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Jungle Story: बरसात का जंगल-21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां गुजरात
Barsaat ka Jungle

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Jungle Story: बरसों पहले एक बहुत बड़ा जंगल था। उसका नाम था ‘बरसात का जंगल।’ इस जंगल में हर साल बहुत ही बरसात होती थी इसलिए उसका नाम ‘बरसात का जंगल’ रखा गया था। जंगल में नीम के, बबूल के, पीपल के पेड़ थे। वटवृक्ष, गुलमोहर, अमरूद, आम, चीकू, पलाश, सप्तपर्णी, बिल्वपत्र जैसे कई पेड़ थे। सूरज दादा यूं तो रोज सुबह धरती पर सोनेरी किरणों की चद्दर बिछा देते पर जंगल इतना घना था कि सुबह का उजाला जंगल में बहुत देर से आता और शाम के पांच बजे फिर से घना अंधेरा छा जाता था।

वैसे तो जंगल का राजा शेर माना जाता है। पर इस बरसात के जंगल में शेर भाई राजा होने के बावजूद किसी पर रोब नहीं जमाते थे। ‘बरसात के जंगल’ में सभी प्राणी ओर पंछी एक-दूसरे के साथ मिल-जुलकर रहते थे। इतना ही नहीं, हम सभी ‘बरसात के जंगल’ में भिन्न-भिन्न त्योहार भी मनाते थे। इसमें हर प्राणी एवं पंछी उत्साह से हिस्सा लेते थे। जब-जब होली-धूलेटी का त्योहार आता था, तब-तब सारे प्राणी-पंछी एक-दूसरे के साथ में मिल-जुलकर रंगों से खेलते थे। पूरा दिन धमाल-मस्ती करते और देर शाम को सभी प्राणी और पंछी शेर भाई की गुफा के पास में आए हुए एक बड़े तालाब के किनारे कतार में बैठ जाते- “हेय…हेय… मजा आ गया, मजा आ गया -ऐसा सब एक साथ बोलते।

वाह! वाह! ये कैसी होली?

चारों तरफ फैले हैं जंगल के जानवर

लिए हाथों में रंगो की थैली।

हाथों गुलाल लिए तेंदुए की गरदन पे शेरखान

चले रंग लगाने

आज तो बस जी भरके रंगो से खेलना है

कोई चाहे माने या ना माने।

जिराफ की गरदन तो है कितनी लंबी

पहुचेंगे वहाँ कहो कैसे?

लोमड़ी कहती है चलो हाथी की सूंड से

फव्वारें बार-बार फेंके

जिराफ को रंगो से नहलाने के लिए

आ पहुँची जंगल की होली।

इस तरह मिल-जुलकर रहते, गाते, नाचते-कूदते थे, इस ‘बरसात का जंगल’ के प्राणी और पंछी।

जब-जब बारिश होती थी, तब-तब बंदर भाई हूपा-हूप-हूपा-हूप करते, एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर और एक डार से दूसरी डार पर छलांग लगाकर बारिश का मजा लेते थे। तो जिराफ भाई लंबी गरदन से देख लेते थे कि सभी प्राणी और पंछी कैसे बारिश का मजा ले रहे हैं। खरगोश भाई की हाथी भाई के साथ पक्की दोस्ती थी इसलिए जब-जब बारिश होती थी तब-तब खरगोश भाई हाथी भाई की सूंड पर चढ़कर जंगल को देखने के लिए निकलते थे।

कोयल बहन मधुर स्वर से कुहू कुहू करके जंगल को सुरमय बना देती थी तो मोर-मोरनी अपनी टहुकार से बरसात का आनंद लेते थे। अपने कलाप से नाचते और सबको नचाते थे। भालू भाई छोटे पोखर को ढूंढ लेते थे। गाय और भैंस तालाब में नाहते थे। चिडिया बहन, तोता भाई, मैना बहन, काबर बाई सब अपने-अपने बच्चों को लेकर किसी पेड़ की ऊँची डार पर चढ़ जाते थे और कलरव करते थे। सारा जंगल मानो बरसातमय हो जाता था। इतनी सारी खुशियां देखकर शायद बादल भी इस ‘बरसात के जंगल’ पर कुछ ज्यादा बरस पड़ते थे। बरसात के रूक जाने पर सभी प्राणी-पंछी एक पहाड़ पर इकट्ठे होते थे और सात रंगों के इन्द्रधनुष का आनंद लेते थे। सूरज दादा अपने प्रकाश से आकाश में सात रंगों का एक चित्र बनाते हो, ऐसा लगता था। इस तरह रोज सुखमय दिन पसार होते थे।

ऐसे में एक दिन इतनी मूसलाधार बरसात हुई कि चौथे दिन सूरज दादा के दर्शन हुए। बरसात रूकने पर सब इन्द्रधनुष को देखने के लिए पहाड़ पर इकट्ठे होने का तय कर रहे थे। ऐसे में चिड़िया बहन, तोता भाई, कोयल और काबर तथा बहत सारे पंछियों का समह जंगल में उतर आए और सभी प्राणियों को कहा कि अभी ही हमें बादल मिले थे और वे सभी बादल बहुत दु:खी थे। शेर भाई ने आगे आकर चिड़िया बहन को पूछा कि, “बादल क्यों दु:खी थे? चलिए हम सब जाकर उनसे पूछते हैं। इसलिए सबने कहा, “हां, चलो बादल से पूछते हैं- इन्द्रधनुष गुम हो गया है, “चिड़िया बहन इतना ही बोली कि उसकी आँखों में से आंसू निकलने लगे। इस बात को सुनकर सब प्राणी और पंछी दुःखी हो गए और एक-दूसरे को देखने लगे और गुन-गुन करने लगे, “इन्द्रधनुष खो गया, इन्द्रधनुष खो गया! अब क्या होगा?”

शेर भाई आगे आए और कहा, “चलो हम साथ मिलकर इन्द्रधनुष को खोजने का प्रयास करते हैं। हम सब मिलकर इन्द्रधनुष को जरूर खोज लेंगे, ऐसा मुझे विश्वास है। “फिर तो चिड़िया बहन, तोता भाई, कोयल, कौआ, मैना, काबर बाई, चातक, उल्लू भाई जैसे सारे पंछी उड़ते-उड़ते देखते जाते थे कि कहीं इन्द्रधनुष दिखता है कि नहीं? दूसरी ओर शेर भाई, हाथी भाई, बाघ, तेंदुआ, जिराफ, खरगोश, हिरन जैसे प्राणी जंगल के अलग-अलग विस्तार में इन्द्रधनुष खोजने लगे। जो भी कोई मिलता उसे पूछते रहते कि, “क्या आपने इन्द्रधनुष देखा है?”

क्या तुमने कहीं इन्द्रधनुष देखा।

बादल सब टेन्सन में हैं इसी बात पर कि इन्द्रधनुष

आखिर कहाँ होगा?

ऊपर आकाश तले उड़ते सब पंछियों को बादल ने

रोका और पूछा

पंछियों ने कहा, जब हमने नहीं देखा तब बादल फिर

देर तलक रोया

इक पंछी बोला कि शायद कोई पर्वत के पीछे हो

छिपकर वो बैठा

फिर तो तुरंत लिए अपना ई-स्कूटर चले बादल जी

पर्वत से पूछने

पर्वत ने कहा कि वो आया है खेलने, मैं आऊँगा

जल्द ही छोड़ने

इसके तुरंत बाद पर्वत के पीछे से इन्द्रधनुष

निकला, मुस्काया

बादल फिर झूम उठे, नाच उठे, गा उठे वापिस जब

इन्द्रधनुष देखा।

सब बहुत ही खुश हुए। सब साथ मिलकर फिर से गीत गाने लगे, नाचने लगे। बादल भी फिर से आनंद में आ गए और फिर से ‘बरसात के जंगल’ पर बरसने लगे और सब बरसात का आनंद लेते हुए फिर से जंगल की ओर जाने लगे।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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