Hindi Kahani: सर्दियाँ!सर्दियाँ बाइ गॉड की कसम वैसे तो हमें बहुत पसंद है पर इस बार सर्दियाँ जैसे जल्दी आ गई थीं। वैसे तो दिसंबर के आखिर में किसी तरह हाँफते-कांपते पहुंचती थी पर पता नहीं इस बार उसे आने की ऐसी कौन सी जल्दी थी। जैसे उसे भी कहीं रिपोर्टिंग करनी हो।
जनाब! मैं सर्दी आपकी खिदमत में हाजिर हूँ…रिपोर्टिंग सर हूं….रमा के चेहरे पर झुंझलाहट हाथ-पांव फैलाकर पसर गई। हवा में एक गुलाबी खुश्बू बिखरी हुई थी और रमा के चेहरे पर भयंकर तनाव…सर्दिया उसे बिल्कुल पसंद नहीं थी।कोई जन्मजात दुश्मनी नहीं थी पर शादी के पहले और शादी के बाद की सर्दी में बहुत फर्क था।उसने एक गहरी सांस लेकर नवीन की ओर देखा।
सर्दियों का मजा तो मायके में आता था।अम्मा के हाथों के गोभी,मूली के पराठे,वो काले गाजर का हलवा,वो
मटर का निमोना,वो आलू-मटर की घुघरी साथ में अदरख,तुलसी की चाय…अहा$$$ स्वर्गीय आनंद साक्षात
धरती पर… जितना चाहो ठूंस-ठूंस कर खाओ और दिन भर धूप में मगरमच्छ की तरह पड़े रहो और
अब…अम्मा ठीक ही कहती थी।
बिना मरे स्वर्ग नहीं मिलता।हमें नहीं चाहिए ऐसा स्वर्ग…रमा झुंझला गई।
इससे तो गर्मियां ही भली न ये सब सब्जियां मिले ,न खाने का मन करे और न ही बनाने का झंझट।
आज सुबह ही ताजा-ताजा नवीन से उसका झगड़ा हो गया था। मूड कुछ ठीक नहीं था,वैसे बात कुछ खास नहीं थी|
पर मूड तो मूड ही होता है।पुरानी गाड़ी की तरह जब देखो तब खराब हो ही जाता है।सर्दी के दिनों में बालों
को धोना एक टास्क से कम नहीं होता। कहने को तो आज इतवार था, छुट्टी का दिन पर नवीन को आज
थोड़ी देर के लिए ऑफिस जाना था, इसलिए उसने पहले नहा लिया। नहा लिया!यहाँ तक तो ठीक था पर
गीजर किस खुशी में बंद कर दिया।
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रमा ने जैसे ही शावर चलाया, ठंडे पानी की धार तीर की तरह सीधे दिमाग़
में घुस गई।
आत्मा का परमात्मा से मिलन बस होते-होते बचा। वाक युद्ध से शुरू हुआ प्रकरण धीरे-धीरे शीत
युद्ध में बदल गया। नवीन ने रमा को मनाने का बहुत प्रयास किया पर रमा का मूड निष्ठुर सर्दी की तरह ठंडा ही
पड़ा रहा।रमा वैसे ही चुपचाप टांगे पसारे धूप में पसरी रही।रमा की दुनिया स्वादिष्ठ व्यंजनों के सपनों में गोते
लगा रही थी और नवीन रमा की बात सुन-सुन मुस्करा रहा था,
बीस साल हो गए हमारी शादी के पर तुम्हारा ये मायका पुराण आज भी बदस्तूर जारी है।अरे यार खाने का
इतना ही मन है तो बनाओ न… किसने रोका है।
खुद भी खाओ और हमें भी खिलाओ। कितने दिन हो गए वो
मिक्स आचार और लहसुन का आचार खाए…सरसों के तेल और नींबू-मसाले में लिपटा…अहा।
नवीन अचार की कल्पना कर आकंठ डूब गया। एक तो रमा पहले से ही नाराज थी उस पर से उसका यह
वक्तव्य आग में घी का काम कर गया, नवीन ने खुद ही अपने हाथों लकड़ी लगाने का काम किया था।रमा ने
जलती निगाहों से नवीन की ओर ऐसे देखा मानो उसे खड़े-खड़े ही भस्म कर देगी।
नवीन चुपचाप भस्म होने से
पहले ही ऑफिस के लिए सरक लिए और रमा का मूड जाड़े की सर्द दिनों में अलसाई धूप की तरह ही ठंडा
पड़ा रहा। नवीन ने रमा को मनाने का रास्ता ढूंढ ही लिया।शाम को ऑफिस से लौटते हुए वे दोनों हाथों में बड़े –
बड़े सब्जियों के झोले पकड़े प्लास्टिक मुस्कान के साथ द्वार पर खड़े थे।
ये पति भी न शादी के बढ़ते सालों की
तरह कितना बदल जाते हैं। शादी के शुरुआती सालों में ऑफिस से लौटते वक्त सरप्राइज के नाम पर कभी
खाने -पीने का सामान तो कभी कपड़े तो कभी कोई कीमती चीज़ लाकर चौंका देते ।वक्त के साथ उनका
प्यार सर के बालों की तरह गायब होने लगता है। नवीन की गिनती भी उसी तरह के पतियों में आती थी।अब
तो उनके दिए हुए सरप्राईज से भी रमा को डर लगने लगा पर कहते हैं न जिस चीज़ से आपको डर लगता है
वह चीज़ नहा-धोकर आपके पीछे पड़ जाती है।
;रमा! तुम्हें पराठे बहुत पसन्द हैं न…तुम्हारे लिए… सिर्फ तुम्हारे लिए मैं मेन मंडी तक चला गया।तुम ही कहती
हो न वहां सब्जियां बड़ी ताज़ी मिल जाती हैं।
रमा ने गौर किया नवीन का तुम्हें, तुम्हारे और तुम जैसे शब्दों पर कुछ ज्यादा ही जोर था।
;हां-हां!सही कहते हो सारे पराठे तो सिर्फ मैं ही खाती हूं तुम तो सिर्फ सूंघ कर रह जाते हो?
मामला बिगड़ता देख नवीन ने सब्जी का झोला वही ड्राइंग रूम के कोने में पलट दिया।
;सब्जियां देखो! तुम्हारी तबियत एकदम खुश हो जाएगी।
खुश…सब्जियों को देख रमा को चक्कर आ रहे थे। कुल जमा दो प्राणी के परिवार के लिए इतनी सब्जी…पांच
किलो नए आलू, पांच किलो मटर, ढाई किलो मेथी,दो किलो मूली, आधा किलो लहसुन और न जाने क्या-
क्या!नए आलू लुढ़कर सोफे के नीचे चले गए और अपने कदमों के निशान धरती पर छोड़ गए।मेरा मतलब
मिट्टी से था और जनाब लहसुन गुलाटिया मारते हुए उसके पैर से आकर टकरा गया। रमा ने बेचारगी से
अपने हाथों की ओर देखा। छः सौ रुपए…जी हां पूरे छः सौ रुपए का कल ही मेनिक्योर करवाया था और पंद्रह
सौ का नाखूनों पर मोर के रंग का नेल आर्ट। ये आलू और लहसुन उसके हाथों और नाखूनों की ऐसी-तैसी
करने के लिए तैयार थे।रस्सी से बंधा हुआ मेथी का बंडल भक्त की तरह उसके चरणों में पड़ा रहम की भीख
मांगता अपनी रिहाई की दुहाई मांग रहा था।
तब तक नवीन ने दूसरा झोला भी उसके सामने पलट दिया।
एक-दूसरे पर गिरते-पड़ते गुथम-गुथा करते मटर वही जमीन पर पसर गए।एक मटर महाशय अपनी काया
को छोड़ उसके पैर के पास लुढ़क आए और टुकुर-टुकुर उसको तांकने लगे, न जाने क्यों उसे ऐसा लगा
मानो वह उसकी स्थिति का मजा ले रहा हो। रमा को रोना आ रहा था,
कौन खाएगा ये सब…और इतने सारे मटर… वो कौन छीलेगा?
नवीन सोच रहा था,मटर छीलना वाकई में एक बड़ी समस्या है।वो भी तो जितना छीलता नही उससे ज्यादा
छीलते-छीलते खा जाता है।सरकार को इस विषय पर ध्यान देना चाहिए और इसे देशव्यापी समस्या घोषित
कर देना चाहिए।
तभी डोरबेल बजी। सामने रामू काका खड़े थे।रामू काका रमा के मायके में नौकरी किया करते थे।रमा उनकी
गोद में पली थी,बड़ा गहरा स्नेह था।रामू काका को देख सुबह से मातम पसरे रमा के चेहरे पर चार सौ चालीस
वोल्ट का बल्ब जल गया।
अरे काका आप! अचानक कैसे आना हुआ?
;इस बार फसल बहुत अच्छी हुई है।मालकिन ने तुम्हारे लिए सब्जियां भेजी है। बिटिया मायके को बहुत मिस
करती हो न…
काका के आँखों से अपनी बिटिया रमा के लिए ममत्व टपक रहा था।पीछे जीप में दो बोरी मटर,एक बोरी
टमाटर,एक बोरी गोभी और न जाने क्या-क्या रखा था।रमा सर पर हाथ
