बेटे ने हाईस्कूल की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास की…और  मम्मी से जिद कर रहा था कि…बाइक दिला दो…लेकिन आज कल की मम्मी इतनी जल्दी कोई भी चीज कैसे दिला दें…लड़के की जिद को कई दिन बीत गए…लेकिन बाइक नहीं आई…ये सब देखकर दादी को बड़ा गुस्सा आता था…रोज अपने पोते की आंखों में आंसू देखकर…दादी ने अपनी बहू को एक दिन सुना ही दिया..कि मेरे पोते को बाइक क्यों नहीं दिला रही हो…वो इतने दिनों से बाइक मांग रहा है…लेकिन बहू भी बहू होती है…सास से बोली…अभी  इसकी उम्र नहीं है..बाइक चलाने की…लड़का बिगड़ जाएगा..मां नहीं मानी.।

सास को और भी ज्यादा गुस्सा आ गया…उसने अपने बेटे को फोन किया और बहू की हरकतों को बताया…

लेकिन बेटे ने भी अपनी पत्नी का साथ दिया और बेटे को बाइक नहीं दिलाई..। दो दिन बीत गए…सास गुस्से में रही..सास का इमोशनल ड्रामा स्टार्ट हो गया..खाना-पीना बंद कर दिया।…दिनभर मुंह फुलाकर इधर से उधर बैठे रहना…बात बात पर बहू को ताने सुनाना…बहू की हर बात का जवाब देना…बेटे-बहू के सामने अपने पोते पर प्यार लुटाना…और कहना कोई नहीं मैं जबतक जिंदा हूं …तबतक हर चीज दिलवाऊंगी…दादी-पोते का प्यार देखकर बेटे का पिघलने लगा…और अपने बचपन के दिन याद करने लगा…

पुराने समय की सास

 जब वह छोटी छोटी चीजों के लिए जिद करता था तो दादी मां से कहती थी बच्चे को बिगाड़ रही है। इस बात का मतलब यह नहीं है कि वह दादी मुझसे प्यार नहीं करती थीं लेकिन उनकी सोच उस समय की थी। बच्चे की हर जिद पूरी करना मतलब बच्चे को बिगाड़ना! 

और अपनी मां के पास जाकर बैठा…और बोला आप हो मॉडर्न दादी मेरी दादी इतनी आसानी से मेरी जिद पूरी नहीं करती थीं। हो तो आप भी आखिर सास।  इसलिए इमोशनल ड्रामा उनका भी था इमोशनल ड्रामा आपका भी।

फिर .पत्नी को बड़ा ही समझाने के बाद बेटे को बाइक दिलाने के लिए राजी कर लिया..गया।. आखिरकार सास का इमोशनल ड्रामा पोते के लिए काम आ गया…और सास ने फिर एक बार एहसास दिला दिया की…सास सास होती है…

दिखावे की दुनिया है। आपके आस-पास भी ऐसे ढेरों लोग होंगे हैं जो अपने चेहरे पर हितैषी होने का मुखौटा पहनें आपकी ही जड़ें काटने में व्यस्त रहते हैं। यकीनन इन्हें पहचानना मुश्किल है और पहचान होने पर कष्ट होना उतना ही जायज। पर तब आपकी मुश्किल और ज्यादा बढ़ जाती है जब आप खुद के घर में ही खुद को ऐसे हितैषी के बीच फंसा पाती हैं। अब आप सोच रही होंगी कि भला ऐसा कौन हो सकता है? तो जरा अपने आस-पास गौर करके देखिए आपकी या दूसरों की सासों का व्यवहार इससे कुछ मिलता-जुलता है क्या? ऐसा इसलिए क्यूंकि टिपकल सासों की खूबियों में एक यह खूबी भी होती है। जो अपनी बहू के सामने उसकी हितैषाी होने का स्वांग रचने में भी गुरेज नहीं करतीं। जबकि हकीकत में उनके मन में कलुषता होती है। अब सवाल उठता है कि भला मालूम कैसे चले कि सासू मां का प्यार, अपनापन सच्चा है कि स्वांग? यकीनन इसका कोई भी पैमाना नहीं है जिससे इसे नापा और बयान किया जाए। ऐसे में आप वक्त और मौके के हिसाब से ही आंक सकती हैं। याद रखने वाली बात यह है कि कोई भी चीज अति की अच्छी नहीं होती। सास का आपको गिफ्ट देना, आपकी सराहना करना, तोहफे देना आपकी फिक्र, अपनापन हो सकता है दिल से हो। पर कई बार यह सब दिखावे की चाश्री में लिपटा होता है। अक्सर अचानक से बहूओं की झोली में सास की ओर से सम्मान, प्यार, अपनपेन का आ जाना दिखावा हो सकता है। सास से उनके व्यवहार, बहू की प्रति नजरिए में बदलाव की उम्मीद कम ही करी जा सकती हैै। ऐसा इसलिए क्यूंकि सास के लिए यह थोड़ा मुश्किल होता है। घर में सास ही वो शख्स होती है जो कुछ साल पहले तक घर के बाकी सदस्यों की कसौटी पर घिसी जाती है। और बदले में वह भी बहू को वही देती है जो उसको विरासत में मिला था। आसन शब्दों में अर्थ समझा जाए तो यह है कि सास बहू के साथ वही व्यवहार दोहराती है जो वह फेस करके आई। और विरासत के तौर पर अपनी बहू को दे देती है। ऐसा कर पाना उसके लिए इसलिए सहज है क्यूंकि सास ने हमेशा से वैसा ही व्यवहार होते देखा है।  

यह है उपाय 

इंसान को परखने में बड़ी-बड़ी नहीं बल्कि उसकी छोटी-छोटी बातें आपकी मदद करती है। लिहाजा, आपको सजक रहने की जरूत है। सामने वाले की भाव-भंगिमाओं,  गतिविधी से उसके बातों और कामों के बीच सामजस्य का अंदाजा लगाइए। आपके लिए बेहतर होगा कि आप सास से किसी भी तरह की उम्मीद को न पालें।

क्या आप टाइगर मॉम की श्रेणी में आती है

न आए दूरी मां और बेटी के रिश्ते में