Mulla Nasruddin
Mulla Nasruddin

Mulla Nasruddin ki kahaniya: अमीर ने एक दिन असमय ही नसरुद्दीन को बुलवा लिया। अभी पौ नहीं फटी थी। सारा महल सोया पड़ा था।
शाही आरामगाह में जाते हुए सुर्ख़-सफ़ेद पत्थर की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए वह सोचने लगा कि अमीर को इस वक्त उससे क्या काम हो सकता है ?
रास्ते में उसकी मुलाक़ात बख्तियार से हुई, जो आरामगाह से चुपचाप साये की तरह निकला था। बिना रुके दुआ सलाम हुई | नसरुद्दीन को लगा कि कोई साज़िश की गई है। उसे सावधान हो जाना चाहिए।

आरामगाह में उसने शाही कोच के सामने ख़्वाजा सरा को पड़ा देखा। वह कराह रहा था। उसके पास
ही सोने की मूठ वाले बेंत के टुकड़े पड़े थे।
अमीर रेशमी लिहाफ़ से बाहर बालों भरी टाँगें लटकाए बैठे थे। उसे देखते ही बोल उठे, ‘मौलाना हुसैन, माबदौलत इस वक्त बहुत दुखी हैं और उनके दुख की वजह यह ख़्वाजा सरा है। ‘

‘क्या इसने कोई गुस्ताख़ी करने की हिम्मत की थी, आलमपनाह ?’ नसरुद्दीन ने घबराकर पूछा, ‘मेरे आका, क्या इसने कोई गुस्ताखी करने की जुर्रत की थी?’
‘अरे नहीं।’ अमीर ने हाथ हिलाकर मुँह बनाते हुए कहा, ‘आपकी अक्लमंदी से हमने पहले ही सारी बातें सोच-समझकर सावधानी बरत रखी है। भला इसकी ऐसी मजाल कैसे हो सकती है। हमें आज पता चला कि सल्तनत के सबसे बड़े ओहदों में से एक ओहदे पर मुकर्रर किए जाने की हमारी मेहरबानी भूलकर यह हिजड़ा अपना फ़र्ज़ पूरा करने में गफलत करता रहा है। ‘
इस बात का फायदा उठाकर कि हम कई दिनों से हरम में नहीं जा रहे हैं, इसने तीन दिन तक लगातार हरम में जाकर गाँजा पीने की गुस्ताखी की । हमारी रखैलें इसे नशे में मदहोश देखकर आपस में लड़ती-झगड़ती रहीं। एक-दूसरे का मुँह और बाल नोचती रहीं। इससे बहुत भारी नुकसान हुआ है। नुचे हुए मुँह और गंजे सिर वाली औरत हमारी नज़र में पूरी तरह हसीन नहीं होती। इसके अलावा एक बात और हुई, जिसका हमें बेहद अफसोस है। हमारी नई रखैल बीमार पड़ गई है। तीन दिन से उसने खाना नहीं खाया है। ‘

मुल्ला नसरुद्दीन चौंक पड़ा।

‘ठहरो, अभी हमने अपनी बात ख़त्म नहीं की। वह बीमार है और शायद बचे नहीं। अगर हम उससे एक बार मिल चुके होते तो उसकी बीमारी या मौत से हमें ज़्यादा तकलीफ़ न होती। लेकिन मौलाना हुसैन, तुम तो समझ ही सकते हो कि जो हालात है उनकी वजह से हम कितने परेशान हैं। इसलिए हमने तय किया है कि हम इस बदमाश गंजेड़िए को इसके ओहदे से बर्खास्त कर दें और इसे दो सौ कोड़ों की सज़ा दें। और मौलाना हुसैन हमने तुम्हें ख़्वाजा सरा के ओहदे पर मुकर्रर करने की मेहरबानी फर्माई है। ‘

नसरुद्दीन को लगा, ‘उसकी साँस गले में फँसकर रह गई है। पेट में ठंडक और पैरों में कमज़ोरी महसूस होने लगी। लेकिन जल्दी ही खुद को सँभालकर झुककर कोर्निश करते हुए बोला, ‘अल्लाह हमारे ताजदार का साया हमेशा हमारे सिर पर बनाए रखे। मुझ नाचीज़ गुलाम पर अमीर की बेशुमार मेहरबानियाँ हैं। शहंशाहे – आज़म अपनी रियाया के दिल की पोशीदा-से-पोशीदा ख़्वाहिशें जान लेने का जादू जानते हैं। इसी से वह अपनी रियाया को रहम-ओ-करम से लाद देते हैं। कई बार मुझ नाचीज़ गुलाम
ने इस आलसी और बेवकूफ़ इन्सान की जगह लेने की तमन्ना की है, जो मुनासिब सज़ा पाकर फ़र्श पर पड़ा है। लेकिन मैं इसका जिक्र करने की हिम्मत नहीं कर पाया। अब क्योंकि हुजूर ने खुद ही…।’
खुश होकर अमीर ने नर्मी से कहा, ‘तो फिर डरे क्यों हो । माबदौलत अभी हकीम को बुलाते हैं। वह अपने चाकू ले आएगा और तुम उसके साथ कहीं तन्हाई में चले जाना। हम बख़्तियार को बुलाकर तुम्हें ख़्वाजा सरा मुकर्रर करने का हुक्म जारी करते हैं।
अमीर ने ताली बजाई ।
दरवाज़े की ओर घबराकर देखते हुए नसरुद्दीन जल्दी से बोला, ‘बादशाह सलामत इस नाचीज़ के हकीर लफ्जों को सुनने की तकलीफ़ फर्माएँ। मैं बड़ी खुशी से हकीम के साथ तन्हाई में जाने को तैयार हूँ लेकिन बादशाह की खुशी की फ़िक्र मुझे ऐसा करने से रोक रही है। हकीम से मिलने के बाद मुझे कई दिन बिस्तर पर गुज़ारने पड़ेंगे। इस बीच नई रखैल आ भी सकती है। तब अमीर का दिल सदमे की धुंध से भर जाएगा। इस बात का ख़याल भी इस गुलाम को बर्दाश्त नहीं हो सकता । इसलिए मेरी सलाह है कि पहले उस रखैल की सेहत ठीक हो जाए। फिर मैं खुद को हकीम के सुपुर्द करके ख़्वाजा सरा के ओहदे के काबिल बनने की तैयारी में लग जाऊँ।’
‘हूँ।’ अमीर ने कहा और फ़र्श पर पड़े हिजड़े की ओर पलटकर बोले, ‘अबे मकड़ी की नाकिस (तुच्छ) औलाद, जवाब दे। क्या हमारी नई दाश्ता बहुत बीमार है ? क्या हमें उसकी मौत का अंदेशा होना चाहिए ?’
‘ऐ अजीमुश्शान अमीर !’ हिजड़े ने जवाब दिया, ‘वह नए चाँद की तरह पीली पड़ गई है। चेहरा मोम जैसा हो गया है। उँगलियाँ ठंडी पड़ गई हैं। बूढ़ी औरतें कह रही हैं कि आसार ख़राब हैं। ‘
‘ऐसी बात है तो शायद वह सचमुच मर जाए । उसके मरने से हमें सदमा होगा। लेकिन मौलाना हुसैन, क्या तुम्हें यकीन है कि तुम उसे अच्छा कर दोगे?’

‘हुजूरे- आला को मालूम है कि बगदाद से बुखारा तक मुझसे ज़्यादा होशियार हकीम नहीं है। ‘
‘जाओ मौलाना हुसैन, उसके लिए दवा तैयार करो । ‘
‘हुजूर, मुझे पहले उसकी बीमारी का पता लगाना होगा। इसके लिए मुझे जाँच करनी होगी। ‘

जाँच।’ अमीर हँस पड़े, ‘मौलाना हुसैन, जब तुम ख़्वाजा सारा बन जाओ, तब इत्मीनान से उसकी जाँच कर लेना।’
नसरुद्दीन झुककर ज़मीन से लग गया, ‘बादशाह सलामत, मुझे जाँच । ‘ अमीर चिल्ला उठे, ‘नाचीज़ गुलाम, क्या तू नहीं जानता कि मौत से पहले कोई भी मर्द हमारी स्त्री रखैलों के चेहरे नहीं देख सकता।’
‘जानता हूँ बादशाह सलामत। मेरा मतलब उसके चेहरे की जाँच करने से नहीं था। उसके चेहरे की ओर नज़र उठाने की गुस्ताख़ी मैं कभी नहीं कर सकता । मुझे अपने पेशे की इतनी ज़्यादा जानकारी है कि मैं नाखूनों की रंगत देखकर ही बीमारी का पता लगा सकता हूँ। मेरे आका, मेरे लिए उसका हाथ देख लेना ही काफ़ी होगा। ‘

‘हाथ? यह तुमने पहले क्यों नहीं कहा? वरना मुझे गुस्सा न आता। हाथ ? हाँ यह तो हो सकता है। तुम्हारे साथ हम भी चलेंगे। हमें उम्मीद है कि तुम अगर हमारी रखैल का सिर्फ हाथ देखोगे तो हमें कोई परेशानी नहीं । ‘

‘बादशाह सलामत को कतई जलन नहीं होगी । ‘ नसरुद्दीन ने तसल्ली देते हुए कहा।
वह सोच रहा था कि गुलजान से अकेले में तो कभी मुलाक़ात हो नहीं सकेगी। किसी-न-किसी का साथ रहना ज़रूरी है। अच्छा है कि किसी और के बजाय खुद अमीर ही साथ है, ताकि उन्हें शक न हो सके।

ये कहानी ‘मुल्ला नसरुद्दीन’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Mullah Nasruddin(मुल्ला नसरुद्दीन)