भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
एक नगर में एक विधवा औरत रहती थी। उसका एक छोटा-सा पुत्र था। जिसका नाम सुखदेव था। सुखदेव सरकारी स्कूल में दूसरी कक्षा में पढता था।
वह पढ़ने में अच्छा था। मगर गरीब होने के कारण उसके पास तरह-तरह के कपड़े, खिलौने नहीं थे और न ही उसके पास अपने साथियों की तरह टॉफी, चॉकलेट खरीदने के लिए पैसे थे। उसकी मां मेहनत-मजदूरी करके अपना और सुखदेव का पेट भरती थी।
सुखदेव तब स्कूल में अपने साथियों को टॉफी, चॉकलेट या आइसक्रीम खरीदते हुए देखता तो उसका भी दिल करता, लेकिन पैसे न होने के कारण वह अपना दिल मसोस कर रह जाता।
कई बार उसके साथी टिफिन में उसकी सूखी रोटियां देख कर उसका मज़ाक उड़ाते तो वह बुरी तरह से चिढ़ जाता और बच्चों से झगड़ने लगता। सुखदेव अक्सर बहुत अमीर व्यक्ति बनने के बारे में सोचता रहता। कई बार तो वह स्वप्न में भी बहुत सारे पैसे ही पैसे देखता। तो कभी वह स्वप्न में अपने आपको एक धनवान सेठ के रूप में देखता।
सुबह उठने पर भी रात के स्वप्न का नशा उसे सारा दिन घेरे रहता था। जिससे अब सुखदेव का ध्यान कमाने में ही लगा रहता।
परिक्षाएं नजदीक आने पर भी सुखदेव ने पढाई के बारे में गम्भीरता से नहीं सोचा तो उसकी कक्षा के अध्यापक ने एक दिन सुखदेव को अपने पास बुला कर समझाते हुए कहा सुखदेव परिक्षाएं नजदीक आ चुकी हैं, इसलिए अब तुम्हे अपना ध्यान खेल-कूल से हटा कर पढाई में लगाना चाहिए।
लेकिन सुखदेव ने अपने अध्यापक की बात पर कोई ध्यान न देते हुए कहा-मास्टर जी मैं पढ़ना नहीं, बल्कि एक अमीर व्यक्ति बनना चाहता हूँ।
मास्टर जी ने हंस कर सुखदेव के कन्धे को थपथपाते हुए कहा- बेटा तुम्हारा यह सपना पढने के बाद अवश्य पूरा होगा, इसलिए तुम दिल लगा कर मेहनत से पढ़ा करो।
विद्या से युक्त व्यक्ति सबसे धनवान होता है। उसके इस धन को न कोई चुरा सकता है, न कोई जला सकता है। इसलिए खूब परिश्रम से विद्या प्राप्त करो।
नहीं मास्टर जी, इसके लिए तो मुझे बहुत इन्तज़ार करना पड़ेगा। मैं तो जल्द से जल्द बहुत सारा धन कमाना चाहता हूँ।
मास्टर जी ने कहा- बेटा जो चीज इन्तज़ार के बाद प्राप्त होती है, वो बहुत महत्व रखती है, जबकि जल्दबाजी में प्राप्त हर वस्तु जल्द ही लौट जाती है। जल्दबाजी तो शैतानों का काम है। इन्सान तो सब्र और धैर्य से काम करते हैं।
लेकिन सुखदेव को मास्टर जी की ये बातें निरर्थक लगीं, क्योंकि उसके सिर पर तो जल्दी से जल्दी धनवान बनने का भूत सवार था।
एक अपने इस स्वप्न में गुम सुखदेव तालाब के पास से गुज़र रहा था कि तभी उसे वहां पड़े खण्डहर में कुछ फुसफुसाहट-सी सुनाई दी। उसने टूटे खण्डहर के एक छोटे से छिद्र में से झांक कर देखा कि वहां पांच-छ: व्यक्ति बैठे थे। उनके बीच में बहुत से गहने, आभूषण और बहुत सारे रूपये पड़े थे।
उन व्यक्तियों में से एक काला-सा आदमी बाकी व्यक्तियों को उनके हिस्से का धन बार-बारी बांट रहा था। यह सब देख सुखदेव को यह समझते देर नहीं लगी कि ये सब लुटेरे हैं और यहां बैठकर अपनी की गई चोरी का आपस में हिस्सा बांट रहे हैं। इतना सोना और पैसा देखकर सुखदेव की आँखें चौंधिया गई। उसने कभी इतना पैसा और इतने आभूषण एक साथ नहीं देखे थे।
बस उसी दिन से सुखदेव ने भी चोरी करके बहुत-सा धन कमाने की सोच ली।
सुखदेव की कक्षा में ही गांव के मुखिया का बेटा पढता था। जो प्रतिदिन कुछ पैसे लेकर स्कूल में आता था और फिर स्कूल के बाहर ही बनी लाला की दुकान से रोज़ कुछ न कुछ खरीदता और अपने दोस्तों में बांट कर खाता।

उसके उन पैसों पर सुखदेव की हमेशा नज़र रहती थी। और एक दिन मौका मिलते ही सुखदेव ने मुखिया के बेटे के पैसे चुरा लिए। पैसे चुराने के बाद जब वह घर पहुंचा तो मां ने उसकी घबराहट का कारण पूछा।
सुखदेव ने हकलाते हुए मां का मुखिया के बेटे के पैसे चुराने की सारी बात बता दी। मां कुछ क्षण तो चुप रही, फिर धीरे से उसे समझाते हुए बोली यह बात किसी को मत बताना और ला मैं यह पैसे छिपा कर रख देती हूँ। मां की बातों ने सुखदेव को और चोरी करने के लिए प्रोत्साहित किया और अब वह प्रतिदिन किसी बच्चे का पेन, किसी की पैंसिल, किसी का खाना तो किसी के पैसे चुराने लगा और चोरी करके अपनी मां को लाकर दे देता। मां वो सब चीजें छिपा कर रख लेती। आखिर एक दिन मास्टर जी ने उसे अपना पर्स चुराते हुए पकड़ ही लिया और इस तरह उसे स्कूल से निकाल दिया गया।
स्कूल से निकालने के बाद तो वह और भी आज़ाद हो गया और गाँव वालों की छोटी-मोटी चीजें चुराते-चुराते वह एक पक्का चोर बन गया।
चुराए हुए माल से सुखदेव अब खूब मज़े करता और जो चाहता वही खरीदता। उसकी मां भी बहुत खुश थी, क्योंकि अब उसे मेहनत-मजदूरी नहीं करनी पड़ती थी, बल्कि घर बैठे-बिठाए ही सब कुछ मिल जाता था।
सुखदेव के दिन मजे से गुजर रहे थे कि एक रात वह पड़ोस के ही गांव में चोरी करने के उद्देश्य से जा रहा था कि तभी ज़ोरो से बरसात शुरू हो गई।
पास में ही एक मंदिर था। अपने को बरसात से बचाने के लिए वह उस मंदिर में चला गया।
उसने देखा अन्दर अभी-अभी आरती खत्म हुई है, और मंदिर का पुजारी सब को प्रसाद बांट रहा है तो सुखदेव भी प्रसाद लेने चला गया।
अन्दर भगवान श्री कृष्ण की भव्य मूर्ति देख कर उसकी आंखें फटी की फटी रह गई। भगवान के सिर पर रखे सोने के मुकुट को देख वह अपने होंठो पर जीभ फिराने लगा।
बस वहीं खड़े-खड़े सुखदेव ने यह निश्चय कर लिया कि चाहे कैसे भी हो मुझे यह मूर्ति चुरानी है। और तभी मेरे धनवान बनने का स्वप्न पूरा होगा।
यह सोचते हुए सुखदेव वापस अपने घर चला गया और श्री कृष्ण की मूर्ति चुराने की तरकीब सोचने लगा। वह रोज़ पूजा करने के बहाने उस मंदिर में जाता और पता करने की कोशिश करता की मंदिर में कौन रहता है।
आखिर एक दिन वक्त ने सुखदेव का साथ दिया और मंदिर के पुजारी जी को कहीं बाहर जाना पड़ गया, उनके बाकी के शिष्य भी कार्यवश कहीं चले गए। बस सुखदेव को मूर्ति चुराने का यही समय सबसे उचित लगा। उसने शाम से ही मंदिर में अड्डा जमा लिया और हाथ जोड कर मूर्ति के सामने बैठ गया।
दरअसल वह ऐसा मंदिर में आने वाले लोगों को इस भ्रम में डालने के लिए कर रहा था कि वह बड़ी श्रद्धा से पूजा कर रहा है। धीरे-धीरे रात गहरी होने लगी और भक्तगणों का आना भी बन्द हो गया।
सुखदेव मूर्ति के आगे से उठ कर बाहर घूमने गया कि-यह तो देखकर आऊं कि मंदिर में कोई है तो नहीं।
जब वह मंदिर में घूम रहा था तो उसने देखा, मंदिर का रसोईया पीछे बनी अपनी कुटिया में खाना बना रहा है, तो सुखदेव के दिमाग में एक योजना कौंध गई और वह रसोईए की कुटिया की तरफ बढ़ गया।
कुटिया में से आ रही रोटियों की सोंधी-सोधी महक ने सुखदेव को भूख से व्याकुल कर दिया।
उसने कुटिया के दरवाज़े पर खड़े होकर आवाज़ लगाई कोई…है क्या।
रसोइयां रोटी…सेकते…सेकते बोला हाँ भाई बोलो क्या चाहिए। …बाबा… मैं एक मुसाफिर हूँ, बड़ी दूर से आया हूँ और बड़ी दूर जाना है। पंडित जी से इजाजत लेनी थी। …कि रात भर के लिए यहां ठहर जाऊ। सुखदेव की बात सुनकर रसोइया भगत राम उठ कर बाहर आया और बोला…बात ऐसी है भाई….कि पंडित जी तो पास के ही गांव गए हैं किसी काम से…हो सकता है लौटने में देर भी हो जाए…तुम…ठहरना चाहो तो…ठहर जाओ।
क्या भूखे को खाना भी मिल सकता है। सुखदेव ने गर्म-गर्म रोटियों की तरफ देखते हुए कहा…हाँ हाँ क्यों नहीं…आओ तुम मेरे साथ खाना खाओं, रूखा-सूखा जो भी है।
भगत राम के इतने से ही आग्रह से सुखदेव झटपट उसके साथ खाना-खाने बैठ गया। पडोस के गांव का होने के कारण भगत राम सखदेव को पहचान नहीं पाया।
सुखदेव अपनी पेट पूजा कर…हरि…ओम….हरि…ओम कहता हुआ सोने के लिए मंदिर मे चला गया। लेकिन उसकी आंखों में नींद नहीं भगवान श्रीकृष्ण की भव्य मूर्ति घूम रही थी, जिसे बेचकर वह बहुत धनवान बनने वाला था। बस जागते में ही सपने देखते-देखते आधी रात बीत गई। सुखदेव चुपके-चुपके उठा और उसने देखा कि चारों तरफ सुनसान और अंधकार था। सारा गांव गहरी नींद में सोया हुआ था। उसने रसोईए की कुटिया में झांक कर देखा तो वह भी गहरी नींद में खर्राटे भर रहा था। सुखदेव को इसी स्वर्णिम अवसर की तलाश थी। उसने अपने साथ छिपा कर लाए छैनी-हथौड़ा इत्यादि औजारों को बाहर निकाला और भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति को उखाड़ने में लग गया।
थोड़ी-सी मेहनत से ही वह भव्य-मूर्ति सुखदेव के हाथों में थी। उसने बडी सावधानी से श्रीकृष्ण के सोने के मुकुट को उतार कर थैले में रख लिया और मूर्ति लेकर वह जैसे ही बाहर निकला कि रसोइए भगत राम ने उसे पीछे से पकड़ लिया और चोर-चोर कह कर शोर मचा दिया। परन्तु सुखदेव ने अपने हाथ में पकडी हथौडी भगत राम के सिर पर दे मारी जिससे वह वहीं ढेर हो गया।
सुखदेव अंधेरे का फायदा उठा कर मूर्ति लेकर अपने गांव की तरफ भाग गया। जब वह अपने घर पहुंचा तो उसकी मां सो रही थी। सवेरा होने में कुछ ही देर बाकी थी। परन्तु सुखदेव सवेरा होने से पहले यह गांव छोड़ कर कहीं दूर चला जाना चाहता था। इसलिए उसने अपनी मां को उठाया और जल्दी से पूरी बात बताकर थोडा-सा आवश्यक सामान समेटने लगा।
सुखदेव का विचार था कि जब लोग सुबह उठकर उसके मकान पर ताला देखेंगे तो वे उस पर शक नहीं करेंगे। सुखदेव और उसकी मां सामान समेट कर और उस मूर्ति को लेकर जैसे ही बाहर निकले सामने पुलिस खड़ी उनका इन्तज़ार कर रही थी।
जिसके साथ मंदिर का पुजारी और उसके गांव के सभी लोग खडे थे। पुलिस ने मूर्ति के साथ ही सुखदेव को गिरफ्तार कर लिया और जेल में डाल दिया। सुखदेव पर मंदिर के रसोईए भगत राम के खून का भी इल्ज़ाम था।
दोनों संगीन जुर्मों के लिए उस पर मुकदमा चलाया गया और एक दिन अदालत ने उसे फांसी की सज़ा सुना दी। जेल में रहकर जब उसने अपने किए गए अपराधों के बारे में सोचा तो उसे अपने आप से ही घृणा हो गई कि कितने मासूम लोगों का खून बहाया है।
नियमानुसार फांसी लगने से पहले जेलर ने सुखदेव से उसकी अंतिम इच्छा जाननी चाही तो सुखदेव ने कहा-मैं मरने से पहले अपनी मां और अपने मास्टर जी जिन्होंने मुझे बचपन में पढ़ाया था, से मिलना…..चाहूँगा। मरने वाले की हर इच्छा पूरी की जाती है, इसलिए सुखदेव की मां और मास्टर जी को उससे मिलने के लिए बुलवाया गया।
सुखदेव सबसे पहले अपनी मां के पास गया। उसकी मां उसे देखते ही रोने लगी।
सुखदेव ने कहा…मां मैंने तुम्हें एक बात कहने के लिए यहां बुलवाया है। लेकिन वह बात मैं आपके कान में कहूँगा। सुखदेव की मां ने सोचा…. शायद…किसी छिपे धन के बारे में बताना चाहता होगा, इसलिए उसने इधर-उधर देख कर अपना कान सखदेव के आगे कर दिया। सखदेव ने अपनी मां के कान को इतनी ज़ोर से काटा कि खून बहने लगा।
मां की चीख सुनकर मास्टर जी जेलर और बाकी सब वहां भाग कर आए…..जेलर ने उसे डांटते हुए कहा- यह तुमने क्या किया…सुखदेव ने कहा-जेलर साहब आज मैं जिस स्थान पर खडा हूँ, वह सिर्फ अपनी मां की वजह से हूँ। जिस दिन मैंने पहली चोरी की थी उस दिन मां के इसी कान में आकर बताई थी। मां ने सुनकर मेरी चोरी छिपा ली थी। यदि मेरी मां उस दिन मेरी पहली चोरी करने पर ही मेरी खूब पिटाई करती और मुझे सन्मार्ग पर ले जाती तो आज मैं चोर नही बनता। लेकिन मेरी मां तो चोरी करने पर खुश होती रही।
इसलिए जब भी बच्चा पहला अपराध करे तो मां को उसकी पिटाई करके उसे छुडाना चाहिए। मां तो बच्चे का प्रथम गुरु होती है, उसकी गोद में जन्नत होती है और उसकी पिटाई से बच्चे के भविष्य का निर्माण होता है। इतना कह कर सुखदेव ने आगे बढ कर मास्टर जी के चरण छू…लिए… मैंने आपकी बात नहीं मानी इसलिए आज मुझे…यह सजा मिली। काश! उस दिन मैं आपकी बात मान लेता तो मैं भी अपने बाकी साथियों की तरह अच्छा व्यक्ति होता। आज मैं आपकी बात की दिल से कद्र करता हूँ…कि विद्या ही सबसे बड़ा धन है।
और इस तरह सुखदेव अपने कुकर्मों के कारण फांसी पर लटका दिया गया।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
