Mulla Nasruddin ki kahaniya: अमीर की अदालत अभी तक जारी थी। जल्लाद कई बार बदले जा चुके थे। बेंत खाने वालों की संख्या बढ़ती चली जा रही थी ।
दो आदमी सूली पर लटक रहे थे। तीसरे का सिर धड़ से अलग हो चुका
से तर हो चुकी थी। लेकिन कराहने और चीखने की आवाज़ें नींद में भरे अमीर के कानों तक नहीं पहुँच रही थीं, क्योंकि दरबारी चापलूस उसके कानों पर कसीदों की बौछार कर रहे थे। इस कोशिश में उनके गले पड़ गए थे। तारीफ़ करते समय वज़ीरे-आजम अन्य वज़ीरों और अर्सला बेग को शामिल करना नहीं भूलते थे । यहाँ तक कि चँवर ढुलाने वाले और हुक्के वाले को भी शामिल कर लेते थे। उनका ख़याल था कि हर एक को खुश करने की कोशिश करनी चाहिए । कुछ की इसलिए कि वे फ़ायदेमंद साबित हों और कुछ की इसलिए कि वे ख़तरनाक साबित न हों।
अर्सला बेग ने दूर से आती हुई आवाज़ों को बड़ी बेचैनी से सुना और अपने दो अनुभवी जासूसों को बुलाकर कहा, ‘पता लगाकर आओ कि लोग इतने ज़ोर से क्यों बोल रहे हैं?’
दोनों जासूस, फ़क़ीर ओर दरवेश के वेश में चल दिए ।
लेकिन इससे पहले कि वे लौटते सूदखोर जाफ़र दौड़ता हुआ वहाँ पहुँच गया। वह पीला पड़ रहा था। उसके पैर लड़खड़ा रहे थे और बार-बार उसके लबादे में उलझ जाते थे।
अर्सला बेग ने व्यग्रता से पूछा, ‘क्या हुआ जाफ़र साहब?”
काँपते होंठों से जाफ़र चिल्लाया, ‘मुसीबत, अर्सला बेग साहब, मुसीबत। हम पर बड़ी भारी मुसीबत आ पड़ी है। मुल्ला नसरुद्दीन हमारे ही शहर में मौजूद है। मैंने उसे अभी-अभी देखा है। उससे बातें भी की हैं। ‘
अर्सला बेग की आँखें बाहर निकल आईं। वह टकटकी बाँधे उसे देखता रह गया । तख़्त की सीढ़ियाँ उसके बोझ से दबने लगीं। वह दौड़कर नींद में बेसुध पड़े अपने मालिक के पास पहुँचा और उसके कान पर झुक गया।
अमीर चौंककर सीधा बैठ गया। जैसे किसी ने काँटा चुभा दिया हो। वह चिल्लाया, ‘तू झूठ बोलता है।’ क्रोध और भय से उसका चेहरा बदसूरत दिखाई देने लगा। यह सच नहीं है। कुछ ही दिन पहले बगदाद के ख़लीफ़ा ने मुझे लिखा था कि उन्होंने उसका सिर कटवा दिया है। तुर्की के सुलतान ने लिखा था कि उन्होंने उसे सूली पर लटकवा दिया है। ईरान के शाह ने खुद अपने हाथ से मुझे लिखा था कि उसे उन्होंने फाँसी दे दी है। खीवा के खान ने पिछले बरस आम ऐलान किया था कि उन्होंने उसकी खाल खिंचवा ली है। यह मुल्ला नसरुद्दीन ! उस पर लानत बरसे, चार – चार शाहों के हाथों से बचकर कैसे निकल सकता है?”
वज़ीर और दरबारी मुल्ला नसरुद्दीन का नाम सुनते ही पीले पड़ गए। चँवर दुलाने वाले के हाथ से चँवर गिर गया। हुक्के वाले के गले में धुआँ फँस गया और वह ज़ोर-ज़ोर से खाँसने लगा। चापलूसों की जुबानें तालू से चिपक गईं।
अर्सला बेग ने दोहराया, ‘वह यहीं है।’
‘तू झूठ बोलता है,’ अमीर चिल्लाया । और फिर शाही हाथ ने उसके गाल पर ज़ोर से तमाचा जड़ दिया, ‘तू झूठा है। अगर वह वाकई यहाँ है तो वह बुखारा में कैसे घुस आया? तेरें और पहरेदारों के रहने से क्या फायदा? कल रात बाज़ार में जो कुछ हुआ, उसी की शरारत थी? उसने रियाया को हमारे खिलाफ भड़काने की कोशिश की लेकिन तूने कुछ नहीं सुना ?’
अमीर ने फिर अर्सला बेग को पीटा। वह झुका और जैसे ही अमीर का हाथ नीचे गिरा, उसे चूमकर बोला, ‘मालिक, वह यहीं है, बुखारा में ही। क्या आप सुन नहीं रहे?”
इस पर होने वाला शोर भूचाल की तरह फैलने लगा। जो लोग अदालत में खड़े थे, वे भी जोश में आ गए। पहले धीमी-धीमी भनभनाहट हुई और फिर साफ़-साफ़ आवाज़ सुनाई देने लगी। आवाज़ कुछ देर में ही ऊँची और बुलंद होने लगी। अमीर का अपना सिंहासन और तख़्त हिलता हुआ महसूस होने लगा। तभी भीड़ में से एक नाम उठा और एक सिरे से दूसरे सिर तक गुँजता चला गया – मुल्ला नसरुद्दीन।’
इस नाम से अदालत गूँज उठी।
पहरेदार मशालें लिए तोपों की ओर भाग छूटे। अमीर का दिल घबरा उठा। वह चिल्लाए, ‘इजलास ख़त्म करो। चलो सब महल को । ‘
और अपनी खिलअत का दामन समेटते हुए वह महल की ओर भाग छूटा। उसके पीछे नौकर-चाकर गिरते-पड़ते भागने लगे। वज़ीर – सिपाही, मीरासी और अन्य लोग जान बचाकर एक-दूसरे को धक्का देते भागने लगे। उनके जूते वहीं छूट गए । सिर्फ़ हाथी अपनी पुरानी शान-शौकत से वापस लौट सके। अमीर के जुलूस का हिस्सा होते हुए भी उन्हें रियाया से डरने की कोई ज़रूरत नहीं थी।
महल के पीतल जड़े फाटक अमीर और उनके दरबार के भीतर पहुँचते ही खड़खड़ाहट के साथ बंद हो गए।
इस बीच बाज़ार खचाखच भर चुका था और वहाँ मुल्ला नसरुद्दीन का नाम रह-रहकर गूँजने लगता था ।
