Bhagwan Vishnu Katha: धर्म ब्रह्माजी के मानस पुत्र हैं । उनकी उत्पत्ति ब्रह्माजी के हृदय से हुई । धर्म ने दक्ष प्रजापति की दस कन्याओं से विवाह किया । उन कन्याओं से धर्म को हरि, कृष्ण, नर और नारायण नाम के चार पुत्र प्राप्त हुए । बचपन से ही नर और नारायण तपस्वी स्वभाव के थे । वे दोनों हिमालय पर्वत पर गए और बदरिकाश्रम नामक पवित्र स्थान पर तपस्या करने लगे । शीघ्र ही उनकी गिनती श्रेष्ठ तपस्वियों में होने लगी । गंगा के विस्तृत तट पर रहकर ब्रह्म का चिंतन करना उनका स्वभाव बन गया था।
भगवान् श्रीहरि के अंशावतार नर-नारायण ने एक हजार वर्षों तक कठोर तप किया । उनकी तपस्या के तेज से सम्पूर्ण सृष्टि ज्योतिर्मय हो गई । उनका बढ़ता तेज देखकर देवराज इन्द्र के मन में भय उत्पन्न हो गया । वे चिंतित होकर विचार करने लगे – ‘नर-नारायण बड़े तपस्वी और धर्मपरायण हैं । उन्हें सिद्धि प्राप्त हो चुकी है । वे अवश्य ही अपने बल से मेरे इन्द्रासन को छीन लेंगे । अपना सिंहासन बचाने के लिए मुझे उनकी तपस्या खंडित करनी होगी ।’ यह विचार कर देवराज इन्द्र ऐरावत पर सवार होकर, हिमालय पर्वत पर जा पहुँचे । नर-नारायण जहाँ तपस्यारत थे, वह एक परम पवित्र स्थान था । तपस्या के तेज से नर-नारायण सूर्य के समान प्रकाशमान हो रहे थे । इन्द्र बार-बार उनसे अभीष्ट वरदान माँगने के लिए कहते रहे, किंतु उनका चित्त तपस्या में मग्न रहा । यह देखकर देवराज इन्द्र विचलित हो उठे और उन्होंने चारों ओर भय उत्पन्न करने वाली माया फैलाकर नर-नारायण को भयभीत करने की चेष्टा की । तत्पश्चात् भीषण आँधी, वर्षा और अग्नि का दृश्य उपस्थित कर दिया । इस प्रकार इन्द्र-माया की रचना करके नर-नारायण को भयभीत करने का प्रयास करते रहे, किंतु उन पर भय का जरा भी प्रभाव नहीं पड़ा । जब इन्द्र की माया नर-नारायण की तपस्या खंडित न कर सकी तो वे पराजित होकर अपने लोक लौट गए । इन्द्रलोक में आकर उन्होंने कामदेव को नर-नारायण का तप खंडित करने का आदेश दिया ।
देवेन्द्र का आदेश पाकर कामदेव वसंत, रति और सोलह हजार अप्सराओं के साथ हिमालय पर्वत पर पहुँच गया । वसन्त के वहाँ आते ही सभी वृक्षों पर भांति- भांति के पुष्प उत्पन्न हो गए । उन पर भौंरों की कतारें मँडराने लगीं । वृक्षों की टहनियों पर कोयलें मधुर स्वर में कलरव करने लगीं । प्राणियों में काम का संचार हो गया । वे परस्पर प्रेमासक्त हो गए । अप्सराएँ मधुर स्वर में गीत गाते हुए काम नृत्य करने लगीं । तत्पश्चात् रति सहित कामदेव ने अपने पाँचों काम-बाणों का प्रयोग किया ।
इससे नर-नारायण की समाधि टूट गई । उन्होंने सोचा – ‘शिशिर-ऋतु बड़ी शीघ्र समाप्त हो गई? काल की गति में नियम का उल्लंघन हो जाए, यह असम्भव कार्य आज कैसे सम्भव हो गया? असमय वसंत का आगमन कैसे हो गया? वन पुष्पों से सुशोभित कैसे हो गया?’
तब नारायण बोले – “नर! देखो पुष्पों से लदे ये वृक्ष कितनी शोभा पा रहे हैं । सर्वत्र कोयलों का मीठा स्वर सुनाई पड़ रहा है । हे मुने ! शिशिर ऋतु यहाँ भयंकर आतंक फैलाए थी । इतने में वसंत ऋतु अपने सौंदर्य के साथ यहाँ आ गई । मुझे घोर आश्चर्य है कि असमय ही इसका आगमन कैसे हुआ? हे देवर्षे ! यह निश्चय ही तप में विघ्न उपस्थित करने वाली माया जान पड़ती है । आप इस विषय में विचार कर लें । चारों ओर दिव्य अप्सराओं का स्वर सुनाई पड़ रहा है । यह देवराज इन्द्र का षड्यंत्र ज्ञात होता है ।”
नर-नारायण आश्चर्यचकित होकर इधर-उधर देख रहे थे, तभी उनकी दृष्टि कामदेव वसन्त रति और अप्सराओं पर पड़ी । उन्हें देखकर नारायण ने सोचा – ‘इन ने हमारी तपस्या में विघ्न डालने के लिए इन्हें यहाँ भेजा है । इन्हें अपने रूप पर बहुत अभिमान है । मैं अभी इनसे भी श्रेष्ठ अप्सराओं की रचना कर देता हूँ । इन्हें तपस्या का बल दिखाना अति आवश्यक है ।’ यह सोचकर उन्होंने अपनी जंघा से एक अति सुंदर नारी की उत्पत्ति की । वह नारी नारायण के उरु (जंघा) से उत्पन्न हुई थी, अतः उसका नाम ‘उर्वशी’ पड़ा । इसके अतिरिक्त उन्होंने सोलह हजार अन्य अप्सराओं की उत्पत्ति की । उन्हें देखकर इन्द्र की दरबारी अप्सराएँ आश्चर्यचकित हो गईं ।
अपने आश्चर्य पर नियंत्रण पाकर वे नर और नारायण से बोलीं – “भगवन् ! हम मूर्ख स्त्रियाँ आपके तप की महिमा और धीरता देखकर चकित हैं । हमें आपके वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो गया है । आप भगवान् विष्णु के अंशावतार हैं । हमारी भूल के लिए हमें क्षमा करें, मुनिश्रेष्ठ ।” अप्सराएँ नम्रतापूर्वक क्षमायाचना कर रही थीं । काम, क्रोध, लोभ और मोह पर विजय प्राप्त कर चुके नर-नारायण ने उन्हें क्षमा कर दिया । नारायण ने उर्वशी और अपने द्वारा उत्पन्न अन्य अप्सराओं को देवराज इन्द्र को भेंट कर दिया और स्वर्ग की अप्सराओं से बोले – “देवियो ! सत्य को स्वीकार करने वाला ही जगत् में श्रेष्ठ माना जाता है । तुमने भी अपना अपराध स्वीकार किया है । अतः मैं तुमसे अति प्रसन्न हूँ और तुम्हें अभिलषित वर प्रदान करना चाहता हूँ । तुम्हें जो भी इच्छा हो, नि:संकोच माँग लो ।”
अप्सराओं ने वरदान माँगते हुए कहा – “मुनिवर ! आप देवाधिदेव भगवान् श्रीनारायण हैं । अब हमने स्वयं को आपके चरणों में अर्पित कर दिया है । भगवन् ! यदि आप प्रसन्न होकर वर देना चाहते हैं तो हमें पत्नी के रूप में स्वीकार करने की कृपा करें, जिससे कि हम आपकी सेवा कर सकें ।”
अप्सराओं का यह प्रस्ताव सुनकर नारायण उन्हें आश्वासन देते हुए बोले – “देवियो ! इस जन्म में हमने ब्रह्मचर्य व्रत ले रखा है । इसलिए हम विवाह नहीं कर सकते । यह हमारी दृढ़ प्रतिज्ञा है । इसे भंग करना असम्भव है । तुम स्वर्ग लौट जाओ । धर्मज्ञ व्यक्ति किसी के नियमों को भंग नहीं करते, इसलिए हे देवियो ! तुम मेरे व्रत की परीक्षा मत लो । मैं दूसरे जन्म में तुम्हारा पति बनूँगा, इसमें संदेह नहीं है । हे सुन्दरियो ! देवताओं का कार्य सम्पन्न करने के लिए अट्ठाईसवें युग के द्वापर में मैं भूमण्डल पर प्रकट होऊँगा । उस समय तुम अलग-अलग राजाओं के घर जन्म लेकर मेरी पत्नी बनोगी ।” इस प्रकार आश्वासन पाकर सभी अप्सराएँ वापस स्वर्गलोक लौट गईं और इन्द्र को सारी बात बताई । अप्सराओं से नारायण के चमत्कार के विषय में सुनने और उर्वशी को देखने के बाद इन्द्र ने नारायण की बड़ी प्रशंसा की ।
तत्पश्चात् देवराज इन्द्र नर-नारायण के समक्ष प्रकट हुए और उनसे अपने अपराधों की क्षमा माँगी । नर-नारायण ने उन्हें क्षमा कर दिया । इस प्रकार इन्द्र प्रसन्न मन से वापस स्वर्ग लौट आए और धर्मात्मा नर-नारायण की तपस्या पुन: आरम्भ हो गई । अट्ठाईसवें युग के द्वापर में नर और नारायण ने पृथ्वी पर अर्जुन और श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिए । अप्सराओं ने राजकुमारियों के रूप में अलग-अलग स्थानों पर जन्म लिया और भगवान् श्रीकृष्ण की पत्नी बनने का सौभाग्य प्राप्त किया ।
ये कथा ‘पुराणों की कथाएं’ किताब से ली गई है, इसकी और कथाएं पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Purano Ki Kathayen(पुराणों की कथाएं)
