Mulla Nasruddin ki kahaniya: अमीर उतना सुंदर नहीं था, जितना प्रसिद्ध था । दरबारी शायद जिस चेहरे की तुलना चाँद की चमक से करते थे, वह ज़रूरत से ज़्यादा पके खरबूजे से मिलता था । वज़ीरों के सहारे वह सवारी से उतरे और सोने से मढ़े सिंहासन पर जा बैठे। मुल्ला नसरुद्दीन ने देखा, दरबारी शायरों के अनुसार उसका बदन नाजुक पेड़ की पतली डाली की तरह बिल्कुल नहीं था। वह मोटा और भारी था। बाजू छोटे थे। पैर टेढ़े थे कि खिलअत भी उनके बेढंगेपन को छिपा नहीं पा रही थी।
वज़ीर उनके दायीं ओर तथा मौलवी और अन्य अफसर बायीं ओर खड़े हो गए। मुहर्रिर अपनी बहियाँ और दवातें लिए तख़्त के नीचे जा बैठा । तख़्त के नीचे अर्ध चंद्राकार घेरा बनाकर दरबारी शायर खड़े हो गए और अमीर की गर्दन की ओर बड़ी पाक नज़रों से ताकने लगे। चँवर डुलानेवाला चँवर डुलाने लगा। हुक्के वाले ने सोने की निगाली अपने मालिक के होठों के बीच रख दी। तख़्त के चारों ओर खड़ी भीड़ साँस रोके खड़ी थी। मुल्ला नसरुद्दीन ने एड़ियों पर उचककर गर्दन आगे बढ़ाई और कान लगाकर सुनने लगा।
नीद में भरे अमीर ने सिर हिलाया । पहरेदारों के बीच में जगह थी। गंजा तथा दढ़ियल भाई मौक़ा पड़ते ही आगे आ गए। वे घुटनों के बल घिसटते हुए तख़्त तक पहुँचे और ज़मीन तक लटकते हुए कालीन को चूमने लगे।
वज़ीर आज़म बख़्तियार ने हुक्म दिया, ‘उठो।’
दोनों भाई उठकर खड़े हो गए। वे इतनी हिम्मत नहीं कर पा रहे थे कि अपने लबादों की धूल भी झाड़ सकें। डर के मारे उनकी जबान बंद थी। आवाज़ मिमिया रही थी। वे क्या कह रहे थे, समझ में नहीं आ रहा था। लेकिन अनुभवी वज़ीर बख़्तियार ने एक नज़र में ही सारी बात समझ ली।
उसने बेचैनी से दोनों भाइयों को टोकते हुए पूछा, ‘तुम्हारा बकरा कहाँ है?’ ‘ऐ खानदानी वज़ीर, अल्लाह ने उसे अपने पास बुला लिया।’ गंजे ने उत्तर दिया, ‘लेकिन उसका चमड़ा हममें से किसे मिलेगा ?’
बख्तियार ने अमीर की ओर मुड़कर पूछा, ‘शाहों में सबसे अकलमंद अमीर, क्या फ़ैसला होगा?’
अमीर ने जम्हाई ली और बड़ी लापरवाही से आँखें मूँद लीं।
बख़्तियार ने बड़ी विनम्रता से सफ़ेद साफ़े के साथ अपना सिर झुका लिया, ‘मेरे मालिक, फ़ैसला तो आपके चेहरे पर लिखा दिखाई दे रहा है। ‘
फिर दोनों भाइयों की ओर मुड़कर बोला, ‘सुनो। ‘
दोनों भाई घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गए। वे अमीर के रहम, इन्साफ़ और अक्ल मंदी के लिए उसका शुक्रिया अदा करने के लिए तैयार हो गए थे।
बख्तियार फ़ैसला सुनाने लगा, ‘दुनिया के सूरज, मोमिनो के अमीर हमारे अमीरे-आलम ने, अल्लाह का उन पर करम रहा है, फ़ैसला करने की मेहरबानी की है कि अगर बकरा अल्लाह के पास चला गया है तो इन्साफ़ कहता है कि उसका चमड़ा इस दुनिया में अल्लाह के जाँनशीन ख़लीफ़ा यानी खुद महान अमीर के पास जाए, इसलिए बकरे की खाल निकाली जाए, उसे सुखाया और नहलाया जाए और महल के शाही ख़ज़ाने में जमा कर दिया जाए । ‘
मुहर्रिर ने एक बड़े रजिस्टर में फ़ैसला लिख दिया।
दोनों भाइयों ने घबराकर एक-दूसरे की ओर देखा। भीड़ में हल्की भनभनाहट छा गई। बख़्तियार साफ़ और ऊँची आवाज़ में कहने लगा-
‘इसके अलावा फ़रियाद करने वालों को दौ सौ तके कानूनी क़ीमत, डेढ़ सौ तके महल टैक्स और पचास तंके मुहर्रिरों के खर्च के देने होंगे और मस्जिदों के रख-रखाव के लिए ख़ैरात देनी होगी । ‘
उसने बोलना ख़त्म ही किया था कि अर्सला बेग के इशारे पर सिपाही उन दोनों भाइयों पर टूट पड़े। उनके पटके खोल डाले। उनकी जेबें ख़ाली कर लीं, लबादे फाड़ डाले और उन्हें अधनंगा करके छोड़ दिया।
पूरे मामले में मुश्किल से एक मिनट लगा। फ़ैसला सुनाए जाते ही दरबारी शायरों और आलिमों (विद्वानों) ने तारीफ़ में कसीदे पढ़ने शुरू कर दिए –
‘ऐ बुद्धिमान अमीर, ऐ बुद्धिमानों के बुद्धिमान, बुद्धिमानों की बुद्धि से बुद्धिमान अमीर, ऐ बुद्धिमानों में सबसे बड़े बुद्धिमान अमीर – ‘
बहुत देर तक वे इसी तरह गाते रहे, अपनी गर्दन तख़्त की ओर बढ़ाए हुए । हर एक इस कोशिश में था कि उसकी आवाज़ अमीर सुन ले और किसी की भी आवाज़ न सुने। इस बीच तख़्त के चारों ओर खड़ी भीड़ दोनों भाइयों को रहम भरी नज़रों से देखती रही।
दोनों भाई एक-दूसरे के गले में बाहें डाले ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे। मुल्ला नसरुद्दीन ने तसल्ली देते हुए कहा, ‘कोई फ़िक्र नहीं दोस्तो, छ: हफ्ते बाज़ार में बैठकर तुमने वक़्त बर्बाद नहीं किया। तुम लोगों को बिल्कुल सही इन्साफ़ मिला है। क्योंकि सभी जानते हैं कि सारी दुनिया में हमारे अमीर से बढ़कर अक्लमंद और मेहरबान कोई और नहीं है। अगर किसी को इस बात में शक है तो…।’ इतना कहकर उसने आस-पास खड़े लोगों की ओर देखा ‘… सिपाही को बुलाने में देर नहीं लगेगी और वे शक करने वाले उस नापाक बेवकूफ़ को जल्लादों के सुपुर्द कर देंगे और जल्लाद बड़ी आसानी से उसकी गलती उसे समझा देंगे। तुम इत्मीनान से घर जाओ ।
अगर फिर कभी किसी मुर्ग को लेकर तुम्हारा झगड़ा हो तो फिर अमीर की अदालत में जाना। लेकिन
आने से पहले अपने खेत, मकान और अंगूर के बगीचे बेचना मत भूलना। वरना तुम टैक्स नहीं चुका पाओगे, इसका मतलब होगा अमीर के ख़ज़ाने में घाटा। इसका ख़याल भी वफ़ादार रियाया की बर्दाश्त से बाहर होना चाहिए।’
आठ-आठ आँसू रोते हुए दोनों भाई बोले, ‘इससे तो अच्छा होता कि बकरे के साथ हम भी मर जाते । ‘
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, ‘क्या तुम्हारा ख़याल है कि बहिश्त में बेवकूफ़ कम हैं? भरोसे के काबिल लोगों ने मुझे बताया है कि आजकल जन्नत और दोजख दोनों जगह, बेवकूफ़ भरे पड़े हैं। और ज़्यादा बेवकूफों की वहाँ गुंजाइश नहीं है। मुझे साफ़ दिखाई दे रहा है कि तुम लोगों के लिए मौत लिखी ही नहीं है। अब यहाँ से रफूचक्कर हो जाने में देर मत करो। सिपाही इधर ही देखने लगे हैं। ‘
ज़ोर-ज़ोर से रोते, अपना मुँह नोचते, सिरों पर सड़क की पीली धूल डालते दोनों भाई वहाँ से चल दिए ।
अब लुहार अमीर के सामने आया। उसने अपनी चिड़चिड़ी और भर्रायी आवाज़ में अपनी शिकायत सुनाई ।
वज़ीरे-आज़म बख़्तियार अमीर की ओर मुड़ा, ‘मालिक, आपका क्या फ़ैसला है?’
अमीर सो रहे थे। खुले मुँह से खर्राटे भर रहे थे ।
बख़्तियार ने कहा, मालिक, आपके जलाल भरे चेहरे पर मैं फ़ैसला साफ़ पढ़ रहा हूँ।’ उसने गंभीरता से ऐलान किया-
‘मुसलमानों के रहनुमा हमारे मालिक ने अपनी रियाया की फ़िक्र करने में, अपनी खिदमत में लगे वफ़ादार सिपाहियों को रखने और खिलाने-पिलाने की इज़्ज़त बख़्श कर रियाया पर बड़ी मेहरबानी की है। उन्हें हर दिन और हर घंटे अपने अमीर का अहसान मानने का शानदार मौका दिया है। फिर भी लुहारों ने शराफ़त और पाकीजगी में बिल्कुल नाम नहीं कमाया । लुहार युसुफ ने गुनाह करने वालों के लिए बाल के पुल और दूसरी दुनिया की तकलीफ़ों को भूलकर अहसान – फ़रामोशी में जुबान खोलने की गुस्ताखी की है। हमारे मालिक और रहनुमा आका अमीर आलीजहाँ के क़दमों में शिकायत पेश करने की गुस्ताख़ी की है।
इसलिए हमारे अमीर आलीजान ने बहुत मेहरबानी करके इस फ़ैसले का ऐलान किया है कि यूसुफ लुहार को दो सौ कोड़े लगाए जाएँ। साथ ही लुहार टोले पर फिर से सिपाही रखने और खिलाने-पिलाने की जिम्मेदारी डालने की मेहरबानी करते हैं और हुक्म देते हैं कि वहाँ बीस सिपाही और भेज दिए जाएँ।’
दरबारी चापलूसों का गीत एकदम शुरू हो गया। अमीर की तारीफें गाई जाने लगीं।
सिपाहियों ने यूसुफ लुहार को पकड़ लिया और जल्लादों के पास ले गए। यूसुफ लुहार पेट के बल चटाई पर लेट गया। हवा में कोड़ा लहराया और नीचे गिरा । लुहार की पीठ ख़ून से रंग गई।
जल्लाद बेरहमी से उसे पीटते रहे। उसने लेटते ही अपने दाँत ज़मीन में गड़ा दिए थे ताकि मुँह से चीख़ न निकलने पाए।
‘नहीं, लुहार इस सज़ा को आसानी से नहीं भूलेगा।’ मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, ‘अमीर की मेहरबानियों को मरते दम तक याद रखेगा, रंगसाज़ भाई, बात का इंतज़ार कर रहे हो? जाओ, अब तुम्हारी बारी है। ‘
रंगरेज़ ने एक बार थूका और बिना पीछे देखे भीड़ चीरकर निकल गया।
बख्तियार ने दूसरे मामले भी निबटाए लेकिन अमीर के ख़ज़ाने को भरना नहीं भूला। उसने कई गुनहगारों को उनके पास भेजा। उनमें दस साल का एक बच्चा भी था, जिसने अमीर के महल के सामने की ज़मीन बगावत के इरादे से गीली की थी। उसे भी सज़ा मिली। इसे देखकर मुल्ला नसरुद्दीन का दिल गुस्से से भर उठा।
वह ज़ोर से बोला, ‘वाकई यह लड़का बहुत बड़ा अपराधी है। ऐसे दुश्मनों से अपने तख़्त की रक्षा करने में अमीर की दूरंदेशी की जितनी तारीफ़ की जाए, कम है। इसे तो सूली पर चढ़ा देना चाहिए था। यह लड़का सिर्फ चार साल का था, लेकिन उम्र तो बहाना नहीं है। हमारे बुखारा में दुश्मनों ने कितने घोंसले बना लिए हैं, यह देखकर ही मेरा दिल उदास हो जाता है। फिर भी हमें यकीन है कि अमीर के सिपाहियों और जल्लादों की मदद से सारी बुराइयाँ जल्दी ही दूर हो जाएँगी और उनकी जगह अच्छाइयाँ ले लेंगी। ‘
अचानक नसरुद्दीन ने देखा कि भीड़ छँट गई है। कुछ लोग जल्दी से खिसक गए थे, कुछ भाग रहे थे।
सहसा उसने सूदखोर को आते देखा। उसके पीछे सिपाहियों से घिरा मिट्टी से सना लबादा पहने सफ़ेद दाढ़ीवाला एक दुबला-पतला बूढ़ा आ रहा था। उसके साथ बुर्का ओढ़े एक औरत थी। नसरुद्दीन की अनुभवी आँखें उसकी चाल देखकर ही भाँप गई। वह जवान लड़की थी।
अपनी एक आँख से लोगों को ताकते हुए सूदखोर बोला, ‘जाकिर, जूरा, सईद और सादिक कहाँ हैं? अभी तो वे यहीं थे। उनके क़र्ज़ चुकाने का वक्त आ रहा है। भागकर छिपना बेकार है । ‘
कूबड़ के बोझ से लँगड़ाता हुआ वह आगे बढ़ा।
लोग आपस में बातें करने लगे, ‘यह बूढ़ा कुबड़ा कुम्हार और उसकी बेटी को अमीर के सामने खींच लाया है। ‘
‘बेचारे कुम्हार को उसने एक दिन की भी मोहलत नहीं दी । ‘
‘खुदा इसे गारत करे। मुझे भी एक पखवाड़े बाद क़र्ज़ चुकाना है।’
‘मुझे तो एक हफ्ते बाद ही चुकाना है । ‘
‘देखा, जब यह आता है तो लोग कैसे भागकर छिप जाते हैं। जैसे यह हैजा या कोढ़ लेकर आ रहा हो। ‘
‘सूदखोर तो कोढ़ी से भी गया – बीता है। ‘
मुल्ला नसरुद्दीन का मन दुख से भर उठा। उसने अपनी कसम दोहराई, ‘मैं इसे उसी तालाब में डुबोकर दम लूँगा । ‘
अर्सला बेग ने सूदखोर को उसकी बारी से पहले ही आ जाने दिया। उसके पीछे कुम्हार और उसकी बेटी भी आ गई। वे घुटनों के बल गिर पड़े और कालीन को चूमने लगे।
वज़ीरे-आजम ने बड़ी खुशमिजाजी से कहा, ‘ऐ अक्लमंद जाफ़र, अस्लाम वालेकुम कहो किस काम से आए हो?’
जाफ़र ने अमीर को संबोधित करते हुए कहना शुरू किया, ‘शहंशाहे-आजम, मेरे आका, मैं आपसे इन्साफ़ माँगने आया हूँ। यह नयाज कुम्हार है। इसने मुझसे सौ तंके उधर लिए थे। उस पर तीन सौ तके सूद हो गया है। आज सवेरे क़र्ज़ चुकाना था, लेकिन कुम्हार ने अभी तक कुछ नहीं दिया। ऐ दुनिया के सूरज, ऐ दानिशमंद अमीर, मुझे इन्साफ़ चाहिए । ‘
अमीर ने एक बार सिर हिलाया और खर्राटे भरने लगे। मुहर्रिर ने सूदखोर की शिकायत खाते में लिख ली।
वज़ीर ने कुम्हार की ओर मुड़कर कहा, ‘वज़ीरे-आजम को जवाब दो, तुम यह क़र्ज़ कबूल करते हो?’
कुम्हार ने दबी आवाज़ में कहा, ‘मुझे इनकार नहीं है। लेकिन मैं एक महीने की मोहलत चाहता हूँ। अपने अमीर से रहम की भीख माँगता हूँ। ‘
बख़्तियार बोला, ‘मालिक, मुझे फ़ैसला सुनाने की इजाजत दें। वह फ़ैसला जो मैंने आपके चेहरे पर पढ़ा है। कानून के मुताबिक जो कर्ज़दार वक्त पर कर्ज़ नहीं चुकाता वह अपने ख़ानदान समेत क़र्ज़ देनेवाले का गुलाम हो जाता है। और तब तक गुलाम रहता है, जब तक गुलाम रहने के समय तक का कर्ज़ सूद चुका नहीं देता । ‘
कुम्हार का सिर नीचे झुक गया और वह काँपने लगा। भीड़ में खड़े अनेक लोगों ने गहरी साँसें भरीं और उन्हें छिपाने के लिए अपने मुँह मोड़ लिए। कुम्हार की लड़की के कंधे काँपने लगे थे। वह बुरके के अंदर सिसकियाँ भरने लगी थी ।
‘ग़रीबों को सतानेवाले इस बेरहम की डूबकर ही मौत होगी । ‘
बख्तियार ने ऊँची आवाज़ में कहा, ‘लेकिन हमारे मालिक की दरियादिली और रहमदिली की कोई हद नहीं है।’
बूढ़े कुम्हार का चेहरा उम्मीद से चमक उठा।
हालांकि क़र्ज़ अभी अदा होना है लेकिन नयाज कुम्हार को मोहलत दी जाती है, एक घंटे की मोहलत । अगर इस एक घंटे के अंदर-अंदर सूद के साथ क़र्ज़ न चुकाया गया और इस तरह इस्लामी कानून की तौहीन की गई तो कानूनी कार्रवाई की जाएगी। कुम्हार जा सकता है। अमीर की रहमत उस पर बनी रहे । ‘
बख़्तियार के चुप होते ही तख्त के पीछे खड़े चापलूस मक्खियों की तरह भनभनाने लगे।
इस बार चापलूसों ने इतनी बढ़ा-चढ़ाकर और इतने ज़ोर से अमीर की तारीफ़ की कि अमीर की नींद उचट गई। उन्होंने नाराज़ होकर मुँह बंद करने को कहा। वे चुप हो गए।
अचानक कान के पर्दे फाड़ने वाली रैंकने की आवाज़ ने सन्नाटा भंग कर दिया।
यह गधा नसरुद्दीन का ही था। या तो वह एक ही जगह खड़े-खड़े थक गया था या उसे लंबे कानों वाला अपना कोई भाई बंद दिखाई दे गया था, जिसका वह स्वागत कर रहा था।
दुम उठाकर, थूथुनी आगे को बढ़ाकर अपने पीले दाँत दिखाते हुए वह बहुत ज़ोर से रैंका। अमीर ने अपने कान बंद कर लिए। सिपाही भीड़ पर टूट पड़े।
तब तक नसरुद्दीन दूर निकल चुका था। अपने अड़ियल गधे को घसीटते हुए वह ज़ोर-ज़ोर से उसे बुरा-भला कहता जा रहा था, ‘अबे गधे, लानत है तुझ पर। तू किस बात पर इतना खुश हुआ। क्या तू शोर मचाये बिना अमीर की दरियादिली और मेहरबानियों की तारीफ़ नहीं कर सकता था? शायद शोर करके तू दरबार का ख़ास चापलूस बनने की उम्मीद कर रहा था । ‘
भीड़ ठहाके मारकर हँसने लगी। भीड़ के कारण सिपाही नसरुद्दीन तक नहीं पहुँच पाए। वरना वे उसे पकड़कर कोड़े लगाते और गुस्ताख़ी के जुर्म में गधे को जब्त कर लेते।
