एक और रामू
Ek or Ramu-Nariman ki Kahaiyan

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

बचपन की निगाह बहुत पैनी होती है और उस निगाह से किसी बड़े या छोटे, अमीर या गरीब या फिर प्रतिष्ठित या साधरण इंसान की ईमानदारी या बेईमानी नहीं छूटती। बचपन सबको समान देखता है, सबका दर्द महसूस करता है और सबकी खुशी में शामिल होता है, वह कोई भेद नहीं जानता।

उन दिनों मेरी उम्र नौ साल की रही होगी। पापा सरकारी नौकरी में थे और हम उनके साथ ही रहते थे। हमारे घर के पास ही पापा के दफ़्तर का सारा स्टाफ रहता था। खाना बनाने के लिए दो बावर्ची थे जो बारी-बारी से अपनी ड्यूटी निभाते थे और सफाई, बर्तन कपड़े आदि का काम करने के लिए एक नौकर था जिसे राम कहकर बुलाया करते थे। उसका असली नाम वैसे कुछ और ही था। कद साढ़े चार फुट, मोटा शरीर, छोटी-छोटी आँखें, बेडौल हाथ पैर, खिचड़ी बाल, पैरों में हमेशा फौजी जूते, भेड़ की ऊन का बना काला कोट और मटमैली-सी पेंट। यही था उसका व्यक्तित्व। उसका रंग गोरा था मगर चूल्हे के बर्तन माँजते और पानी के काले पतीले पलटते, उसकी असली रंगत छिपी रहती और कभी-कभार ही उसका असली रंग देखने में आता था। ग्यारह वर्ष की उम्र और उम्र जितने लोगों के ही काम की जिम्मेदारी। बचपन में कंधे पर इतना भारी बोझ। वह कंधे शायद इसीलिये बोझ उठा पाने में सक्षम हुए होंगे क्योंकि बाप था नहीं, गरीब मां न पढ़ा सकती थी, न ढंग से खिला सकती थी।

हर सुबह मैं उसे भाग-भाग कर पानी भरते देखती। वह कभी एक आवाज़ पर जवाब देता तो कभी दूसरी आवाज़ की दिशा में भागता। किसी की कमीज़ धोनी होती, किसी के पैंट की इस्त्री करनी होती तो किसी का नाश्ता उसके कमरे तक पहुंचाना होता। इस भागमभाग में अक्सर उसे स्कूल के लिये देर हो जाया करती और स्कूल में भी कभी काम न किया होने के कारण तो कभी किसी सवाल का संतोषजनक जवाब न दे पाने के कारण प्रताड़ना मिलती। मैं उसे पिटते या डांट खाते देखती तो क्रोध और दयाभाव मिश्रित रूप से मेरे चेहरे पर जन्म लेते। कभी-कभी मुझे लगता कि इसमें शायद दिमाग ही नहीं। स्कूल से वापस वह बाद में पहुंचता, उसके स्वागत के लिए काम पहले खड़े होते। वह भाग-भाग कर काम खत्म करने की कोशिश करता ताकि हम सबके साथ खेल सके मगर जैसे ही वह खेलने पहुंचता, किसी न किसी की कर्कश आवाज़ भी इस शिकायत के साथ पहुंच जाती कि उसे खेलने में वक्त बर्बाद करने के बजाय और बहुत काम करने थे। बेचारा रामू। अपना-सा मुंह लेकर लौट जाता। हम बच्चे दो पल के लिये उसके जाने का दुख मनाते और फिर खेलने में यह सोचकर व्यस्त हो जाते कि नौकर ऐसे ही होते हैं। खेल उनके लिए नहीं बने।

एक बार मैंने उसे पूछ ही लिया, “तू ठीक से पढ़ता क्यों नहीं? रोज़ स्कूल में मार खाने में शर्म नहीं आती? जवाब की जगह उसका सवाल था “अगर तुम्हें रात को ग्यारह बजे सोकर और सुबह पांच बजे उठकर सबकी नौकरी करनी पड़े तो क्या तुम पढ़ पाओगी?” मुझे चिढ़-सी हुई और मैंने कहा, ठीक है लेकिन तू साफ-सुथरा तो रह सकता है, अपने हाथ देख जरा कितने काले हैं।” उसका जवाब था, “तुम्हें अगर पूरे लंगर के बर्तन और चूल्हे से उतरे पतीले साफ करने पड़ें न, तो तुम्हारे हाथ भी गोरे नहीं रहेंगे।” मैं कुछ नहीं बोली और सोचने लगी कि नौकर होते क्यों है, अगर वे खेल नहीं सकते, ठीक से सो नहीं सकते, वक्त पर स्कूल नहीं जा सकते।

बचपन के हाथों में संवेदना व्यक्त करने के अलावा और होता ही क्या है। न तो वह शारीरिक श्रम दे सकता है न आर्थिक बल। मेरी हमदर्दी उसके साथ थी मगर मैं चाहकर भी उसकी कोई सहायता कर पाने में असमर्थ थी।

परीक्षाओं के दिन समीप आ चले थे। हमें ज्यादा बाहर रहने और खेलने की मनाही हो गई थी। अधिकतर समय किताबों के साथ ही गुज़रता था। स्कूल में अध्यापकों का और घर में पापा का शिकंजा कसा रहता। उन दिनों किसी और के बारे में सोचने या जानने की फरसत ही कहाँ थी. जो मैं ये देखती कि रामू अपनी पढ़ाई में कितना वक्त देता था, क्या उससे भी कोई सवाल पूछता था, क्या उसे भी कोई कहता था कि तू काम रहने दे, पढ़ाई कर। परीक्षाएं हो गई, कुछ दिनों बाद नतीजे भी आ गए। मैं अव्वल रहने की खशियाँ मना रही थी। जब उसे मिठाई देने गई तो वह मायस था। पूछा तो जवाब मिला-“मैं फेल हो गया हूं” और इतना कहते ही उसका गाल आँसुओं से भीग गये थे। मैंने कहा-“क्या तुमने ठीक से पढ़ाई नहीं की थी?” जवाब मिला, “मुझे काम से फुरसत ही कहाँ थी, कब पढ़ता?” कहने को तो मैंने यह कह दिया कि काम रहने देता या मुझे मदद के लिये कह देता मगर क्या वास्तव में वह काम छोड सकता था या मैं उसकी कोई मदद कर सकती थी? स्पष्ट था कि नहीं। हमारे साथ तो हमारे मां-बाप थे, हमें हर सुख-सुविधा मुहैया थी। मगर उस गरीब का दर्द किसी ने नहीं जाना था। उसके मन पर लगी चोट कोई न समझ सका था जो अपनी मां की गोद छोड़कर पराई जगह पराये लोगों के बीच आकर रहने लगा था।

वह बातूनी लड़का एकाएक खामोश हो गया था, हम बोलते भी तो संक्षिप्त-सा जवाब देता। वह अब खेलने भी नहीं आता था और एक दिन पता चला कि वह चला गया।

रामू क्या गया मानो सबकी नींद उड़ गई। सभी परेशान हो गए। इतनी सुबह कड़ाके की ठंड में उठकर पानी भरे? बाबर्ची का काम केवल खाना पकाना था, कमरों तक पहुँचाना नहीं, सो सब रसोई में आकर ही खाने लगे थे। अपनी प्लेट धोने का काम भी खुद ही को करना पड़ रहा था। कितनी व्यवस्थित हो गई थी सबकी ज़िदगी, मगर जैसे कहीं भीतर आक्रोश पलता था। सब रामू के बिना असहाय हो गये थे। उसे बहुत याद भी करते, खास तौर पर तब जब अपने कपड़े खुद धोने या इस्त्री करने होते। दिन गुजरते रहे।

एक सुबह मैंने देखा कि एक लड़का शांत भाव से पानी भर रहा था। पता चला, नया रामू आ गया था। वहां पहुंचने के बाद जैसे नौकर अपना नाम कहीं छोड़ आते थे और रामू शब्द ही उनकी पहचान बन जाता था। नया नौकर आ गया था, सभी के चेहरे खिल गये थे मगर डर भी था कि कहीं यह भी न चला जाये। इसलिये तय हुआ कि रामू केवल पानी भरे और बर्तन साफ करने तथा सफाई का काम करेगा और पढ़ाई भी करेगा। पगार पहले वाले ही की तरह और वक्त-वक्त पर पुरानी उतरने। यह रामू पहले वाले की तरह वाचाल नहीं था, खामोश रहता था और साफ-सुथरा भी। जब भी फुरसत में होता पढ़ाई करता। वह कभी खेलने नहीं आता था। बेशक हसरत भरी निगाहों में हमें खेलते देखता था। मैंने उससे पूछा, “तू खेलता क्यों नहीं हमारे साथ?” उसका जवाब चौंकाने वाला था। “मुझे पता है, पहले जो भाई यहाँ था, उसे खेलने पर डांट पड़ती थी और मुझे किसी से डांट सुनना अच्छा नहीं लगता।” मैं आश्वासन देती कि कोई नहीं डांटेगा, लेकिन वह नहीं माना था। स्कूल में भी उसे कभी डांट नहीं पड़ी। स्कूल में आता, थैला रखता, दिन भर के बर्तन साफ करता, पानी भरता और पढ़ने बैठ जाता। रात को सबको खाना पहुंचाता, सफाई करता, बर्तन धोता।

मानव मन की यह दुर्बलता है कि कई बार वह कोई बुरी आदत छोड़ भी देता है लेकिन मौका या कोई बैसाखी पाकर वह आदत फिर से जवान हो जाती है। शासक बनने की चाह कहीं न कहीं हर किसी में विद्यमान रहती है। वह चाहता है कि किसी न किसी पर तो हुक्म चला सके, अपनी सत्ता कायम कर सके। यहां भी ठीक ऐसा ही हुआ। ज़िन्दगी फिर उसी पुराने ढर्रे पर लौट आई, देर रात तक ताश की महफिलें जमतीं। जाहिर है, खाना खाने में देर हो जाती और जब तक सब अपने कमरों में जाकर सो न जायें, रामू को कहां आज्ञा थी कि वह सो सके। सुबह होती तो सबकी आवाजें उसे परेशान कर देतीं। “रामू, नहाने का पानी बाथरूम में रख दिया क्या?”

“जी साब रख दिया”

“रामू, ज़रा जल्दी से ये कमीज़ प्रेस कर दे। दूसरा हुक्म होता”

“अच्छा, साब”

“अरे रामू मेरा नाश्ता अभी तक क्यों नहीं लाया?”

“लाता हूं, साब।”

अब उसे भी स्कूल के लिये देर होने लगी थी। हम जाते-जाते पूछते, “रामू, स्कूल नहीं जाना है क्या?” उसकी बेबसी जुबान से तो कुछ न कहती, मगर आँखों में उतर आती।

हर मानव संवेदनशील होता है, कोई कम, कोई ज़्यादा, लेकिन संवेदनशीलता नौकरों और जानवरों के लिये शून्य क्यों हो जाती है? क्या वे किसी और मिट्टी के बने होते हैं? क्या उनके खून का रंग लाल नहीं होता? क्या उन्हें दर्द नहीं होता? भीतर सभी जानते हैं मगर बाहर अनजान क्यों बने रहते हैं?

धीरे-धीरे उसके हाथों पर कालिख और आंखों में आंसू ठहरने लगे। बीमार हैं तो क्या, काम से कैसे फुरसत मिल सकती थी, आखिर को तो नौकर ही था। नौकर शायद किसी और ही तरह के मनुष्य होते हैं। छुट्टी के दिन कुछ ज्यादा ही काम करने होते, जैसे लकड़ियां फाड़ना, हफ्ते भर के अपने कपड़े धोना बल्कि औरों के भी। बिस्तर, तकिए धुलने के लिए सब उसकी छुट्टी का इंतज़ार करते।

धीरे-धीरे उसकी जुबान भी तल्ख होने लगी। उसके होठों पर भी शिकवे आने लगे। जैसे कभी अगर मैं पूछ लेती, “रामू, क्या कर रहे हो?”, “दिखाई नहीं देता क्या?” उसका रूखा-सा जवाब होता है।

“स्कूल नहीं जाना क्या?” मेरा प्रश्न होता।

“फुरसत मिलेगी तो चला जाऊंगा।”

व्यवस्था के दोषों से लड़ते-लड़ते हम कब व्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं, हमें खुद भी एहसास नहीं होता और जब पलट कर देखते हैं तो पता चलता है कि वह मोड़ तो बहुत पीछे छूट गया है, जहां से अनजाने में ही कदम तल्ख राह पर मुड़ गये थे।

मैं भी कभी-कभी चिढ़ जाती और उसके रूखे बर्ताव पर कह देती, “बात नहीं करनी है तो मत कर, लड़ता क्यों है?”

एक बार अंकल ने मुझे उसे बुला लाने को कहा। मैंने उसे कहा, “रामू, तुझे अंकल ने बुलाया है। कहा है, जल्दी आओ।”

जवाब मिला, “दिखाई नहीं देता क्या, काम कर रहा हूं। मेरे कोई चार-चार हाथ थोड़े ही हैं। काम खत्म होगा तो आ जाऊंगा।”

मैंने जाकर वैसे ही कह दिया था और उस बेचारे को मेरे कारण मार पड़ गई थी। वह कई दिन तक मुझसे नाराज़ रहा था। बुलाने पर भी नहीं बोलता था, खामोश हो गया था।

हर साल की तरह इस साल भी परीक्षाएं आ पहुंची। फिर वही व्यस्त दिनचर्या। स्कूल और घर में पढ़ाई का शिकंजा। परीक्षाएं हो गई हम छुट्टियों में दादी के घर आ गये। जब वापस पहुंचे तो अगली क्लास की पढ़ाई भी शुरू हो गई थी। जाते ही पहले अपना परीक्षा परिणाम जाना, फिर रामू का। वह पास हो गया था. लेकिन मेरा बधाई संदेश लेने के लिये वह वहां उपस्थित नहीं था। पता चला वह एक बार घर गया, तो लौटा ही नहीं। उसने आने से इन्कार कर दिया था।

मैं मन ही मन सन्तोष अनुभव कर रही थी कि चलो अच्छा हुआ, अब उसे इतना सारा काम करने से छुट्टी मिल गई थी, लेकिन यह भी जानती थी कि कोई तो आयेगा ही क्योंकि नौकर के बिना सब अपाहिज थे, बेसहारा थे। नौकर सबकी ज़रूरत था।

मेरा बालमन यह सोचकर परेशान हो उठा था कि अब जो नया रामू आयेगा, क्या वह भी यूं ही चला जायेगा?

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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