अनुरूप ही धैर्य और सहनशीलता की प्रतिमूर्ति है।वह खेलों के प्रति विशेष रुचि रखती है ।उसकी अभिरुचि को देखते हुए उसकी कक्षा अध्यापिका ने उसे विद्यालय स्तरीय खेलों में प्रतिनिधित्व करने का अवसर प्रदान किया।
वह आशा के अनुरूप विजयी भी हुई। शीघ्र ही उसका चयन जिला स्तरीय टीम में खेलने के लिए हो गया। उसे विद्यालय की पी०टी०ऊषा कहकर संबोधित किया जाने लगा।वह पलक झपकते ही विद्युत गति से दौड़ती थी। हमेशा दौड़ प्रतियोगिता में अव्वल आती थी। दिन हँसते-मुस्कुराते व्यतीत हो रहे थे।
अवनी के लाए हुए पदक देखकर माँ बाप फूले न समाते थे। अवनी अपनी बुआ के पास हिसार जा रही थी। ट्रेन का सफर था… रजनी के घने अंधेरे को चीरती हुई रेलगाड़ी तीव्र वेग से गंतव्य की ओर दौड़ रही थी.. साथ ही दौड़ रही थीं अवनी के हृदय की धड़कनें, जो रेलगाड़ी से भी तीव्र गति से निनाद करती हुई अपने स्पंदन से अवनी को भयभीत कर रहीं थीं।
पहली बार माता-पिता के बिना, अकेली वह यात्रा कर रही थी। मन को सांत्वना दिए हुए थी कि ” ट्रेन का डिब्बा खाली थोड़े ही है.. इतने सारे लोग हैं.. मुझे क्या दिक्कत हो सकती है.. ईश्वर मेरे साथ हैं।” बस यही सोचकर वह गंतव्य की ओर बढ़ रही थी कि अचानक ट्रेन दुर्घटनाग्रस्त हो गई ।बचाव दल मौके पर उपस्थित हो गया। अवनी अपने पैर खो चुकी थी। अब व्हीलचेयर ही उसका सहारा थी। धीरे-धीरे उसने स्वयं को एक अंधेरे कमरे में बंद कर लिया। समाज से नजरें मिलाना छोड़ दिया ।सभी सपने टूट कर बिखर चुके थे। टूटे हुए सपनों के टुकड़े अक्सर उसकी आँखों में काँच बनकर चुभने लगते थे और आँसुओं का एक सैलाब धीरे-धीरे अंतर्मन को भिगोने लगता था। माता पिता अवनी को समझाने का बहुत प्रयास करते थे किंतु सब व्यर्थ।एक दिन उसके परम मित्र शिवांश ने उसे अभिनव बिंद्रा की जीवनी पढ़ने के लिए दी। उस किताब को पढ़कर अवनी ने अपने टूटे हुए साहस को पुनः बटोरा और फिर से नए स्वप्न नयनों में जुगनू बनकर झिलमिलाने लगे ।अवनी ने शूटिंग में हाथ आजमाने का निर्णय लिया। वह निशानेबाजी करने लगी ।आज अवनी विश्व ओलंपिक में निशानेबाजी में स्वर्ण पदक जीतकर घर वापस आयी तो न केवल उसके माता-पिता अपितु पूरा देश उस पर गर्व करने लगा। मित्र के द्वारा दिए गए किताब रूपी उपहार ने अवनी के दिव्यांग तन को जैसे पंख ही दे दिए। आज वह रेडियो पर गाना सुन रही थी और साथ ही साथ उसे गुनगुना भी रही थी
” लगने लगे हैं पंख से तन में
बजने लगे हैं शंख से मन में”
खिड़की के पास खड़े हुए माता-पिता अवनी की खुशी को देखकर फूले नहीं समा रहे हैं।
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