Betiyon ka Baap
Betiyon ka Baap

Motivational Story: बेटे की आस में एक के बाद एक पांच बेटियां हो गई मीना की। उसकी सास कमला को वंश बढ़ोत्तरी के लिए पोते का मोह घेरे हुए था।

पांचवी संतान के जन्म के बाद मीना की गिरती सेहत को देखकर डॉक्टर ने उसके  पति रितेश को साफ चेतावनी दी थी कि अब गर्भधारण मत होने देना वरना मीना की जान बचाना मुश्किल हो जाएगा।

उसकी सास कमला देवी पोतियों को बड़ी घृणा से देखती। उन्हें अपनी पोतियां बिल्कुल पसंद नहीं थीं। वो तो अपने बेटे की दूसरी शादी करवाने के लिए तैयार थी।

कमला जी का बड़ा बेटा रितेश दूसरी शादी करने के लिए तैयार ही नहीं हुआ।
” मां इसकी क्या गारंटी है कि दूसरी पत्नी से बेटा ही होगा। अगर  फिर बेटियां ही हुई तो तू मुझे तीसरी शादी के लिए बोलेगी। मैं अपनी पत्नी मीना से बहुत प्यार करता हूं। देख मेरी किस्मत में जो लिखा है मुझे वो स्वीकारना ही होगा। बेटा या बेटी ये किसी औरत के हाथ में नहीं वो तो भगवान की मर्जी है।”
 रितेश अपनी मां को क्या और कैसे समझाता कि पुरुष के शुक्राणु के कारण ही बेटे या बेटी का जन्म होता है।
लड़के या लड़की के जन्म में पुरुष ज़िम्मेदार होते हैं। पुरुष के शुक्राणु में मौजूद एक्स या वाई गुणसूत्र के आधार पर ही बच्चे का लिंग तय होता है। महिलाओं के पास एक्स एक्स लिंग गुणसूत्र होते हैं, जबकि पुरुषों के पास एक्स वाई लिंग गुणसूत्र होते हैं। जब महिला का एक्स गुणसूत्र पुरुष के एक्स गुणसूत्र से मिलता है, तो लड़की का जन्म होता है।जब महिला का एक्स गुणसूत्र पुरुष के वाई गुणसूत्र से मिलता है, तो लड़के का जन्म होता है। इसलिए, पिता का लिंग गुणसूत्र बच्चे के लिंग का निर्धारण करता है। क्या पता उसके पास ही सिर्फ एक्स एक्स गुणसूत्र हों वाई हो ही ना। फिर ऐसे में तो हर बार लड़की का ही जन्म होगा। किताबों में पढ़े इस ज्ञान को अपनी मां को समझाना व्यर्थ ही था क्योंकि कमला जी तो आज भी यही मानतीं हैं कि औरत जब नौ महीने अपने गर्भ में बच्चे को रखती है तो यह उसका ही दोष है कि उसने बेटी को जन्म दिया।

सुरेश के लिए बेटा और बेटी में कोई अंतर नहीं था। वह तो हर बार बेटी के जन्म पर खुशी होता था और यही समझता था कि उस पर  देवी मां की कृपा बनी हुई है।

“क्या बोल रहा है बेटी से सौभाग्य बढ़ता है। अरे! अंतिम संस्कार और मुखाग्नि भी तो बेटा ही करता है। तेरे वंश को बढ़ाने के लिए बेटा तो चाहिए ही। अपने वंश का अंत होता मुझसे नहीं देखा जाता।”

“मां दुनिया बदल रही है और सभी रीति रिवाज भी बदल रहे हैं। क्या हुआ अगर  हमको बेटा नहीं है तो… आजकल तो बेटियां भी अपने माता-पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होती हैं। “

रितेश मीना को नहीं खोना चाहता था। बेटा अगर हो भी जाए तो बड़ा होकर वो कैसा निकलेगा कुछ नहीं कह सकते। उसने अपने आसपास में कुछ ऐसी घटनाएं देखी थी जिसमें बेटों ने अपने मां बाप को वृद्धाश्रम में छोड़ दिया था।

मीना अपनी बेटियों से बहुत प्यार करती थी।  बेटा हो या बेटी एक मां के लिए तो दोनों बराबर ही हैं। दोनों के जन्म में समान पीड़ा से गुजरना पड़ता है एक मां को। वैसे भी बेटियां मां के ज्यादा करीब होती हैं और पिता की लाडली होती है।

“हम अपनी बच्चियों खूब पढ़ाएंगे  लिखाएंगे रितेश जी। “
“हां मीना तुम ठीक कह रही हो।”

जब बड़ी बेटी राधा का एडमिशन शहर के बड़े प्राइवेट स्कूल में करवाया था रितेश ने तो कमला तिलमिला उठी थी।

“लड़की जात को इतने महंगे स्कूल में पढ़ा लिखा कर क्या करेगा? बेकार में पैसों की बर्बादी है यही पैसे इनके दहेज के लिए जोड़ कर रख तो कोई बात है। हर महीने स्कूल में इतनी फीस भरना पैसे बर्बाद करने वाली बात ही है। बेटा होता तो कोई बात थी । पढ़ लिख कर बड़ा आदमी बनता और तेरा नाम रौशन करता। अपनी इन बेटियों को पढ़ाना ही है तो किसी सरकारी स्कूल में क्यों नहीं इनका नाम लिखवाता।”

“मां आप इस मामले में मत बोलिए।  बड़े सौभाग्यशाली होते हैं वो लोग जिनके घर बेटियों का जन्म होता है। मां बेटियां तो लक्ष्मी का रूप होती हैं । मैं  तो खुद को बहुत ही किस्मत वाला समझता हूं कि मेरे घर में पांच बेटियां हैं।”

“इनकी शादी और दहेज के पैसे जोड़ते जोड़ते तेरा आधा जीवन बीत जाएगा। बाकी तू कर्ज़े में डूबा रहेगा। अभी भी कहती हूं कि तू अपनी पत्नी को छोड़ दे और दूसरी शादी कर ले। देख मुझसे कोई उम्मीद मत करना। तेरे पिता ने सारी संपत्ति मेरे नाम कर रखी है और मेरा जिसे देने का मन करेगा मैं उसे ही दूंगी।”

“एक औरत होकर ऐसा क्यों कहती हो मां। हमें  नहीं चाहिए पिता की संपत्ति से कुछ भी। मैं अपनी मेहनत के बल पर अपनी बच्चियों को पढ़ाऊंगा।”

“नवरात्रि में देवी मां का व्रत रखतीं हैं आप भी और फिर कन्या पूजन करतीं हैं। फिर अपनी पोतियों से इतनी नफ़रत क्यों?” मीना ने समझाते हुए कहा था।

कमला ने जब देखा बेटा उसकी बात काट रहा है और वह ना तो दूसरी शादी के लिए तैयार हो रहा है और ना ही मीना को छोड़ रहा है । वो अपनी बेटियों के कपड़े लत्ते और उनकी पढ़ाई लिखाई पर खूब पैसा खर्च कर रहा है तो उसने एक दिन अपने रितेश से कह ही दिया…
“सुन रितेश मुझे सुरेश के पास छोड़ आ। उसकी पत्नी भी मां बनने वाली है। देखना वह जरूर हमारे वंश को बढ़ाने के लिए बेटे को ही जन्म देगी.. ना कि तेरी पत्नी की तरह एक के बाद एक पांच पांच बेटियां पैदा करती रहेगी।”

“मां आपको जो सही लगे वही कीजिए पर मैं मीना  और अपनी बेटियों को बेसहारा नहीं छोड़ सकता। आपका जब भी मन करे यहां हमारे पास आकर रहिएगा। कोई भी जरूरत हो तो निःसंकोच कहिएगा।”

कमला अपने छोटे बेटे सुरेश के पास चली गई। महीने भर बाद ही सुरेश की पत्नी ने एक बेटे को जन्म दिया। वो बहुत खुश थी उसकी मनोकामना पूरी हो गई थी। आखिर उसके वंश को बढ़ाने के लिए उसका पोता हो गया था।

सुरेश का बेटा दादी का लाडला बन गया और अपने मां-बाप का भी इकलौता बेटा होने के कारण लाड़ प्यार में बिगड़ गया।
उसका पढ़ाई में बिल्कुल भी मन नहीं लगता था। दिन भर अपने दोस्तों के साथ आवारा गर्दी करता। जुआ खेलने और शराब पीने की लत भी लग गई थी उसे।

सुरेश और मीना अपने बच्चियों की पढ़ाई लिखाई पर खूब ध्यान देते और उनमें अच्छे संस्कार भर रहे थे। एक तरफ मां बच्चियों को पढ़ाई लिखाई के साथ साथ घर का काम भी सिखाती और दूसरी तरफ पिता बाहर के काम में भी ट्रेंड कर रहे थे‌।  बैंक,पोस्ट ऑफिस, बिजली का बिल, राशन , गैस सिलेंडर लाना लगाना… हर तरह का काम वो पांचों बहने कर लेती थीं। रितेश और मीना को कभी बेटे की कमी महसूस ही नहीं हुई।

उनकी पांचों बेटियां राधा, रमा, श्यामा, कृष्णा, उमा। एक से बढ़कर एक थीं। रंग रूप में सुंदर थी उसी तरह उनमें गुण और संस्कार भरे हुए थे। सबसे बड़ी बेटी राधा शहर की सबसे बड़ी डॉक्टर, रमा शहर की सबसे बड़ी वकील, श्यामा चार्टर्ड अकाउंटेंट, कृष्णा आईएएस ऑफिसर और उमा बैंक मैनेजर थी। सभी अपने अपने प्रोफेशन में बहुत अच्छा कर रहे थे और अपने मम्मी पापा की उम्मीदों पर खड़े उतर रहे थे।

एक तरफ सुरेश अपने बेटे की हरकतों से परेशान था। वह कर्ज में डूब गया था। बेटा अपने पिता के नाम पर कर्ज ले लेता था और उसे चुकाता नहीं था। उसने दादी से जबरदस्ती गांव की जमीन वाले कागजों पर हस्ताक्षर करवाकर सब कुछ बेच दिया था।
एक दिन वह शराब के नशे में अपनी दादी से पैसे मांग रहा था। कमला ने मना कर दिया तो उसके गले की चैन छीनने लगा और उसे धक्का देकर  भाग गया। जिससे उसका सर दीवार पर टकरा गया।
सुरेश ने अपनी मां को खून से लथपथ देखा तो दौड़ता हुआ उन्हें अस्पताल ले गया। वहां रितेश की बड़ी बेटी राधा ने अपनी दादी का इलाज किया। उसने अपनी दादी को पहचान लिया था। वह जानती थी कि उसकी दादी उससे नफरत करती है पर इलाज के दौरान उसने अपने  कर्तव्य का पालन किया। अपना पूरा ध्यान सिर्फ मरीज के ठीक होने पर ही लगाया।

कमला जी के सिर से काफी मात्रा में खून निकल गया था। उनकी पोतियां अपना खून देने के लिए तैयार हो गई जब राधा ने देखा ब्लड बैंक में दादी के ब्लड ग्रुप ओ नेगेटिव का ब्लड नहीं मिल रहा था।
रितेश और मीना ने भी पुरानी सभी बातों को भुला दिया था।

कमला जी को जब होश आया तो उसने डॉक्टर को धन्यवाद किया।
” आज आपने मेरी जान बचा ली। मेरा पोता तो मुझे मार ही डाला था।”

“मैं तो लड़की हूं है ना दादी मां।”

कमला जी को अपने किए का पछतावा होने लगा। उनकी भी तो पांच पोतियां हैं और उन्होंने कई साल से उन्हें देखा भी नहीं था। जब पांचवी पोती का जन्म हुआ तभी वह छोटे बेटे के पास आ गई थी। छोटे  बेटे का बेटा यानी अपने पोते के जन्म पर बड़ा खुश हुई थी आज उसी पोते के कारण वो अस्पताल में मौत के मुंह में जाते जाते तक पहुंच गई थी वो तो उनकी पोती ने उन्हें बचा लिया। जरा भी देर होती उनके इलाज में तो शायद उन्हें बचाना मुश्किल था।
सुरेश और उसकी पत्नी सर झुकाए एक कोने में खड़े थे।

रितेश और मीना भी अपनी मां से मिलने आए तब उन्होंने डॉक्टर का परिचय बताया..
“मां तुम्हारा इलाज जिस डॉक्टर ने किया है वो तो हमारी बड़ी बेटी राधा है ।”

“क्या यह मेरी पोती है? इतनी बड़ी डॉक्टर! यह तो देवी मां का रूप ही है । यह मेरा इलाज समय पर ठीक से ना करती तो आज तेरी मां जिंदा ना रहती। मैं बहुत बुरी हूं मुझे माफ कर दे बेटा।”

” मां माफी मत मांग। यही तो कहता था मैं आपको हमेशा की लड़कियां देवी का रूप ही होती हैं।”

” हूं ना मैं बहुत सौभाग्यशाली मां जी… पांच बेटियों की मां जो हूं।” मीना ने सिर पर आंचल रख अपनी सास के पैर छूते हुए यह सब कहे। तब कमला जी बोलीं…
“हां बहु तू बहुत ही सौभाग्यशाली है मुझे ही यह बात समझने में बहुत देर हो गई। “

 अस्पताल से जब छुट्टी मिली तो वह इस बार अपने बड़े बेटे रितेश के घर पर ही थी उनकी पांचों पोतियां उनके पास बैठी हुई थी।
 कमला ने अपने बच्चों से माफी मांगी…
” मुझे माफ कर दो मेरे  बच्चों। मैंने बहुत भला बुरा कहा है तुम लोगों को अपनी सारी संपत्ति भी मैंने छोटे बेटे के नाम ही कर दी। तुम्हारी बेटियां हैं इसलिए रितेश तुमको मैंने कुछ नहीं दिया। ये मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। हमारी सारी संपत्ति सुरेश के बेटे ने बेच डाली है। सुरेश और उसकी पत्नी दर-दर की ठोकरे खाने को मजबूर हो गए हैं।”
“नहीं मां वह मेरा छोटा भाई है और अब वह हमारे साथ ही रहेगा।”
 सुरेश जो कि अपनी पत्नी के साथ दरवाजे पर ही खड़ा इसी विचार में था कि अपने भाई से किस मुंह से मदद मांगू।
भाई की बात सुनकर वो अंदर आया और अपने भाई के गले लग गया।
“अरे! भाई पुरानी सभी बातें भूल जा और आज से तूं हमारे साथ ही रहेगा। मुझे तो गर्व है खुद पर मैं बेटियों का बाप हूं।”

रितेश की पांचों बेटियों ने अपने चाचा चाची के पैर छूने लगी तो सुरेश ने हाथ जोड़ लिए।
” बच्चियों माफ कर दो अपने चाचा को। बेटियां पैर नहीं छूतीं वो तो देवी मां का रूप होती हैं।”