दूसरी शादी-गृहलक्ष्मी की कहानियां
Dusri Shadi

Grehlakshmi Story: “जल्दी करो, बारात द्वार पर आ गई है और अभी तक दुल्हन के हाथों में मेंहदी ही लग रही है।” पार्लर वाली को देखते हुए रमा की सास कमला ने कहा।

रमा अपने हाथों में लगी अधूरी मेंहदी को देख कर अतीत में डूबी है, जब उसकी शादी उसके बचपन के दोस्त रितेश से हुई थी।

‘हम दोनों एक दूसरे के लिए ही बने हैं। जैसे राधा कृष्ण की है वैसे ही रमा रितेश की।’
यादों के भंवर में रितेश के गले में झूलती हुई रमा उस दिन को याद कर रही है जब रमा ने वेलेंटाइन डे पर उसे पहली बार आई लव यू कहा और रितेश ने उसे बांहों में भर लिया।

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‘यह वेलेंटाइन डे मुझे समझ नहीं आता मैं तो बस तुमसे प्यार करता हूं इतना जानता हूं।’

कितनी नसीबों वाली समझती थी खुद को वो जिससे प्यार किया उससे शादी के लिए कोई अड़चन नहीं आई। दोनों के परिवार वालों ने धूमधाम से रमा और रितेश की शादी करवाई।

रितेश को बचपन से फौज में भर्ती होने का मन था।
‘एक फौजी से शादी करके पछताओगी तो नहीं रमा कभी तुम। मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूं पर अपनी धरती मां से भी मुझे बहुत प्यार है। मैं देश की रक्षा के लिए अपनी जान भी दे दूंगा तो कम है। ‘

‘मुझे गर्व है खुद पर जो मैं तुम्हारी प्रेमिका और अब तुम्हारी पत्नी हूं।’

‘बस एक वादा करना होगा तुमको जब हमारी कोई संतान हो तो तुम उसे भी एक सच्चे सैनिक बनने की प्रेरणा देना। मुझे कुछ हो गया तो तुम दूसरी शादी कर लेना अपने बच्चे के भविष्य के लिए।’

‘क्या हो गया है तुम्हें रितेश? आज सुहागरात के दिन तुम कैसी बातें कर रहे हो। तुम्हें कुछ नहीं होगा।’

समय और परिस्थितियों ने उसके हाथों में लिखे मेंहदी से उस नाम को बदल दिया था। रितेश की जगह आकाश लिख रही थी पार्लर वाली।

जिसके साथ जीने मरने की कसमें खाई, सात फेरे लिए, उसी की मां उसकी दूसरी शादी करवा रही थी ।
जब उनके बेटे की देश की रक्षा के लिए जंग लड़ते हुए सीमा पर मौत हो गई ।

‘पूरी जिंदगी है बिटिया तुम्हारे पास, तुम्हें बहू बनाकर लाए थे। बेटा ही दुनिया से चला गया अब तुम ही हमारी बेटी हो, तेरा कन्या दान कर लूं तो चैन से अपने पति और बेटे के पास जा पाऊंगी।’

सास ने जब कहा तो गले लग कर खूब रोई थी रमा, ‘मांँ अपने पास ही रहने दीजिए मुझे। इन हाथों में मेंहदी आपके बेटे के सिवाय किसी के नाम की नहीं लगा पाऊंगी।’

‘रमा तुम मेरे बेटे के संतान की मां बनने वाली हो और मेरे बेटे की आत्मा तुम्हें इस तरह उदास और उसके वियोग में तड़पता देख तड़पती रहेगी। तुम यही चाहती हो क्या कि मेरे बेटे की आत्मा दुखी रहे। उसकी संतान उम्र भर पिता के प्यार से वंचित रहे।’

आकाश रितेश का बचपन का दोस्त था, वो रमा को पसंद करता था लेकिन कभी बताया ही नहीं क्योंकि वो जानता था रमा उसके दोस्त रितेश से प्यार करती है। वो अपने दोस्त को हमेशा खुश देखना चाहता था। कभी एहसास ही नहीं होने दिया कि वो रमा को मन ही मन कितना चाहता था।

अब जब उसका दोस्त रितेश इस दुनिया में नहीं रहा और रमा उसके बच्चे की मां बनने वाली है , यह समाज एक औरत जो कम उम्र में ही विधवा हो गई उस पर कुदृष्टि बिछाए रहता है।
मात्र इक्कीस वर्ष की ही तो थी रमा और उसकी शादी के छह महीने ही तो हुए थे जब रितेश को आतंकवादियों ने गोली मार दी।

यह खबर जब रमा तक पहुंची वो पत्थर की बुत बन गई थी। रितेश के पिता का दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई।

बड़ी मुश्किल से कमला ने खुद को और अपनी बहू रमा को संभाला। रितेश उसका इकलौता बेटा था जो शादी के कई सालों बाद कितनी मन्नतों से हुआ था।

बेटे और पति की अकस्मात मौत और जवान बहू जो उसके बेटे की संतान को जन्म देने वाली है, उसका इस तरह उदासी लपेटे रहना उसे कचोटता।
‘ मेरी फूल सी रमा कुम्हला रही है। कैसे जीवन भर अकेले अपने बच्चे की परवरिश करेगी।’ कमला को चिंता सता रही थी।

आकाश ने जब रमा की दूसरी शादी करवाने की बात कही तो कमला के सामने यक्ष प्रश्न मुंह बाए खड़ा था कि, ‘कौन करेगा शादी ?
एक विधवा से जो गर्भवती है।’

‘चाची, मैं रितेश की तरह आपका ही बेटा हूं। आपने बचपन से मुझ अनाथ को सहारा दिया। रितेश मेरा दोस्त मेरा भाई था। मैं उसकी सभी जिम्मेदारियों को उठाऊंगा। आप हमेशा मेरे साथ रहेंगी। अपनी जन्मदायिनी मां को तो देखा नहीं है पर आपमें हमेशा मां ही दिखी है। मैं रमा और उसके बच्चे को कभी कोई कमी नहीं होने दूंगा। वो जैसा चाहेगी उसके लिए वो स्वतंत्र है। पहले प्यार को भूलना आसान नहीं होता है पर जीवन में आगे बढ़ना जरूरी है।’

‘आकाश बेटा तुम ही समझाओ रमा को , खाना पीना बिल्कुल छोड़ दिया है। खुद के साथ बच्चे की सेहत कमजोर हो रही है। डॉक्टर ने खुश रहने के लिए कहा है, मैं अपने दुख को भूलकर इस पर पूरा ध्यान रखती हूं पर कब तक कर पाऊंगी।’

‘चाची आप चिंता मत कीजिए मैं रमा को समझाता हूं।’

‘हां बेटा तुम ही अब इसे समझा सकते हो। मेरी बात समझ ही नहीं रही है।’

आकाश रमा के पास जाकर खड़ा हो जाता है कमला के हाथों से फल की प्लेट लेकर। रमा अपने कमरे की खिड़की के बाहर एकटक देख रही है रितेश की राह।

‘रमा यह फल खाओ, खुद के लिए नहीं रितेश के लिए। उसका अंश तुम्हारे कोख में है उसे भूख लगी है।’

रमा ने एक सेब का टुकड़ा आकाश के हाथ में रखी प्लेट से उठाया और खा लिया।

‘यह हुई ना बात।
रमा तुमने अपना पति खोया है तो देखो चाची ने तो अपना पति और बेटा दोनों एक साथ खोया है। उनको देखो वो कितनी हिम्मत कर रखीं हैं। प्यार ताकत देता है ना कि कमजोर बनाता है। रितेश तुम्हारा पहला प्यार है, मैं उसे तुमको भूलने के लिए कभी नहीं कहूंगा। वो मेरा जिगरी यार था। तुम पर कोई जोर जबरदस्ती नहीं है , शादी का कोई दबाव नहीं बना रहा। मैं वैसे भी जिंदगी भर चाची की तुम्हारी और रितेश के बच्चे की पूरी जिम्मेदारी निभाऊंगा पर यह समाज शायद कल तुम पर उंगली ना उठाए सिर्फ इसलिए कह रहा हूं कि तुम दूसरी शादी कर लो। मैं दुनिया की नजरों में तुम्हारा पति रहूंगा और तुम मन से हमेशा रितेश की पत्नी रहना। ‘

बड़ी मुश्किल से खुद को समझाया था रमा ने दूसरी शादी के लिए।
आकाश ने जो निर्णय लिया कि वो अपने पहले प्यार को कभी दुखी नहीं रहने देगा वो पूरा किया।

आकाश ने रमा के बेटे का नाम रितेश रखा और बीस साल बाद वो भी देश की रक्षा के लिए अपने पिता की तरह फौज में शामिल हो गया यही तो चाहा था रितेश ने।
आकाश खुश था वो दुनिया की नजर में बेटा तो उसी का था और उसने अपने प्यार के सभी सपने पूरे किए।

‘मुझसे शादी करके तुम्हें क्या मिला आकाश कभी पत्नी सुख प्राप्त नहीं किया।’

‘तुम नहीं समझोगी रमा।’
आकाश अपने हाथ में रखे गुलाब को, आज चौदह फरवरी जो दुनिया के लिए प्रेम दिवस वेलेंटाइन डे है, रितेश की फोटो पर चढ़ा रहा है। यही सच्चा प्रेम है।