Mulla Nasruddin ki kahaniya: जब अमीर को तसल्ली हो गई और विश्वास हो गया कि बाज़ार की लड़ाई ठंडी पड़ गई है तो उन्होंने दरबारे आम में जाकर मुसाहिबों से मिलने का निश्चय कर लिया। वह अपने चेहरे पर ऐसा भाव लाने की कोशिश कर रहे थे, जिससे इत्मीनान के साथ चिंता भी प्रकट हो और जिससे दरबारियों के मन में यह बात न आ सके कि शाही दिल भयभीत हो सकता है।
जैसे ही अमीर दरबारे आम में पहुँचे दरबारी ख़ामोश हो गए। उन्हें डर था कि उनकी आँखों या चेहरों से प्रकट न हो जाए कि वे अमीर की वास्तविक भावनाओं से परिचित हैं।
अमीर ख़ामोश थे। दरबारी ख़ामोश थे। फिर इस ख़ामोशी को तोड़ते हुए अमीर ने कहा, ‘तुम लोगों को हमसे क्या कहना है? तुम्हारी क्या सलाह है ?’
किसी ने उत्तर नहीं दिया। सिर तक नहीं उठाया। अचानक बिजली की तरह कौंधती ऐंठन ने अमीर के चेहरे को बिगाड़ दिया। इस समय न जाने कितने सिर जल्लाद के काठ पर रखे होते, चापलूसी करने वाली कितनी जुबानें कटकर हमेशा के लिए ख़ामोश हो चुकी होती । झूठी और पूरी न होने वाली उम्मीदों, हवसों और कोशिशों, धोखे देकर कमाई गई दौलतों की याद दिलानेवाली जुबानें, सफ़ेद पड़े होठों से दाँत की पीड़ा से बाहर निकल आई होतीं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कंधे पर सिर बने रहे। चापलूसी करनेवाली जुबानें सही सलामत रहीं, क्योंकि उसी समय महल के दरबान ने अंदर सूचना दी, ‘आलमपनाह की उम्र लंबी हो, एक अजनबी महल के फाटक पर आया हुआ है। अपने आपको बगदाद का आलिम मौलाना हुसैन बताता है। कहता है, उसे बहुत ज़रूरी काम है और जहाँपनाह की रोशन नज़र के सामने उसे फौरन पेश किया जाए। ‘
अमीर व्यग्रता से चिल्ला उठे, ‘मौलाना हुसैन ? उन्हें आने दो। उन्हें यहाँ ले
आलिम आए नहीं बल्कि दौड़ते हुए घुस गए। अपने धूलभरे जूते भीं उतारने भूल गए। तख़्त के सामने पहुँचकर
उन्होंने झुककर कोर्निश
की-
‘इस दुनिया के चाँद – सूरज, दुनिया भर में मशहूर, दुनिया के जमाल और जलाल, यह गुलाम आपके लिए दुआ करता है।
मैं कई दिन और रात लगातार चलकर अमीर को एक ख़ौफ़नाक ख़तरे से आगाह करने के लिए भागता चला आ रहा हूँ। अमीर मुझे बताएँ कि आज वह किसी औरत से तो नहीं मिले? मेरे आका, इस नाचीज़ गुलाम को जवाब देने की मेहरबानी करें ! ‘
अमीर उठकर खड़े हो गए। उनका चेहरा पीला पड़ रहा था। एक लंबी साँस उनके होठों से निकल गई। हुसैन ज़ोर से बोले, ‘अल्लाह की शान, अल्लाह ने समझदारी और संजीदगी के सितारे को डूबने से बचा लिया। अमीरे-आज़म को मालूम हो कि कल रात सितारों और सैयारों (उपग्रहों) का ऐसा जमाव था, जो उनके लिए नुक्सानदेह साबित होता । और मैं नाचीज़ गुलाम, जो अमीर के क़दमों की खाक ‘चूमने के भी काबिल नहीं हूँ, सितारों और सैयारों का हिसाब लगाता हूँ और जानता हूँ कि जब तक सितारे नेक घरों में न पहुँच जाए, अमीर को किसी औरत से नहीं मिलना चाहिए। वरना उनकी बर्बादी यक़ीनी है। अल्लाह का शुक्र है कि मैं वक्त पर उन्हें आगाह कर सका।
‘मैं वक्त पर आ पहुँचा। उम्र भर मुझे इस बात का फ़न रहेगा कि मैंने अमीर को आज के दिन औरत को छूने से रोक दिया और सारी दुनिया को गम के समंदर में डूबने से बचा लिया ।’ मौलाना हुसैन इस खुशी और जोश के साथ बोल रहे थे कि अमीर को उनका विश्वास करना पड़ा।
जब मुझ हकीर और नाचीज़ को इस दुनिया के परवरदिगार का पैगाम मिला कि मैं बुखारा जाऊँ और अमीर की खिदमत में हाज़िर होकर उन्हें आगाह करूँ तो मुझे लगा कि मैं खुशी के समंदर में गोते खा रहा हूँ। कहना बेकार है कि मैं पाक परवरदिगार के इस हुक्म को पूरा करने के लिए फौरन बगदाद से चल पड़ा।
लेकिन चलने से पहले मैंने कई दिन अमीर का जायचा (जन्मपत्री) तैयार करने में ख़र्च किए। इस तरह मैंने उन सितारों और सैयारों की चाल मालूम करके अमीर की खिदमत करनी शुरू कर दी। कल इस आसमान की तरफ़ देखा तो पता चला सितारे और सैयारे अमीर के लिए ख़तरा पैदा करनेवाले घर में हैं। सितारा अश्शुला (वृश्चिक), जिसकी निशानी डंक है, के मुक़ाबिले सितारा अलकल्व जो दिल को ज़ाहिर करता है, ख़तरे में है। फिर मैंने तीन सितारे अलगफ़, जो औरत की नकाब की निशानी हैं, दो सितारे अल-इकलील, जो नाग की निशानी है और दो सितारे अल-शरतान भी देखे, जो सींग की अलामत हैं।
यह सब मैंने मंगल के दिन देखा, जो मिरिख सितारे (मंगल) का दिन है। और यह दिन जुमेरात (बृहस्पतिवार) के ख़िलाफ़ लोगों व अजीम शख़्सियतों की मौत का है और अमीरों के लिए बहुत ही बदशगुनी का है। इन सबको और देखकर मैं नाचीज़ नजूमी समझ गया कि ताज पहनने वाले को मौत के डंक का ख़तरा है, अगर वह किसी औरत के नक़ाब को छूता है। इसीलिए मैं ताज पहननेवाले को आगाह करने के लिए जल्दी-जल्दी भागा चला आया। मैं दिन और रात लगातार चला। दो ऊँट मार डाले और फिर पैदल ही बुखारा शरीफ़ पहुँचा ।’
अमीर पर इस बात का गहरा प्रभाव पड़ा। बोले, ‘अल्ला हो अकबर, क्या यह मुमकिन है कि माबदौलत पर इतना बड़ा ख़तरा आया हुआ है? मौलाना हुसैन, तुम्हें ठीक-ठीक मालूम है कि तुम गलती नहीं कर रहे हो?’
‘ग़लती? और मैं?’ मौलाना हुसैन ने ज़ोर से कहा, ‘अमीर को मालूम हो कि बगदाद से बुखारा तक कोई भी ऐसा आदमी नहीं है, जो सितारों के अंदाज़ को समझने, इलाज करने या इल्म में मेरी बराबरी कर सके। मैं गलती कर ही नहीं सकता। मेरे आका, आप अपने आलिमों से पूछ लें कि मैंने आपके जायचे (जन्मपत्री) के सितारों को सही बताया है या नहीं। और उनकी कैफियत (विवरण) ठीक बयान की है या नहीं। ‘
अमीर के इशारे पर टेढ़ी गर्दनवाला आलिम आगे बढ़ा। उसने कहा, ‘इल्म में लासानी मौलाना हुसैन ने सितारों के सही नाम बताए। इसलिए उनके इल्म पर शक नहीं किया जा सकता।’ लेकिन टेढ़ी गर्दन वाला ऐसी आवाज़ में बोल रहा था, जिससे नसरुद्दीन को जलन और बुरी नीयत की झलक दिखाई दी। ‘अकलमंदी में अव्वल मौलाना हुसैन ने अमीर आज़म को चाँद की सोलहवीं मंज़िल के बारे में और उन राशियों के बारे में क्यों नहीं बताया, जिनमें यह मंज़िल मिल जाती है। क्योंकि इन कैफ़ियतों (हालतों) के बिना यह कहना बेबुनियाद होगा कि मिरिख (मंगल) का दिन अजीम शख़्सियतों की मौत का दिन है, जिसमें ताजदार बादशाह भी शामिल हैं। सैयारे मिरिख (मंगलग्रह) की मंज़िल एक वर्ग (राशि) में है, गति दूसरे में है। ठहरता तीसरे में है और उठता चौथे में है। इस हिसाब से सैयारे मिरिब के एक नहीं चार अंदाज़ हैं लेकिन दानिशमंद हजरत मौलाना हुसैन ने एक ही बताया है । ‘
काइयाँपन से मुस्कुराते हुए आलिम ख़ामोश हो गया। दरबारियों ने इत्मीनान और खुशी के साथ आपस में कानाफूसी शुरू कर दी। वह समझ रहे थे कि नया आलिम परेशानी में पड़ गया है। अपने रुतबे और आमदनी का ध्यान रखते हुए हर बाहरी आदमी को वह बाहर ही रखने की कोशिश करते थे। हर नए आने वाले को वे अचानक प्रतिद्वंद्वी समझते थे।
लेकिन नसरुद्दीन जब भी किसी काम को हाथ में लेता था, उसे अधूरा नहीं छोड़ता था। अब तक उसने अमीर के आलिमों और दरबारियों की विद्वत्ता की गहराई भाँप ली थी। बिना किसी परेशानी और झिझक के कहने लगा, ‘मेरे दानिशमंद होशियार साथी इल्म के किसी दूसरे विभाग में भले ही मुझसे ज़्यादा जान लें लेकिन जहाँ तक सितारों का ताल्लुक है उनके लफ्जों से ज़ाहिर है कि सबसे बड़े आलिम इब्ने बज्जा की तालीम के बारे में कुछ भी नहीं जानते। कर्क राशि में है, ठहराव तुला राशि और अरूज (उदय) मकर राशि में है। लेकिन हर हाल में वह मंगल ही है। उसकी नज़र टेढ़ी होना ताजदारों के लिए घातक है। ‘
यह उत्तर देते समय नसरुद्दीन को अनपढ़ होने के आरोप की बिल्कुल आशंका नहीं थी, क्योंकि वह जानता था कि ऐसी बहसों में विजय उसी की होती है, जो सबसे ज़्यादा बातूनी हो; और इसमें बहुत ही कम लोग उसका मुकाबिला कर सकते थे।
वह आलिम की आपत्ति के इंतज़ार में इस तैयारी से खड़ा था कि उसे . उचित उत्तर दे। लेकिन आलिम ने चुनौती स्वीकार नहीं की और चुपचाप खड़ा रहा। उसकी हिम्मत नहीं थी कि वह बहस कर पाता, क्योंकि वह अपनी योग्यता से भली-भाँति परिचित था। नए आलिम को उसकी नीचा दिखाने की कोशिश का उल्टा असर हुआ। दरबारी उस पर क्रुद्ध हो उठे।
अपनी निगाह से उसने उन्हें समझा दिया कि इस तरह खुलेआम बहस करने में प्रतिद्वंद्वी ख़तरनाक साबित हो सकता है।
मुल्ला नसरुद्दीन की नज़र से ये इशारे भी नहीं बच सके। उसने मन-ही- मन कहा, ‘ज़रा ठहरो, अभी बताता हूँ।’
अंत में अमीर बोले, ‘तुमने अगर सभी सितारों का सही नाम और अंदाज़ बताया है मौलाना हुसैन तब तुम्हारे मानी बिल्कुल ठीक हैं लेकिन हमारी समझ में यह बात नहीं आती कि सितारे अशतरान (मेष) कहाँ से आ गया, जिसकी निशानी सींग है। वाकई मौलाना हुसैन, तुम सही वक्त पर आ गए। क्योंकि आज सुबह ही एक जवान लड़की हमारे हरम में लाई गई है और हम तैयारी…।’
मुल्ला नसरुद्दीन ने भयभीत हाथ हिलाते हुए कहा, ‘ऐ अमीर, उसे अपने ख़यालों से निकाल दीजिए। उसके बारे में सोचिए भी मत । ‘
वह यह भूल गया कि अमीर से केवल अन्य पुरुष में ही बात की जा सकती है। वह जानता था कि इस तरह बोलना शिष्टाचार के विरुद्ध है लेकिन इसे अमीर के प्रति वफ़ादारी और उसकी ज़िंदगी को बचने की भावना समझा जाएगा। यह उनके विरुद्ध नहीं पड़ेगा बल्कि वह अमीर से अत्यंत निकट पहुँच जाएगा और अमीर की नज़रों में ऊँचा उठ जाएगा।
उसने चिल्ला-चिल्लाकर पूरे जोश के साथ अभी से उस लड़की को न छूने की प्रार्थना की और कहा, ‘मुझ हुसैन को आँसुओं की नदी न बहानी पड़े और मातमी काला लिबास न पहनना पड़े । ‘
अमीर पर इस बात का बहुत गहरा असर पड़ा। बोले, ‘घबराओ मत, परेशान मत हो। इत्मीनान रखो मौलाना हुसैन, हम रियाया के दुश्मन नहीं हैं, जो उसे और अफ़सोस में डालें। हम वायदा करते हैं कि अपनी बेशकीमती ज़िंदगी की हिफ़ाजत करेंगे और उस लड़की से नहीं मिलेंगे। हम हरम में तब तक नहीं जाएँगे जब तक सितारे मुबारक (शुभ) नहीं होते और यह तुम हमें ठीक वक्त पर बता देना। इधर आओ। ‘
यह कहकर उन्होंने हुक्का बरदार को इशारा किया। ज़ोर का एक कश लेकर सोने की मुँह नाल नए आलिम की ओर बढ़ गई। यही उसके लिए बहुत बड़ा सम्मान और कृपा की बात थी। नीची नज़र किए झुककर नए आलिम ने अमीर की इस कृपा को स्वीकार किया। इस विचार से उसके बदन में खुशी की लहर दौड़ गई कि दरबारी जलन से मरे जाते हैं।
अमीर ने कहा, ‘माबदौलत आलिम मौलाना हुसैन को अपनी सल्तनत का सदर-उल-उलेमा (आलिमों का सदर ) मुकर्रिर करने की मेहरबानी फर्माते हैं। उनकी दानाई और इल्म साथ ही माबदौलत के लिए वफ़ादारी औरों के लिए मिसाल है। ‘
दरबार के मुहर्रिर ने अपने कर्तव्य के अनुसार अमीर के हर काम और हर शब्द का प्रशंसा भरे शब्दों में विवरण लिखा ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए उनका बड़प्पन छिपा न रह जाए कि अमीर को इस बात की बहुत चिंता रहती थी ।
दरबारियों को संबोधित करते हुए अमीर ने कहा, ‘जहाँ तक तुम लोगों का ताल्लुक है माबदौलत अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करते हैं। क्योंकि नसरुद्दीन की पैदा की हुई तमाम परेशानियों के अलावा तुम्हारे आका पर मौत का साया मँडरा रहा था, लेकिन तुममें से किसी ने भी उसके ख़िलाफ़ उँगली नहीं उठाई। इन लोगों को देखो मौलाना हुसैन, बेवकूफ़ी से भरे इन नालायकों के चेहरे देखो, क्या ये बिल्कुल गधों-से नहीं मिलते? किसी भी बादशाह के इतने बेवकूफ़ और लापरवाह वज़ीर नहीं होंगे। ‘
नसरुद्दीन ने दरबारियों को इस तरह देखा जैसे पहले हमले का निशाना ले रहा हो। फिर बोला, ‘हुजूर, आप सच फरमा रहे हैं। इन लोगों के चेहरों पर दानिशमंदी की छाप मुझे दिखाई नहीं दे रही । ‘
अमीर ने अत्यधिक प्रसन्न होकर कहा, ‘बिल्कुल ठीक। सुन रहे हो बेवकूफ़ो। ‘
नसरुद्दीन ने कहा, ‘मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि इन लोगों के चेहरों पर नेकी और ईमानदारी की भी छाप नहीं है। ‘
पूरे यक़ीन से अमीर ने कहा, ‘ये लोग चोर हैं। सबके सब चोर हैं। रात दिन हमें लूटते रहते हैं। हमें महल की हर चीज़ की हिफाजत करने पर मजबूर होना पड़ता है। जब भी हम चीज़ों को गिनते हैं तो कोई-न-कोई चीज़ गायब मिलती है। आज सुबह ही हम अपना रूमाल बाग में भूल आए। आधे घंटे के बाद वह गायब ‘हो गया। इनमें से भला कौन चोर हो सकता है? तुम समझ रहे हो ना मौलाना हुसैन?”
जब अमीर बोल रहे थे, टेढ़ी गर्दन वाले आलिम ने बड़ी मक्कारी से आँखें नीची की थीं। किसी और समय यह मामूली सी हरकत शायद दिखाई न देती लेकिन इस समय नसरुद्दीन चौकन्ना था। वह फौरन समझ गया कि माजरा क्या है।
बड़े इत्मीनान से नसरुद्दीन उस आलिम के पास पहुँचा और उसके लबादे के अंदर हाथ डालकर बड़ी खूबसूरती से कढ़ा हुआ एक रूमाल निकाल लिया।
‘अमीरे – आज़म, इसी रूमाल के खोने पर अफ़सोस कर रहे हैं क्या?’
आश्चर्य और भय से सारे दरबारी सकते में रह गए। ये नया आलिम सचमुच ही ख़तरनाक प्रतिद्वंद्वी साबित हो रहा था, क्योंकि जिसने उसका विरोध किया था, उसी का भंडाफोड़ हो गया था। आलिमों, शायरों, वज़ीरों और अफ़सरों के दिल बैठने लगे।
अमीर ने चिल्लाकर कहा, ‘अल्लाह गवाह है। यही है हमारा रूमाल । वाकई मौलाना हुसैन तुम्हारी सूझबूझ बेजोड़ है।’ और फिर वह सफलता तथा संतुष्टि के साथ दरबारियों की ओर मुड़कर बोले, ‘आखिरकार रंगे हाथों पकड़े ही गए। अब तुम हमारा एक धागा भी चुराने की कोशिश नहीं कर सकते। तुम्हारी लूट हम काफ़ी भुगत चुके हैं। और जहाँ तक इस गए बीते चोर का ताल्लुक है, जिसने इतनी गुस्ताख़ी से हमारा रूमाल चुराया था इसके सिर, बदन और मुँह के सारे बाल नोच लिए जाएँ, इसके तलवों में सौ कोड़े लगाएँ जाएँ। इसे नंगा करके गधे पर उल्टा बैठाकर चोर बताते हुए सरे आम शहर में घुमाया जाए।’
अर्सला बेग के इशारा करते ही जल्लादों ने आलिम को पकड़ लिया और उसे धकेलते हुए बाहर ले गए और फिर उस पर टूट पड़े। कुछ देर बाद उसे फिर दरबार में धकेल दिया गया। वह नंगा था। उसके बाल गायब थे। बहुत ही गंदा और बदनुमा लग रहा था। उसकी दाढ़ी और बेडोल साफ़ा अब तक उसकी बदकारी और बेवकूफ़ी को छिपाए हुए थे। ऐसी शक्ल वाला आदमी नंबरी चोर और बदमाश ही हो सकता था।
घृणा से मुँह बिगाड़कर अमीर ने हुक्म दिया, ‘ले जाओ इसे ।’ जल्लाद उसे खींचकर ले गए। एक पल बाद ही खिड़की के बाहर से चीखों और डंडों की फटाफट सुनाई देने लगी । फिर उसे गधे पर दुम की ओर मुँह करके बैठा दिया गया। और तुरही तथा ढोल की आवाज़ों के साथ सिपाही उसे लेकर बाज़ार की ओर चल दिए ।
अमीर देर तक नए आलिम से बातें करते रहे। दरबारी बिना हिले-डुले ख़ामोश खड़े रहे। गर्मी बढ़ रही थी । लबादों के नीचे उनके बदन खुजला रहे थे।
इस समय वज़ीरे-आज़म बख्तियार नए आलिम से सबसे ज़्यादा डरा हुआ था। दरबारियों से मशवरा करके इस नए प्रतिद्वंद्वी को बर्बाद करने का उपाय खोजने की कोशिश में था और दरबारी सोच रहे थे कि इस मोर्चे पर किसकी जीत होगी। वे आसार देखकर ऐन मौके पर अपने लाभ के लिए बख्तियार को दगा देने की तैयारी कर रहे थे ताकि वे आलिम की मित्रता प्राप्त कर सकें।
अमीर नसरुद्दीन से ख़लीफ़ा की कुशलता बगदाद के समाचारों, यात्रा में हुई घटनाओं आदि के बारे में पूछ रहे थे और वह जितने अच्छे सही उत्तर बन पड़ रहे थे, दे रहा था।
थकान महसूस करके अमीर ने आराम करने के लिए अपना बिस्तर तैयार करने का हुक्म दिया ही था कि बाहर से चीख-पुकार और शोरगुल सुनाई दिया। महल का दरबान दौड़कर आया । उसका चेहरा खुशी से दमक रहा था। उसने ऊँची आवाज़ में ऐलान किया, ‘अमीरे-आजम को मालूम हो कि अमन में खलल डालने वाला काफ़िर नसरुद्दीन गिरफ्तार कर लिया गया है और महल में ले आया गया है।’
उसके ऐसा कहते ही अखरोट की लकड़ी का नक्काशीदार दरवाज़ा खुला और हथियारों की खड़खड़ाहट के बीच पहरेदार लंबी- झुकी नाक और सफ़ेद दाढ़ी वाले एक बूढ़े को अंदर ले आए और उसे तख़्त के सामने कालीन पर पटक दिया।
वह औरतों के लिबास में था।
उसे देखते ही नसरुद्दीन जैसे जाग गया। उसे लगा जैसे दरबार की दीवारें गिर रही हैं। दरबारियों के चेहरे हरी धुंध में तैर रहे हैं।
