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बी जी मुस्कुरा दिए-21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां पंजाब: Beeji Story
Beeji Mushkra Diye

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Beeji Story: यदि जसविन्दर की बात मान ली होती तो आज यह दुविधा ना होती। तब इरादा भी दृढ़ था। परन्तु मुझे पापा की बात ठीक लगी थी। जसविन्दर का अभी फोन आया। ना खैरियत ना कुछ, बस सीधा पूछने लगा, “बुआ को फोन किया कि नहीं?”

“नहीं।” यह जवाब सुन उसकी आवाज तल्ख हो गई, “लगता है, तुम्हारा यहां दिल लग गया है।”

“पापा कहते हैं, अभी एक महीना और ठहर जाऊं।”

“लेकिन बुआ को फोन करके तारीख तो पक्की कर लो। उसे छुट्टी के लिए एप्लाई करना होगा। वह खद आएंगी। एकदम टिकट करवाने से वह मंहगी भी पड़ती है। तुम आज ही फोन करो।”

“कर लूंगी”, मैंने मरी आवाज में कहा। उसने फोन रख दिया। उसकी यह आवाज मुझे चुभती है। उसे लगता है, मैं यहां ऐश कर रही हूं। उसे मालूम नहीं, मैं किस एहसास तले दबी जा रही हूं। ‘इस प्रकार कैसे दोष दे दूं।’ जसविन्दर की बात फिर से याद आ गई, ‘ऐवरीथिंग इज फेयर इन लव एंड वार।’ चलो, जब समय आएगा, तब देखा जाएगा। ध्यान दूसरी ओर लगाने के लिए मैंने टी.वी. ऑन कर लिया। अंग्रेजी मुझे समझ में नहीं आती। देखती हूं, अगर कोई विवाह की मूवी पड़ी हो। ‘इसे क्या देखना…’ सोच कर उसे नहीं उठाती। खाली बैठ कर सारी दोपहर बिताना बहुत मुश्किल लगता है। बचपन से ही घर सजाने का शौक रहा, परन्तु अब यह भी करने की इच्छा नहीं होती। घड़ी की ओर देखती हूं। दस बजने वाले हैं। अभी दस बजे गुरमीत का फोन आ जाएगा। फिर एक बजे लंच ब्रेक में फोन करेगा। मैंने कितनी बार कहा है, मेरी इतनी चिन्ता मत किया करो, मैं कोई बच्ची हूं। वह जितना मेरा ध्यान रखता है, मेरी दुविधा उतनी ही बढ़ती जाती है। लगता है, जैसे मेरे अंदर…नहीं..नहीं.., मुझे इस प्रकार नहीं सोचना चाहिए। यह मेरी खुदगर्जी होगी। जसविन्दर ने कितनी कुर्बानी दी है मेरे लिए। कुर्बानी? मेरे अंदर प्रश्न सिर उठाता है। मैं यह क्या ऊल-जलूल सोचने लगी। घड़ी की ओर देखा, दस बज कर दो मिनट हो गए। अभी तक फोन क्यों नहीं बजा? परन्तु मैं प्रतीक्षा क्यों कर रही हूं? प्रतीक्षा कहां…यह सब तो ऐसे ही…। फोन ना ही आए तो अच्छा है। लिविंग रूम की खिड़की से बाहर की ओर देखती हूं। कितनी चमकदार धूप है। मम्मी-डैडी इस धूप में जल रहे होंगे। घड़ी देखी, दस बजकर पांच मिनट, तभी फोन बज उठा। मैंने झपट कर फोन उठा लिया। चूमने की आवाज आती है।

“हां जी, चाय पी ली?” मैंने पूछा।

“चाय भी पी लूंगा बाद में, उसकी इतनी आवश्यकता नहीं होती जितनी तुम्हारी मीठी आवाज सुनने की …।”

मैं कहना चाहती थी, पांच मिनट लेट फोन क्यों किया परन्तु मुंह से निकला, “अच्छा।”

“और मन लग गया है न? बोर तो नहीं हो रही?”

“नहीं, ठीक हूं।” मैंने धीमी आवाज में कहा।

“तुम्हारी आवाज ढीली लग रही है, कहीं सिर तो नहीं दुख रहा?”

“नहीं, बस खाली बैठने से बोर हो रही थी।”

“आई नो। खाली बैठ कर समय निकालना बहुत मुश्किल होता है। मेरा वश चले तो तुम्हें कभी अकेले ना रहने दूं, बोर होने के लिए।”

“अच्छा आप चाय पी लें। आपकी ब्रेक खत्म होने वाली होगी।”

“अच्छा बाय-बाय। आई लव यू” चुंबन देकर उसने फोन रख दिया।

“सिर दुखने का बहाना मैं इतनी बार कर चुकी हूं कि अब उसे फिक्र होने लगा है। परसों कह रहा था, “तुम्हारे सिर में इतना दर्द रहता है, कहीं कुछ और ही ना हो। चलो डॉक्टर को दिखा लाएं।” मैंने मुश्किल से मनाया कि इसकी आवश्यकता नहीं है।

स्कूल के लिए अभी एक महीना बाकी है। कहते हैं, सितंबर में क्लासेज शुरू होंगी। अब होती, तो कम से कम दिहाड़ी तो आसानी से निकल जाती। महीने बाद मुझे क्या…हो या ना हो। मेरे अंदर एक टीस-सी उठी। काम पर भी नहीं जाने देता। मैंने कितनी मिन्नत से कहा था, “खाली बैठे रहने से मेरा समय नहीं गुजरता। मुझे कोई काम ही ढूंढ दे।”

“पहले पढ़ लो, फिर सारी उम्र काम ही करना होगा।” उसने कहा।

“जब स्कल टाईम आएगा, तब देखा जाएगा। तब तक तो काम कर लूं।” मैंने एक तरह से याचना की।

“एक महीने के लिए क्या काम देंखे। काम की चिन्ता तुम मत करो। मैं कर लूंगा। तुम बस डट कर पढ़ो। मेरी इच्छा पढ़ने की थी लेकिन कामों में उलझ गया। तुम महीना भर आराम कर लो, फिर तुम्हें फुरसत नहीं मिला करेगी।” उसकी अंगुलियां मेरे बालों से खेल रही थीं। मेरा दिल किया, कहूं, ‘नींद आ रही है’ परन्तु ऐसा कह नहीं पाई। जिद करके उसे मम्मी-डैडी के साथ बेरी तोड़ने जाने के लिए मना लिया। परन्तु वह केवल एक ही दिन के लिए राजी हुआ।

डैडी कहते हैं, “फार्म तो भई हम बूढों या अनपढ़ लोगों के लिए है, जिन्हें अन्य कोई काम नहीं मिलता।” मैं उनके साथ चली गई परन्तु शाम तक थक कर चूर हो गई। कभी इतना काम किया नहीं था। फिर भी मैं उस दिन खुश थी। मानसिक तसल्ली कि चलो कम से कम रोटी लायक पैसे तो कमा कर दिए। नहीं तो जब भी ख्याल आता, मैं इनसे किन खुनामी का बदला ले रही हूं, तो मेरे अंदर गुनाह का एहसास जाग उठता। उस रात अगले दिन फिर फार्म जाने की जिद की परन्तु गुरमीत ने दृढ़ आवाज में मना कर दिया, “नही और नहीं…।” मम्मी ने भी वकालत की, “चलो साथ जाने दो, देखो आज कितनी खिली हुई है वरना मुरझाई रहती है।” परन्तु गुरमीत टस से मस नहीं हुआ। मुझे मम्मी पर प्यार आया। प्यार मुझे दिन में भी आया था, जब वे दोनों धूप में बेरी तोड़ रहे थे। मुझसे बार-बार कहते रहे, “थक जाएगी, जा आराम कर ले।” मगर मैं उन दोनों के साथ ही लगी रही। शाम के समय मैंने कह ही दिया, “कितनी मुश्किल कमाई करते हैं आप यहां पर और हम वहां सोचते हैं कि जैसे कनाडा में डॉलर पेड़ों पर लगते मिलते हैं।”

हां, उस दिन के बाद एक बात अवश्य हुई, अब मैं सुबह उठ कर मम्मी-डैडी और गुरमीत के लिए ब्रेकफास्ट और साथ लिजाने के लिए लंच तैयार करने लगी। पहले मैं देर तक सोई रहती थी। वे सभी उस समय तक काम पर निकल जाते थे। सो कहां रही होती, बस यूं ही अलसाई-सी पड़ी रहती थी। सोचती, गुरमीत शायद खीझेगा या फिर कभी मारने-पीटने लगेगा। मेरा काम आसान हो जाएगा। जसविन्दर की बुआ ने यह गुर मुझे बताया था। गुरमीत को गुस्सा दिलाने के लिए मैं कंघी करके बाल उसी में लगे छोड़ देती। वह खीझता मगर कहता कछ ना। सारी दिहाडी बिस्तर ठीक ना करना। काम से लौटने पर चाय तक ना पूछना बल्कि सिर लपेट कर लेट जाना। वह काम से लौट कर चाय के दो प्याले बना कर कमरे में ले आता। अपनी प्याले से पहले मुझसे चूंट भरवाता, कहता, ‘मीठी कर दे चाय।” मुझे मायूसी होती। फिर उसके लौटने पर मैं खुद ही चाय बना लाती। बआ को फोन करके बता दिया कि ये सब तरीके गुरमीत पर नहीं चलने वाले। वह पता नहीं किस मिट्टी का बना हुआ है। बुआ कहती, “तुझे अपनी पिटाई जरूर करवानी है। किसी को क्या मालूम, हम बस कह देंगे कि मारता-पीटता है।”

उस दिन के बाद बुआ को फोन करने का ख्याल भी नहीं आया। चलो, आज करूंगी। उसकी खैर-खैरियत भी पूछ लूंगी। कह दूंगी, एक महीना और रुक जाए। पापा ने कल फिर जसविन्दर को धीरज रखने के लिए कहा है। समय देखा, अभी साढ़े ग्यारह बजे हैं। टरांटो बजे होंगे ढ़ाई। अभी थोड़ा जल्दी है। बुआ कहती थी, टरांटो, छः बजे फोन किया करो। एक बजे फिर गुरमीत का फोन आ जाएगा। वह फिर मुझ पर हावी हो जाएगा। मुझे पता नहीं, क्या होता जा रहा है। मैं उठ कर बेडरूम में चली गई। पैर अटैची से जा टकराया। यह अटैची भी बीच में ही अटका पड़ा है। उस दिन गुरमीत का पैर भी इसमें जा लगा था। कहने लगा, “इस अटैची ने तुम्हारे कपड़े अपने में कैद कर रखे हैं जबकि मेरे कपड़े तेरे कपड़ों की छुअन के लिए तरस रहे हैं।” मैंने आम पहनने वाले चार ही सूट बाहर निकाल कर रखे हैं। सोचती हूं, क्यों सामान निकाल कर रखू, एक महीने बाद फिर से संभालने पड़ेंगे। मन में आता है, अटैची खाली कर दूं, ऐसे ही टकराता रहता है। महीने बाद देखा जाएगा। चलो, यह छोटा बैग तो एक ओर कर ही दूं। जब से विक्टोरिया से आए हैं, वैसे ही रखा है। मैंने टॉप-पैंट निकाला, जो गुरमीत मेरे लिए पहले ही ले आया था, साथ ही एक नाईटी भी। परन्तु इन कपड़ों को मैंने अभी तक छुआ भी नहीं। गुरमीत के कपड़े निकाल कर हैंगरस पर लटका दिए। टॉप-पैंट और नाईटी भी उनके साथ ही लटका दिए। फिर उन्हें उठा कर, क्लोजिट के एक ओर फेंक दिया। अब उन्हें गुरमीत के कपड़ों से अलग लटका दिया। बैग से एक डायरी निकली। मैं देखने लगी। पंजाबी में काफी साफ लिखाई में लिखा हआ था। उस रात भी वह लिखता रहा था।

मेरे वैन्कूवर पहुंचने के दूसरे ही दिन वह मुझे लेने विक्टोरिया आ पहुंचा। कहने लगा, “हमारा हनीमून अब शुरू होगा। इंडिया में तो तुम्हारी शर्म ही नहीं उतरी थी।” मैं जबर्दस्ती मुस्कुराई। फैरी में ऊपर के डैक पर जा कर उसने मुझे अपने साथ कस लिया।

“मुझे अच्छा नहीं लगता, इस तरह सब के सामने,” मैंने कहा।

“हम पति-पत्नी हैं।”

“फिर भी।’ मेरी आवाज ठंडी थी। उसने मुझे छोड़ दिया। मैं डैक की रेलिंग पकड़ कर लहरों को देखने लगी। उन लहरों में जसविन्दर की झलक उभरने लगी।

***

“यहां इंटरव्यू पर आया था। सोचा मिलता चलूं वरना भाभी नाराज होंगी कि उसके मायके तक आ कर, मिले बिना चला गया।” जसविन्दर सति सिरी अकाल बुलाने के बाद यह बात अवश्य कहता। पता नहीं, उसकी सारी इंटरव्यू इस ओर ही क्यों आती थीं। वह हंसाते हुए हमें थका देता। हम भी उसका इन्तजार करते रहते। वह ताया जी की लड़की का देवर था। एक दिन ताया जी ने पापा से कहा. “क्यों ना हम सखजीत का रिश्ता जसविन्दर से कर दें। बी.ए., बी.एड. किया है इसने। नौकरी मिल ही जाएगी। फिर देखे-सुने आदमी हैं।”

पापा ने कहा, “देख लेंगे। अभी सुखजीत बी. ए. तो कर ले।” मैंने सुना और मेरे साथ छोटे भाई टीटू ने भी सुन लिया। वह मुझे छेड़ने लगा। उसके बाद मैं जसविन्दर का अधिक इन्तजार करने लगी। जब दूसरे भाई-बहन उसकी बातों पर हंसते तो मुझे गर्व महसूस होता। जसविन्दर की याद ने मेरे अंदर हलचल मचा दी। अनजाने ही मेरा हाथ गुरमीत पर टिक गया। मुझे झटका लगा, वह मेरी ओर ही देख रहा था। “क्या देख रहे थे?” लगा मेरी चोरी पकड़ी गई।

“कितने महीनों बाद मिले हैं, सोचा जी भर कर देख तो लूं।” उसने जवाब दिया।

इसी प्रकार पिछली शाम को एयरपोर्ट पर फूलों का गुलदस्ता थमा, एकटक मुझे देखने लगा। मेरी पलकें झुक गईं। मैंने सोचा ना था, यह अकेले एयरपोर्ट आएगा। मम्मी-डैडी के बारे में पूछा तो कहने लगा, “उनकी मौजूदगी में तुम से अच्छे से मिल नहीं सकता था।” घर पहुंचने पर मम्मी ने तेल चुआया, और गीत छेड़ दिया, “अज दा दिन मैं मसां ही लिया…”। कितने ही रिश्तेदार एकत्रित थे। विवाह जैसा माहौल बना हुआ था। तीन-चार लोग जाते हुए कहने लगे, “स्पेशल पार्टी तो तुम से काम पर लेंगे। आज तो बस दर्शन करने आए थे कि कैसी लड़की है, जिसके चाव में तुम उड़ते फिरते हो।”

“इंडिया की याद आ रही होगी, आई नो, टफ होता है, सभी से बिछुडना”, गुरमीत ने मुझे खामोश देख कर कहा।

“मेरी इससे क्या दुश्मनी है,” मेरे मन में विचार आया। “कितना अच्छा होता अगर मैं जसविन्दर की बात मान कर सीधा उसकी बुआ के पास चली गई होती।” मुझे गलती का एहसास हुआ। फिर पापा सामने आ गए।

“कॉफी लाऊं?” गुरमीत ने पूछा।

“चलिए, मैं भी साथ चलती हूं।” कॉफी ले, हम फिर बाहर आ गए। चूंट भरते हुए गुरमीत ने कहा, “मेरी वाली तो कड़वी है।” मैंने कॉफी का चूंट लिया तो कहने लगा, “लाओ, अपनी वाली दे दो मुझे।” मेरे कप से चूंट भर कर बोला, “तुम्हारी वाली कितनी मीठी है। मुझे यह पीने दो, तुम मेरा कप ले लो।” अभी उसके कप से घूट भरा ही था कि पूछने लगा, “कैसी है, कड़वी या मीठी?”

“मीठी,” मैंने ऐसे ही कह दिया। उसकी आंखें चमक उठीं। हम फिर रास्ते में आते टापुओं की ओर देखने लगे। वह छोटी-छोटी बातें करता रहा। मैं उसका साथ देने के लिए हूं-हां करती रही। मुझे वह बच्चों-सा लगा। लगा, मेरे अंदर जमी बर्फ पिघलने लगी हो। परन्तु जसविन्दर फिर से मेरे सामने आन खड़ा हुआ। मैं डर गई कि भीतरी बर्फ कहीं पिघल ना जाए। होटल पहुंचने पर गुरमीत ने मुझे नहा-धोकर फ्रेश हो कर बाहर घूमने जाने को कहा परन्तु मैंने बहाना बना दिया, “मुझे चक्कर आ रहे हैं, सिर फट रहा है। लगता है, सफर की थकावट कारण है।” “चलो, हम डॉक्टर के पास चलते हैं।” उसने चिन्ता से भर कर कहा।

“अरे नहीं, सोने से ठीक हो जाएगा।”

“लाओ, तुम्हारा सिर दबा देता हूं।” वह प्रेम से मेरा सिर सहलाने लगा। मैंने कहना चाहा, “ओ दुश्मन! मैं तो तुम से दूर जाने का बहाना बना रही हूं और तुम और भी मेरे पास आ रहे हो। न प्लीज…।” मैंने मना किया।

उसका चेहरा उतर गया। फिर कहने लगा, “चलो, कुछ खा-पी लो, फिर सो जाना।”

“नहीं-नहीं, मुझे भूख नहीं है। आप खा लें जाकर। मैं सेब खा लूंगी।” मैंने साथ लाए सेब के लिफाफे की ओर इशारा किया। उसने मुझे सेब काट कर खिलाया, खुद दो केले खाए और मेरे साथ बैड पर आकर लेट गया। उसका हाथ मेरे शरीर पर फिरने लगा। जसविन्दर का चेहरा मेरे सामने आ गया। गुरमीत का हाथ नाग की तरह रेंगता महसूस होने लगा। मैंने डर कर आंखें खोल लीं। मेरे सामने गुरमीत था। आंखें बंद करने पर जसविन्दर आ जाता और खोलने पर गरमीत का भोला चेहरा। मेरे भीतर की कशमकश आंखों से बह निकली। गुरमीत बेड से उठ खड़ा हुआ, “अब तुम आराम से सो जाओ। कल घूमने चलेंगे।”

वह कुछ लिखने लगा और मैं जसविन्दर के बारे में सोचने लगी। जब वह आता, मेरे पांव जमीन पर ना पड़ते। मैं खुद को भाग्यशाली मानती, जिसे चाहा, उसी से ब्याह होगा। परन्तु एक दिन कहने लगा, “मेरे भाग्य में तो फॉरन की धरती है।”

“अगर जनाब फॉरन चले गए तो हम गरीबों का क्या बनेगा”, मैंने छेड़ा।

“हम अपनी गरीबन को भी साथ ले जाएंगे।”

“गरीबन को कैसे साथ ले जाएंगे। आप विवाह के बेस पर जाओगे कि कोई और तरीका ढूंढ लिया है मेरी सरकार ने।”

“तरीके की तलाश अभी जारी है। मैरिज बेस मिल गया, छोड़ना वह भी नहीं। वहां पहुंच कर कौन तू, कौन मैं और हम अपनी गरीबन को वहां बुला लेंगे।” उसने मेरे चेहरे पर नजरें टिका कर कहा।

“किसी की जिन्दगी से खिलवाड़ करेंगे?”

“एवरीथिंग इज फेयर इन लव एंड वार,” कह कर वह हंस दिया।

मुझे मालूम हुआ, वह जर्मनी जाने की योजना बना रहा है। पूछने पर कहने लगा, “कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा वरना सारी उम्र भूख से लड़ते ही मर जाएंगे। तुम चिन्ता ना करो। यदि सब ठीक बैठा तो तुम्हें भी वहीं बुला लूंगा। नहीं तो कुछ कमा कर वापस आ जाऊंगा। तब तक तुम एम. ए. या बी. एड ही कर लेना।”

“मुझे जंची नहीं तुम्हारी स्कीम। कम खा लेंगे। कभी तो नौकरी मिल ही जाएगी।” मैंने विरोध किया।

कहने लगा, “मैं अपने फ्यूचर के बारे में सोच कर ही ऐसा कर रहा हूं।” और वह चला गया। महीने बाद दिल्ली-मुंबई का चक्कर लगा कर लौट आया। बहुत मायूस था। एजेंट ने उसे धोखा दिया था।

***

मैंने करवट ली। गुरमीत कुछ लिख रहा था। मैं भी तो गुरमीत के साथ धोखा कर रही हूं।’ कितने चाव से वह मुझे लेकर आया है। होटल का खर्च अलग। मुझे इस प्रकार बहाना नहीं करना चाहिए था। परन्तु मैं भी क्या करूं। मैं खुद को जसविन्दर की गुनाहगार मानने लगी थी और अब गुरमीत की। मैं कहां उलझ गई। सच में मेरा सिर दुखने लगा। जी चाहा, जोर-जोर से रोने लगे। लेकिन गुरमीत लिखने में व्यस्त था।

मेरा ध्यान डायरी की ओर गया। खाली बैग को क्लोजिट में रख कर मैं बैड पर लेट कर डायरी के पन्ने उलटने लगी। ‘हनीमून’ शीर्षक देख कर उसे ही पढ़ने लगी।

सोचा नहीं था, हनीमून के समय भी मैं डायरी लिखूगा। मैं कितनी बड़ी गलती कर बैठा। यह भी नहीं सोचा कि जहाज के लंबे सफर की थकावट और उन्नींद के कारण उसे दो दिन आराम करना चाहिए। लेकिन क्या करता? इंडिया में यह शर्माती रही। सोचा था, घर में मम्मी-डैडी की मौजूदगी में एकदम से खुल नहीं पाएगी। मैं उसके साथ वियोग के सपने पूरा करना चाहता था। सुखी को जिन कपड़ों में सपने में देखता रहा, वे कपड़े मैंने पहले ही खरीद लिए थे। सोचा था, जब वह नहाने लगेगी, तब कपड़े निकाल कर, उसे पहनने को दूंगा। उन कपड़ों में हम बाहर घूमने-फिरने जाएंगे। रात को झील के किनारे एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर घूमेंगे। फिर मैं सुखी का चेहरा अपने हाथों में लेकर उससे कहूंगा, “आसमान के चांद से यह चांद अधिक सुन्दर है।”

पढ़ते हुए मैं रोमांटिक होने लगी। पागल! नहीं, मैं बेवकूफ हूं। मैंने उस बेचारे का सारा प्रोग्राम ही चौपट कर दिया। मुझे इस तरह नहीं सोचना चाहिए। कितनी स्वार्थी हो गई हूं मैं। मैं आगे पढ़ने लगी।

“सुखी की तबियत खराब है। कोई नहीं सारी उम्र पड़ी है, सपने पूरे करने के लिए। बेचारी कैसी गुच्छम-गुच्छा होकर लेटी है। जी करता है, उसका सिर अपनी गोदी में रख कर सहला दूं। नहीं, उसकी नींद खराब हो जाएगी। हाय! कितनी प्यारी है मेरी सुखी। इसकी मौजूदगी का एहसास ही मुझे दीवाना बना देता है।”

मेरे भीतर से एक आह निकली। सामने दीवार पर लगी, मेरी तस्वीर मुस्कुरा रही है। जैसे मैं खुद पर हंस रही हूं। यह तस्वीर पापा ने शादी से पहले भेजी थी, जिसे गुरमीत ने बड़ा करवा कर बेड के सामने दीवार पर लगा दिया था। इसी आकार की मेरी और भी कई तस्वीरें लगा रखी हैं। एक तस्वीर मेरी और गुरमीत की शादी के समय की है। मैंने तस्वीर से नजर हटा कर डायरी की ओर ध्यान दिया। ‘विवाह के लिए स्वीकृति’ शीर्षक का पेज पढ़ने लगी हूं।

“मैं तो खो ही गया था। पहले उन तानों में, जो बहन के घर भाई के रहने पर उसे सुनने पड़ते हैं। इसलिए मैं कनाडा में अपना घर जल्दी बना लेना चाहता था। दस साल पहले कनाडा आकर बहुत काम किया, डॉलर कमाए। कामों में इतना खो गया कि अपना अस्तित्व ही भुला बैठा। एक मशीन ही बन गया। लेकिन काम से छटी कर मैं शॉपिंग सेंटर गया। वहां पीछे से जिंदर से प्यार से ‘हाय गुरमीत’ कह कर पुकारा। उसने और मैंने दो महीने एक फूड पैकिंग प्लांट में एक साथ काम किया था। वह भी इंडिया से नई-नई ही आई थी। जब भी हमारी नजर मिलती, वह अक्सर मुझे ही देख रही होती। मुझे देखते ही पलकें झुका लेती। अपने संकोची स्वभाव के कारण मैं उसकी ओर कदम बढ़ा नहीं पाया। नए स्थान पर एक घंटे के अधिक डॉलर मिलने के चाव में मैंने वहां काम छोड़ दिया।

एक दिन अचानक उसे देख कर मेरा दिल धड़क उठा।

“क्या हाल है?” उसने पूछा। मुझे वह पहले से निखरी हुई लगी।

“बस ठीक हूं। आप अभी भी वहीं काम करते हैं?” मैंने पूछा।

“और मुझे कहां जाना था। आप फिर कभी वहां आए ही नहीं।” उसने मेरी ओर देखा। लगा कह रही हूं, “कैसे निर्दयी हो, फिर कभी हाल ही नहीं जाना।” मैं उसकी निगाह सहन नहीं कर पाया। मैंने नजर झुका कर कहां, “बस टाईम ही नहीं मिला। काम में ही इतना बिजी रहा। तीन जगह पर काम करता हूं।”

“काम जीने के लिए किया जाता है, काम के लिए नहीं जीआ जाता।” उसने सयानों की तरह कहा। तभी मेरी निगाह उसके द्वारा थामे स्टॉलर पर पड़ी।

“कितना प्यारा बच्चा है। क्या नाम है?” मैंने बच्चे से लाड़ करते हुए कहा।

“गैरी, पूरा नाम गुरमीत।” मेरे अंदर एक तरंग उठी।

उस दिन दिमाग में आया, मम्मी-डैडी की बात मान लेनी चाहिए। वे कब से विवाह के लिए मेरे पीछे पड़े हैं।

मैं पन्ने पलटने लगी। ‘विवाह की तैयारी’ शीर्षक पर मेरी निगाह ठहर गई।

“विवाह की सहमति देने पर मां अत्यन्त खुश हो गई। कनाडा में ही लड़की देखने की बात सुन कर मां ने इन्कार कर दिया, “यहां की पली-बढ़ी हमें कहां पूछेगी।” “यहां की नहीं, वो तो कल्चरल डिफरेंस होगा ही। मेरा मतलब था कि हमारी तरह आकर बसे परिवार से था।” मैंने कहा।

“नहीं, यहां आकर लड़कियां तुरन्त बदल जाती हैं। विवाह तो हम इंडिया में ही करेंगे।” डैडी ने आखिरी निर्णय सुना दिया।

“रिश्तेदार तो रोज एक नया रिश्ता भेज देते हैं। किसे स्वीकार करें, किसे ना करें।” मैंने प्रतिदिन आते खतों के बारे में याद करवाया।

“हम रिश्तेदारी की बजाए अखबार में विज्ञापन दे देते हैं।” डैडी ने कहा। मैंने सहमति दे दी।

इंडिया पहुंच कर सबसे पहले सुखजीत को ही देखने का फैसला किया गया। उसकी तस्वीर देख कर ही मैं होश खो बैठा। उसे देखते ही उसी का हो गया। मुझे लगा, वह भी जिंदर की तरह देख रही होगी लेकिन उसकी पलकें झुकी हुई थीं।”

“तो क्या मैं आंखें फाड़ कर देखती। मुझे मालूम है, कितने क्लेश के बाद मैं वहां बैठ पाई थी।” डायरी से निगाह हटा कर मैं बीते समय में खो गई।

घर में पूरा तनाव था। मैंने जिद ठान ली थी कि विवाह केवल जसविन्दर संग ही करूंगी, वरना नहीं।

पापा ने कहा, “कोई कामकाज तो करता नहीं। हम तुम्हारा भला चाहते हैं।”

“मेरा भला इसी में है कि मेरा विवाह जसविन्दर से हो।” मैंने बीजी से कह दिया।

“अभी तो वे केवल देखने के लिए आ रहे हैं। चुप रहो। पता नहीं, हां हो या ना। तुम यूं ही क्लेश कर रही हो।” बीजी ने समझाया परन्तु मैंने जिद ना छोड़ी।

“दूसरे छोटों के बारे में भी तो सोचो। लोग लाखों रुपए दे कर बाहर वालों के पीछे भागते हैं।” पापा ने गुस्से से कहा।

इतने में जसविन्दर आ गया। उसने मुझसे कहा, “तुम्हारे डैडी से बात हो गई है। तुम बस हां कह दो।”

“क्या?” मैं हैरान रह गई।

“तुम्हें याद है, मैंने एक बार कहा था, अगर बाहर से रिश्ता आया तो मैं कर लूंगा। बाद में तू कौन और मैं कौन।”

“यह मुझसे नहीं होगा।” मैंने कह दिया।

“जब मुझे एतराज नहीं, फिर तुम्हें क्यों?”

“लेकिन मुझे एतराज है,” कह कर मैंने मुंह घुमा लिया।

“जरा संयम से काम लो। अपने फ्यूचर, अपने होने वाले बच्चों के बारे में सोचो। इंडिया में कोई फ्यूचर नहीं है। हमें चांस मिल रहा है, इसे ऐसे ही नहीं जाने देना।” वह और भी तर्क देता रहा। मेरा दिमाग सुन्न हो गया। जब वे लोग मुझे देखने आए, मैं एकदम पत्थर बन कर बैठी रही। मैंने नजर उठा कर भी ना देखा। मेरा मन ही नहीं था।

मुझे डायरी का ख्याल आया। मैं आगे पढ़ने लगी।

“सभी चाय पीते रहे। मम्मी ने दो बार सुखजीत से चाय पीने को कहा। उसने कांपते हुए कहा, “नहीं, आप |

अकेले में मम्मी ने कहा, “लड़की बहुत अच्छी है। नजर उठा कर भी नहीं देखा। अपने वहां लड़कियां बिलकुल शर्म नहीं करतीं।” मम्मी के स्वर से अत्याधिक खशी झलक रही थी।

सुखजीत हमारे पास फिर से आकर बैठी। अन्य सभी कमरे से बाहर चले गए। मैं और सुखजीत कमरे में अकेले थे। मुझे कोई बात सूझ नहीं रही थी और वह गुमसुम-सी बैठी थी। आखिर में मैंने ही चुप्पी तोड़ी, “आजकल क्या कर रहे हैं आप?”

“एम.ए.,” उसने मरियल-सी आवाज में कहा।

“जब मैं कनाडा गया, तब बी.एस.सी. सैकिंड एयर में था। वहां जाकर पढ़ नहीं पाया बस काम में लग गया।” सुन कर उसने केवल हूं कहा।

“आपको सब ठीक लग रहा है। विवाह के लिए कोई एतराज तो नहीं?” मैंने पूछा।

उसने ना में हिलाते हुए सिर को और भी झुका लिया।

“आप कुछ पूछेगे नहीं मेरे बारे में?”

उसका सिर और भी झुक गया। मुझे उस पर बहुत प्यार आया। जी चाहा, अभी बाहों में भर लूं। संकोची लड़कियां मुझे हमेशा से अच्छी लगती हैं।

“आइए, खाना खाएं।” कहते हुए एक सुदर्शन जवान अंदर आया। मेरी ओर हाथ बढ़ा कर कहने लगा, “मैं जसविन्दर, सुखजीत का मौसी का लड़का और आप गुरमीत सिंह कनेडियन।” कह कर वह हंस दिया।

पन्द्रह दिन बाद का विवाह तय हो गया। मेरे पास केवल पांच सप्ताह की ही छुट्टी थी।

अगले पन्ने पर शीर्षक था, ‘दो सप्ताह का स्वर्ग।’ मैं पढ़ने लगी।

“विवाह के बाद सुखजीत के साथ बिताने के लिए केवल दो सप्ताह ही थे। संबंधी अधिक थे। उसके डैडी ने सुखजीत की ओर के संबंधियों के घर जाने से बचा लिया। जब भी मौका मिलता, वह कनाडा के बारे में पूछते। बीजी तो केवल खाने-खिलाने में ही लगे रहते। उनके रूप में मुझे एक और मां मिल गई थी। कनाडा में मैं खाली-खाली महसूस करता था, अब भरा-भरा महसूस करने लगा। लेकिन मुझे लगता, सुखी मेरे साथ खुल नहीं रही थी। एक रात मैंने उससे पूछ ही लिया, “सुखी…।”

“जी।”

“जीतू।”

“मैं तुम्हें सुखी कहूं या जीतू?”

“जो आपको ठीक लगे।”

“नहीं, जो आपको अच्छा लगे।”

“दोनों ठीक है।”

“सुखी।”

“जी।”

“मेरा मन तुम्हारी गोद में सिर रखने का कर रहा है।” वह एक बैड पर पालथी लगा कर बैठ गई। मैंने उसकी गोद में सिर रख दिया।

“जीतू।”

“जी।”

“अपने केश खोल कर इसकी छाया मुझ पर करो।” उसने तुरन्त केश खोल कर मेरी ओर कर दिए।

“अरे यह तो अंधेरा हो गया, मैं तुम्हारी आंखें नहीं देख पा रहा। तुम ऐसा करो, केश बांध लो।” उसने केश बांध लिए।

“सुखी।”

“जी।”

“मैं तुम से जो कह रहा हूं, तुम कर रही हो, तुम्हारी अपनी कोई इच्छा नहीं है?”

“आपकी इच्छा ही मेरी इच्छा है।”

“डायलॉग अच्छे बोलती हो।”

“आपको ये डायलॉग लग रहे हैं?”

“नहीं, मेरा मतलब है, तुम मेरे साथ खुल कर बात क्यों नहीं कर रही हो?”

“खुलने के लिए थोड़ा वक्त लगता है।” उसने कहा।

हां, उसने ठीक ही कहा था, “टाईम तो लगता है। मैं ऐसे जल्दी ही उससे खुल जाने की उम्मीद कर बैठा। शर्मीली लड़कियां इतनी जल्दी घुल-मिल नहीं जाती।”

***

जसविन्दर फिर मेरे सामने आ खड़ा हुआ। उसने कहा था, “उसे शक मत होने देना। जैसे वह कहे, करती रहना।” मैं अपनी ओर एक्टिंग करने की पूरी कोशिश कर रही थी। लेकिन मेरा यह भोला पंछी। यह मुझे क्या होता जा रहा है। अब मैं इस पर अपना हक भी जताने लगी हूं। एक्टिंग कर-कर के थक चुकी हूं। अब और एक्टिंग नहीं होगी मुझसे। चलो, अभी करती हूं बुआ को फोन। घड़ी की ओर देखा। पौने दो हो गए। क्या हुआ, आज गुरमीत का फोन क्यों नहीं आया। ऐसा कैसे हो सकता है। मैंने कॉल चेक की. उसका फोन आ चका था। हाय मैं मर जाऊं। मैं पढ़ने में इतनी खोई रही कि फोन की रिंग ही नहीं सुनी। बेचारा फिक्रमंद होगा। मैंने फोन उठा कर पास रख लिया और फिर से डायरी पढ़ने लगी।

“वो वक्त तो पंख लगा कर उड गया। कनाडा लौटने का रत्ती भर मन नहीं कर रहा था। बीजी के पांव छूते, मैं उनसे लिपट ही गया, “मुझे यहीं रख ले बीजी।” मैं रो दिया। बीजी ने मुझे और भी अपने साथ कस लिया। वह मुझसे अधिक रोने लगी। सुखी की आंखें भी गीली थी। जहाज मैं बैठते ही सुखी की आंखें मेरे साथ हो गई।

***

मेरी आंखें भर आई। ये क्या हो रहा है मुझे?

तब एयरपोर्ट पर पता नहीं क्यों मेरी आंखें छलक उठी थीं। लेकिन गांव पहुंचने पर देखा, जसविन्दर आया बैठा था। फिर वह दूसरे-तीसरे दिन आने लगा। मैं उसके साथ खुश रहती। जब मैं कनाडा आने लगी, जी चाहा, “जसविन्दर से लिपट कर कहूं, “मुझे यहीं रख लो।” परन्तु मैं नहीं कर पाई जबकि बीजी के गले लगते मैंने यह अवश्य कह दिया। बीजी ने मुझे अपने साथ लिपटाते हुए धीरे से कहा, “लड़कियों को अपने घर जाना ही होता है। समझदार बनो। सोच-समझ कर फैसला करना। गुरमीत हीरा है।” मैंने बीजी के बाद जसविन्दर की मां के पैर छुए। उसने मुझे शगुन दिया और सिर सहलाते हुए कहा, “अच्छा बेटी, मर्द बच्ची बनना। घबराना नहीं।” जसविन्दर ने केवल इतना ही कहा, “गरीबमार ना कर देना कहीं।” ऐसा वह पहले भी कई बार कह चुका था कि मैं एयरपोर्ट से सीधे उसकी बुआ के घर ही चली जाऊ। परन्तु पापा माने नहीं। कहने लगे, “इस तरह तो अखबार की सुर्थी बन जाएगी। बदनामी होगी।” किसी को बदनामी की चिन्ता, किसी को गरीबमार होने की और यह बेचारा, मैं डायरी के पन्ने उलटती गई। ‘सुखी की झिड़क’ वाला पृष्ठ खोल लिया।

“मेरा मन चाहा, मैं इंडिया वापस चला जाऊं। वापस जा नहीं सकता था लेकिन फोन जरूर जल्दी-जल्दी कर लेता। एक दिन सुखी कहने लगी, “और चार महीने तक मैं आपके पास आ जाऊंगी। आप ऐसे ही फोन पर इतने पैसे खर्च करते हैं। वैसे भी बाद में भाई-बहन मुझे छेड़ते हैं।” सुखी की झिड़क मुझे अच्छी लगी। “कितना फिक्र है इसे अभी से घर का। फोन को फिजूल खर्च समझती है सुखी। कितनी समझदार है।”

***

“अरे भले मानस! तब मझे तम्हारे खर्च की कोई चिन्ता नहीं होती थी। मैं तो बस एक्टिंग कर रही थी. तम्हारी पत्नी होने की। जब तम्हारा फोन जल्दी-जल्दी आता. तब मां मेरे भीतर जमी बर्फ पिघलाने का यत्न करती, कहती, “देखा कितना प्यार करता है तुझे।” परन्तु जसविन्दर की मौजूदगी में मेरे भीतर की बर्फ और भी सख्त हो जाती। मां कहती, “तुम्हारी आंखों पर कच्ची उम्र की पट्टी बंधी हुई है, जो तुम्हें अच्छे-बुरे की पहचान नहीं होने देती। जब तक तुम्हें समझ आएगी, तब तक देर हो जाएगी। फिर रोते रहना सदा के लिए।” मां तो बस ऐसे ही, मैं तो जसविन्दर से प्यार करती हूं और वह समझती है, कच्ची उम्र का है। कहीं मां की कही बात? मैं भी बस। हूं, पहले इसे पढ़ लूं। ‘सुखी के आने की पार्टी’ इस पृष्ठ को निकाल कर पढ़ने लगी।

“मेरे सहकर्मी, मुझ से सुखी के आने की पार्टी मांग रहे थे। पार्टी तो उन्हें दूंगा, मगर वैसी नहीं, जैसी वे चाहते हैं। पम्मी भाई कहता, “बॉब की गर्लफ्रेंड लीसा को बुला लेंगे। पीटर की तरह की स्टैग पार्टी लेनी है तुमसे।”

“स्टैग पार्टी तो विवाह से पहले लड़का और उसके दोस्त करते हैं। तुम सब कुछ उलट करना चाहते हो।” मैंने कहा।

“उल्टा-सीधा हमें नहीं मालूम। हमें तो पार्टी चाहिए। मैंने तो बॉब से बात भी कर ली है।” पम्मी अपनी बात पर अड़ा हुआ था।

***

“यह स्टैग पार्टी क्या होती है? मैंने सोचा। शायद इसी डायरी से इसका भी पता लग जाए। मैं पन्ने पलटने लगी। ‘पीटर की स्टैग पार्टी’ वाला पृष्ठ मिल गया।

“पीटर की स्टैग पार्टी करने के लिए सभी सहकर्मियों ने डॉलर इकट्ठे किए। बॉब ने कहा, “स्ट्रेपर का प्रबंध मैं करूंगा। एक नंबर।” बॉब हमारी कंपनी में आउट-साईड सेल्जमैन है। उसका असल नाम बलविन्दर है मगर खुद को बॉब कहलवा कर खुश होता है। वह पार्टी के लिए एक स्ट्रेपर ले आया। बीयर की बोतलें खाली होने लगीं। म्यूजिक बजने लगा। स्ट्रेपर निर्वस्त्र होकर डांस करने लगी। पम्मी भाई स्टेपर पर लट हो. बीयर पर बीयर चढ़ाने लगा। बॉब के कंधे पर हाथ मार कर स्ट्रेपर की ओर इशारा करके कहने लगा, “यह माल कहां से पटाया पढे।” बॉब को शायद पट्टे समझ में नहीं आया, वह यहीं की पैदाइश है। मुस्कुरा कर बोला, “मेरी गर्लफ्रेंड है लीसा।”

“तेरी गर्लफ्रेंड का जिस्म एक नंबर है।” पम्मी भाई ने झूमते हुए कहा।

“थैक्यू”, बॉब ने कहा।

“तू तो किस्मत वाला है, रोज इसके साथ सोता है। काश मैं भी ऐसा कर सकता।” पम्मी ने नशे में झूमते हुए कहा।

“तम इसके साथ सोना चाहते हो?” बॉब ने लीसा की ओर इशारा करके कहा। मेरा मंह खला का खला रह गया।

“तुम मजाक कर रहे हो।” पम्मी को भी जैसे यकीन ना आया।

“नहीं, मैं सीरियस हूं। तुम्हें कुछ डॉलर खर्च करने होंगे।” बॉब ने कहा।

“तुम सीरियस नहीं लग रहे। तुम्हें कोई एतराज नहीं ?” मैंने हैरानी से पूछा।

“क्यों, इसमें एतराज कैसा। उसके पास बढ़िया जिस्म है। उसका फायदा उठाना चाहिए। सच तो यह है कि मैंने ही लीसा को यह सलाह दी थी। अब मैं मर्सिडीज एस.यू.वी. चलाता हूं, पैंट हाऊस में रहता हूं।” बॉब ने अकड़ कर बताया।

‘साला पिंप’, मैंने अपने मन में कहा और पम्मी को खींच कर परे ले गया लेकिन पम्मी….

***

मुझ से आगे पढ़ा नहीं गया। सांस तेज चलने लगी। डायरी एक ओर रख दी। मेरे भीतर गुरमीत के साथ बिताई पहली रात का एहसास पैदा होने लगा। उस रात मैं दहाड़ कर रोई थी। मेरी आंखें अभी छलक उठी। मेरी निगाह विवाह वाली तस्वीर पर जा पड़ी। धुंधली तस्वीर फैल कर दीवार का आकार ले गई। मैंने आंखें पोंछी। तस्वीर साफ हो गई। गुरमीत सेहरा बांधे मेरी उगूली में अगूंठी पहना रहा है। तस्वीर में मैंने अपने विवाह वाले सूट की ओर देखा। मैंने उठ कर अटैची खोल ली। कपड़े निकाल कर हैंगरों में लटका दिए। अटैची से विवाह का सूट भी निकल आया। पैकिंग करते समय, मैं यह सूट अटैची में नहीं रख रही थी लेकिन बीजी ने जबर्दस्ती यह सूट अटैची में डाल दिया था। नहा-धोकर मैंने वह सूट पहन लिया। मुझे लगा, जैसे बीजी मुस्कुरा रहे हों।

पंजाबी का सशक्त युवा कथाकार, गांव और शहर के निम्न और मध्य वर्ग की जटिलताओं को कथा में पिरोकर प्रस्तत करना। दलित वर्ग की समस्याओं की ओर सूक्ष्मता से ध्यान दिलाना और उनके लिए नई राहों की ओर अग्रसर होने को लालायित। पांच कहानी-संग्रहों के साथ अभी हाल ही में एक उपन्यास की रचना।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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