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अतिथि देव-21 श्रेष्ठ बुन्देली लोक कथाएं मध्यप्रदेश: Ganesh Story
Atithi Dev

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Ganesh Story: शंकर जी किसी काम से बाहर गए तो पार्वती जी ने उबटन लगाया और स्नान करने को तैयार हो गईं। स्नान करने के लिए जाते समय मन में विचार आया कि नहाते समय कोई अतिथि आ गया तो? द्वार पर किसे बैठाएँ जो अतिथि को शिव जी के आने तक रोके रखे। कोई नहीं दिखा तो पार्वती जी ने उबटन छुड़ाने पर निकले मैल से एक पुतला बनाकर उसमें प्राण डाल दिए और बोलीं कि तुम मेरे प्रधान गण गणेश हो, जब तक नहा न लूँ किसी को अंदर न आने देना।

जो आज्ञा माँ। कहकर गणेश दरवाजे पर मुस्तैद हो गया। कुछ देर बाद शंकर जी का नंदी आया और प्रवेश करने लगा। गणेश ने रोका तो वह जिद करने लगा पर गणेश ने उसे अंदर न जाने दिया। वह गुस्से से पैर पटकता हुआ एक किनारे बैठ गया।

कुछ और समय बीता कि शंकर जी लौटे तो द्वार पर गणेश को देखकर चौंके लेकिन उसकी अनदेखी कर अंदर जाने लगे तो गणेश ने उन्हें भी रोका।

शंकर जी ने पूछा कि तुम कौन हो?

मैं गणेश हूँ – गणेश जी ने बताया।

ठीक है, मुझे अंदर जाने दो कहकर शंकर जी ने पैर बढ़ाया ही था कि गणेश ने फिर उन्हें रोक दिया। दोनों में बहस होने लगी तो शंकर जी क्रोधित हो गए। शीघ्र ही गरमागरम बातचीत, द्वन्द और युद्ध में बदल गई। शंकर जी नन्हें से गणेश की निर्भीकता से चकित थे ही, उन्हें गणेश के बल और युक्तियों को देखकर और अधिक अचरज हुआ। वह न केवल शंकर जी का वार बचाता, स्वयं भी शंकर जी पर बराबरी से आघात करने का प्रयास करता। अन्य राह न बचने पर शंकर जी ने गणेश का सर काट दिया। रक्त की धार बह चली।

रक्त की धार अंदर गई तो पार्वती जी जल्दी-जल्दी स्नान कर बाहर निकलीं। द्वार पर गणेश का सिर देखते ही चीत्कार कर रो पड़ी फिर बोली मेरे इस पुत्र पर किसने वार किया? मैं उसके प्राण लेकर ही रहूँगी।

तुम्हारा पत्र? कौन?, कब?. कैसे? शंकर जी ने आश्चर्य से पछा।

पार्वती ने पूरी घटना बताई तो शंकर जी ने कहा कि उनके लौटने पर गणेश ने उन्हें उनके ही घर में घुसने से रोका तो बात बढ़ गई और उन्हीं के वार से गणेश का सिर कट गया।

पार्वती जी को अत्यंत क्रुद्ध और शोकाकुल देखकर शंकर जी ने नंदी को भेजा कि जो भी माता अपने पुत्र की ओर से मुँह फेरकर सो रही हो उसके पुत्र का मस्तक ले आओ।

नंदी को एक हथिनी दिखाई दी जो अपने नन्हें पुत्र की ओर पीठ कर सो रही थी। नंदी चुपचाप उस गज शावक का सिर काटकर ले आया।

शंकर जी ने गणेश के धड़ को जोड़कर गणेश में प्राण डाल दिए। पुत्र को जीवित देखकर पार्वती जी बहुत प्रसन्न हुईं।

वह दिन गणेश जी के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है।

नन्हें से गणपति जी को एक जगह थोड़ा-सा चावल मिला। गणेश जी ने वह चावल उठा लिया। उनका मन हआ कि चावल की खीर खाई जाए। वे घर आये तो एक कटोरी में शक्कर रखी देख उन्होंने वह कटोरी उठा ली। फिर गाय के निकट जाकर उसे सीप में दूध दुहा और तीनों वस्तुएँ लेकर मैया पार्वती के निकट आकर बोले हे माँ खीर बना दो।

पार्वती जी ने कहा देखते हो दही बिलो रही हूँ, किसी और से बनवा लो। गणेश जी एक-एक कर सबके पास गए। हर कोई किसी न किसी काम में व्यस्त था। तब नंदी ने कहा कि लौंदा बाई के घर चले जाओ। वह बना देगी।

गणेश जी ने लौंदाबाई के घर जाकर कहा कि बहिन मेरे लिए खीर बना दो।

लौंदाबाई ने हाथ का काम छोड़कर कहा आओ भैया! पहले तुम्हारे लिए खीर बना देती हूँ, फिर बाकी काम कर लूँगी। उसने कड़छी में दूध डाला, चूल्हे पर रख लकड़ी में आग लगाई और धोने के बाद चावल और शक्कर दूध में डालकर ढक दिया। खीर बनी तो कड़छी भर गई। लौंदाबाई ने सोचा खीर उफनकर गिर न जाए इसलिए वह एक-एक कर बर्तनों में निकालने लगी। वह यह देखकर चकित रह गई कि घर के सब बर्तन भर गए फिर भी खीर कम नहीं हुई।

उसे सोच में पड़े देखकर गणेश जी ने कहा कि तुम्हें जिस किसी को खीर खिलाना हो उसे निमंत्रण दे आओ।

वह खीर ढककर निमंत्रण देने गई। लौटकर देखा तो रसोई में विविध पकवान बने रखे थे। लौंदाबाई ने सबको भरपेट भोजन कराया तो सबने इसका रहस्य जानना चाहा कि यह सब कहाँ से-कैसे आया?

लौंदाबाई बोली कि मैंने तो अतिथि को देव मानकर सेवा की थी, यह उसी का फल है। जो कोई घर आए अतिथि को देव मानकर सेवा करेगा उसपर श्री गणेश जी बहुत प्रसन्न रहेंगे। तब से अतिथि को देव कहा जाने लगा। अतिथि को देव कहकर और श्री गणेश को सबसे पहले पूजकर यह कामना की जाती है कि जैसे लौंदाबाई पर श्री गणेश प्रसन्न हुए वैसे ही हम पर भी हों।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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