Hindi Motivational Story: सुबह की ताजगी भरी हवा उसके शरीर को छू रही थी,हाई क्लास सोसाइटी की सबसे शानदार बिल्डिंग के तेरहवें माले पर बना ये आधुनिक सुख सुविधाओं से युक्त फ्लैट था आदित्य का।रात भर कुछ बेचैनी के आलम में बिताने के बाद, सुबह जल्दी ही आंख खुल गई थी,बाहर बालकनी में आकर खड़ा हो गया था वो,मेड को आवाज लगाकर उसने एक ब्लैक कॉफी की डिमांड कर दी थी।
“रोज तो बेड टी लेते हैं करीब साढ़े सात पर आज सुबह साढ़े पांच ही उठ कर बैठ गए और कॉफी चाहिए…” उसकी मेड राधा मन ही मन बड़बड़ाई।” इन बड़े लोगों का भी अलग ही जीवन जीने का ढर्रा है, पता नहीं उन्हें कुछ भी करके सुकून क्यों नहीं मिलता?”
रात ठीक से सो नहीं पाया था,इसलिए आदित्य की आंखें नींद से बोझिल हो रही थीं पर बिस्तर पर लेटते ही कभी बिजनेस की बातें तो कभी रोजी उसकी एक्स वाइफ से हुई बातचीत दिमाग में गूंजने लगती और वो बेचैन हो जाता।
कितनी मेहनत से उसने ये बिजनेस अंपायर खड़ा किया था,क्या था वो और आज क्या बन गया था,आज सोचता है तो उसे बरबस ही खुद पर गर्व करने को दिल करता है,कोई सोच भी नहीं सकता कि एक मध्यम वर्गीय परिवार से उठा लड़का,आज बिजनेस वर्ल्ड का बादशाह है।
तभी उसके मन में एक प्रश्न चुभने लगा,इस अंपायर को खड़ा करने और बनाए रखने की उसने क्या कीमत चुकाई,ये कैसे भूल सकता है वो?
बड़ी खुशहाल जिंदगी थी उसकी जब नई नई शादी हुई थी और रोजी उसकी जिंदगी में आई थी।वो हरदम खुश रहता,रोज दिन भर काम करता और रात को रोजी के लिए एक दोने में मिठाई और दूसरे में बेला गुलाब का गजरा लाता वो अपनी प्यारी पत्नी के लिए।
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दिन बीतते गए,रोजी की इच्छाएं बढ़ रही थीं और उसे फूलों के गजरे की जगह हीरों के हार की लालसा होने लगी,हमारा इकलौता लाडला सरकारी स्कूल में पढ़े ये उसे गवारा न था,
एक दिन बोल पड़ी वो, “आदि!सुनो!!क्यों न मैं भी जॉब कर लूं,कुछ पैसे भी आयेंगे,हमारा जीवन स्तर भी सुधरेगा।”
“क्या कमी है डार्लिंग हमारे जीवन में?अच्छे भले तो हैं,चैन से कट रही है”,निश्चिंत सा आदित्य कहता पर रोजी को कुछ भी अच्छा न लगता।
धीरे धीरे,रोजी की जुबान की तल्खी बढ़ने लगी,वो आदित्य को कुएं का मेंढक कह कर बुलाने लगी और उसके मना करने के बाबजूद भी एक प्राइवेट कंपनी के डायरेक्टर की पी ए बन गई।
आदित्य का धैर्य जबाव देने लगा था जब वो अपनी सीधी सादी पत्नी को ऑफिस जाते बेढंग कपड़ों और मेक अप की परतों में पुतता हुआ देखता,इतना अंजान नहीं था वो दुनियादारी से,रोज उसे लेट क्यों हो जाता है?क्यों वो चंद रूपयों की खातिर अपना सब कुछ दांव पर लगाने को आतुर है,ये सोचकर आदित्य का दम घुटता।
उसके रोकने और मना करने के बाबजूद भी रोजी की मनमानियां नहीं रूकी और एक दिन वो आदित्य को और अपने दुधमुंहे बेटे को छोड़कर चली गई हमेशा के लिए।
रोजी के जाने के बाद,बहुत दिनों तक आदित्य सुकून से सांस न ले सका,नन्हें बच्चे की परवरिश और अकेलेपन ने उसे उस बुराई की ओर धकेलना शुरू किया जिसकी वजह से नाराज होकर रोजी उससे अलग हुई थी।
आदित्य जिस जॉब में था वहां वो चाहता तो घूस लेकर बहुत पैसा कमा सकता था पर उसके संस्कारों और आदर्शो ने उसे ऐसा करने से रोक रखा था।आज रोजी के जाने के बाद,उसके मन में ज़िद आ गई थी कि वो रोजी को अब दिखायेगा कि वो कुएं का मेढ़क नहीं है,वो भी पैसा कमाना जानता है।
मन में लगी धुन ने और अपने अपमान की ज्वाला में धधकता आदित्य पूरी तरह हर काले काम में लिप्त होने लगा था,उसपर पैसे के अंबार लगने लगे थे…धीरे धीरे काम बढ़े,लोगों से ताल्लुक बढ़ने लगे और वो जल्दी ही रियल एस्टेट के काम में उतर गया,कामयाबी उसके कदम चूमने लगी थी।उसका छोटा सा मकान कब बड़े में ,फिर फ्लैट,प्लॉट्स, जमीनें उसके साम्राज्य में जुड़ती चली गई,इसका कोई हिसाब ही न था।
बेटे को उसने पढ़ने के लिए मसूरी के बोर्डिंग स्कूल में दाखिल करवा दिया था,छुट्टियों में उससे मिलने जाता शुरू में फिर व्यस्तता की वजह से अपने सब ऑर्डिनेट को ही भेजने लगा।वो पैसा बनाने की मशीन बन चुका था।
लग्जरी गाड़ियों की कतार थी उसके सुंदर आलीशान फ्लैट में,कई जगह फॉर्म हाउस थे उसके जहां वो सर्दी गर्मी में दिन व्यतीत करता,नौकरों की फौज हाथ बंधे खड़े रहती रात दिन…क्या नहीं था आदित्य के पास आज…समाज में शोहरत, जेब में अकूत संपत्ति,नाम, पद,रुतबा लेकिन नहीं था तो दिल को सुकून।
सब कुछ होते भी वो अकेला था,ऐसा नहीं था कि रोजी को पुकारता वो तो वो दौड़ी न चली आती,जरूर आती पर उसे दिल नहीं था रोजी को पुकारने का…दिल तोड़ कर गई थी वो उसका और आदित्य का स्वाभिमान आहत था इस बात से।
मेड कॉफी ले आई थी, अदित्य विचारों के भंवर से बाहर निकल आया था,उसने कॉफी पी लेकिन उसे कुछ स्वाद नहीं आया।उसका मन बेचैन था अभी भी,कमरे में गया,अपने टैब पर मनपसंद गजल सुनने लगा ,शायद कुछ सुकून मिले लेकिन नहीं,आज दिल का करार छिन ही गया था उसका।
थोड़ी देर बाद,गुनगुने पानी से शॉवर ली,बढ़िया ब्रेकफास्ट भी खाया पर चैन तो मानो रूठ ही गया था।
अपने ड्राइवर विक्की को कॉल कर बुलाया।चलो!मसूरी चलो…उसने आदेश दिया।
“मालिक!इस समय?”विक्की चौंका,अचानक?सब ठीक ठाक,छोटे साहब ठीक हैं?”
“ऑल ओके…बस मूड कर रहा है”।वो बोला और कुछ ही देर में सड़क के सर्पीले मोड़ों पर उसकी गाड़ी दौड़ रही थी।
ठंडी हवा चल रही थी,हल्की हल्की बूंदाबांदी थी बाहर,हरियाली का सम्राज्य था चारों ओर,उसे कुछ राहत महसूस हुई।
एक टपरी पर चाय उबल रही थी,उसने गाड़ी रुकवाई…विक्की फिर चौंका …”मालिक!यहां चाय पियेंगे?बड़े बड़े होटलों,बरिस्ता में चाय कॉफी पीने वाले को यहां क्या मजा आयेगा?” पर बॉस का आदेश था,रुकना ही था फिर।
चाय की मस्त महक से वातावरण भरा हुआ था,अदरक इलायची और लौंग की सुगंध से आदित्य को अपने पुराने दिन याद आने लगे।टपरी वाले ने एफ एम पर गाने लगा रखे थे…
ओ मेरे दिल के चैन…चैन आए मेरे दिल को दुआ कीजिए..
आदित्य को लगा कि ये उसके ही दिल की आवाज है,उसे कुछ हल्कापन महसूस हुआ,तभी कुछ गरीब मजदूर,उनकी पत्नियां और बच्चे आते दिखाई दिए,वो सब टपरी के पास आकर रुक गये थे,बच्चे ललचाई निगाहों से वहीं बनते समोसो ,कचौड़ियों को देख रहे थे।उनके मां बाप पर इतना पैसा कहां जो उन्हें कुछ खिला पाते।
आदित्य ने दुकानदार को पांच सौ का हरा नोट दिया,इन सबको पेट भरके समोसे,मिठाई खिलाओ,चाय दूध जो कहें दो..
वो सब भोंचक्के होकर आदित्य को देख रहे थे लेकिन उसने हंस कर कहा,जी भर कर खाओ,और चाहिए तो मै और पैसे दे दूंगा।
अब वो सब मस्त होकर खा रहे थे,खिलखिला रहे थे और बहुत सम्मान और प्यार से आदित्य को देखते जा रहे थे।
आदित्य को याद आ गया अपना बचपन जब वो कितनी गरीबी में भी अपने मां बाप के साथ गुजारा किया करता था, छह भाई बहन वाला बड़ा परिवार होने के बाबजूद भी कभी उसके मां पिता में लड़ाई नहीं हुई,वो सब मिलजुल कर रहते,संग हंसते और रोते और कितना चैन और सुकून था उसकी जिन्दगी में।
आज इन सबको देखकर वो सुकूनियत फिर से महसूस हो रही थी,इतना पैसा कमाया,गाड़ी बंगला बनाए,हर सुख सुविधा जुटाई,दुनिया का कोई ऐशो आराम नहीं था जो आदित्य के पास न हो पर सिर्फ सुकून ही गायब था उसकी व्यस्त जिंदगी में लेकिन ये एक कदम जो उसने आज लिया था वो उसे बहुत अच्छा लगा।
क्या दूसरों का पेट भर के इतना अच्छा लगता है? क्या कभी कभी उन लोगों को खिलाकर जो रोज भरपेट नहीं खाते,इतना सुकून मिलता है?आजतक इस अनुभूति से बिल्कुल अपरिचित था आदित्य लेकिन आज उसे इतना हल्कापन लग रहा था कि उसका दिल खुश हो गया।उसे आश्चर्य हो रहा था कि अभी तक मैंने सुबह शाम सिर्फ काम किया,न दिन को चैन ,न रात में आराम आया कभी लेकिन आज जैसी फीलिंग का ही न हुई?तो क्यों न आज से यही एक नया कदम उठाऊं अपनी जिंदगी में।
ड्राइवर को आवाज लगाई उसने,”चलो!आगे चलते हैं,अब बहुत अच्छा लग रहा है” ड्राइवर उसे आश्चर्य से देख रहा था,”कुछ देर पहले इतना चिड़चिड़ा रहे थे,अब कौन सा खजाना हाथ लग गया इनके?”
आदित्य गुनगुना रहा था…मुसाफिर हूं यारों…न घर है न ठिकाना…मुझे बस चलते जाना ..बस चलते जाना…।
विक्की उसे देखकर मुस्करा रहा था,अभी तो चिंटू बाबू से मिले भी नहीं,अभी इतने खुश हो गए पता नहीं इन बड़े लोगों के मूड का भी…पल में तोला,पल में माशा…
गाड़ी फिर से घुमावदार रास्तों पर तेजी से फिसल रही थी और आदित्य के चेहरे पर सुकून देखते ही बनता था, आज उसने जीने की नई कला जो सीख ली थी।
