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अनमोल उपहार: Family Stories
Anmol Uphar

Family Stories: आज अखबार तानिया उठाकर अंदर लेकर गई। वह रसोई में अपनी मम्मी के पास जाकर सुर्खिया पढ़ने लगी। जहां उसकी मम्मी चाय बना रही थी। तानिया अखबार में सबसे पहले दिनांक, वार आदि का विवरण पढ़ती है। आज भी उसने यही किया। चंद मिनट पढ़कर उसने अखबार के बीचो-बीच ‘अभिव्यक्ति मैगजीन निकाली जो साप्ताहिक प्रकाशित होती है। उसने पहला पृष्ठ उड़ती नजरों से देखा। जैसे ही उसने दूसरा पृष्ठ पलटा तो वह खुशी से उछल पड़ी।
‘वॉव मम्मी आज फिर आपका नाम अखबार में आया है तनिया ने अपनी अंगुली रखकर मम्मी को उनका नाम दिखाते हुए कहा।
‘अच्छा चल अब कविता भी तो पढ़। उसकी मम्मी सुमन ने मस्ती भरे अंदाज में कहा जबकि वह जानती थी कि उसको कविता अच्छी नहीं लगती।
‘ओफ्फो! मम्मी आपको तो पता ही है न कि मुझे कविता अच्छी नहीं लगती, मुझे तो बस अपनी मम्मी के नाम से मतलब है। तनिया ने पन्ने पलटते हुए जवाब दिया।
‘चल अब जाकर पापा को जगा और तैयार हो, कल भी तू स्कूल देर से पहुंची थी।
‘जा रहा हूं मगर आज कुछ अच्छा रखना टिफिन में तानिया रसोई से बाहर जाते हुए बोली।
सात साल की हो गई थी तानिया मगर फिर भी लड़को जैसे बोलती थी।
सुमन ने तानिया को स्कूल भेजकर पतिदेव का टिफिन तैयार किया फिर उन्हें ऑफिस के लिए रवाना किया। घर के झाड़ू, पोंछा, बर्तन, साफ-सफाई और नहाने में ही आधा दिन चला गया। तानिया के आने का समय भी हो गया। स्कूल से उसे लाकर मां-बेटी ने साथ खाना खाया। फिर तानिया तो रोज की तरह सो गई। सुमन ने अखबार हाथ में लेते हुए अपनी कविता पढ़ी और पढ़ते-पढ़ते उसे वो दिन याद आने लगे। जब तानिया एक साल की भी नहीं थी। वो अपने मायके गर्मियों में आई हुई थी। छोटे भाई का जन्मदिन भी इन्हीं दिनों आता है। उसे आज भी याद है जब उसका पांचवी बोर्ड का रिजल्ट आया था उसी दिन पवन का जन्म हुआ था उसने अपनी मम्मी को बताया था कि पवन उसके लिए लकी है तब से वो पवन को अपने लिए लकी मानती थी।
जैसे ही वो घर पहुंची पवन ने दरवाजा खोला। ‘अरे दीदी आप उसे तो जैसे पंख लग गए हो वह घर में उड़ता हुआ सबको मेरे आने की खबर देने लगा। भाभी कीर्ति से मिली तो उसने गुस्सा करते हुए कहा ‘दीदी क्या आपको हमारी याद नहीं आती? पूरे एक साल बाद आई हैं आप, ‘अरे तो क्या करूं समय ही नहीं मिलता मैंने भी सरल सा जवाब देते हुए कहा। मम्मी-पापा कहीं गए हुए थे, घर आये तो दिनभर खूब बातें चली। नन्हीं तानिया को सब गोद में खिलाते रहे।
शाम को सब खाना खाने बैठे। कीर्ति ने मेरे पसंदीदा व्यंजन बनाए थे। हम चारो खाना खा रहे थे। कीर्ति हमको परोस रही थी। अगले दिन मैं और कीर्ति, पवन के जन्मदिन की योजना बनाने में लगी रही। इसी क्रम में हम दोनों उसका गिफ्ट लाने मार्केट निकल गए। कुछ घंटे तानिया अपनी नानी के पास रही। दूसरे दिन पवन को सुबह-सुबह ही सभी ने जन्मदिन की बधाई दी। उसके दोस्तों के भी फोन आने लगे। शाम को जन्मदिन की पार्टी चली। सभी ने खाना खाया।
खाना खाकर सभी अपने-अपने कमरे में पहुंच गए। छोटी तानिया तो सबसे पहले सो गई। मैं भी अपने कमरे में आ गई। तभी पवन और कीर्ति मेरे कमरे में आकर बैठ गए।
‘क्या हुआ, तुम दोनों यहां, क्या बात है? मैंने सवाल किया।
‘दीदी, मुझे आपको कुछ देना है पवन के हाथ में कुछ कागजात थे, उसने उनको मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा।
‘क्या है ये? मैंने आश्चर्य से पूछा।
‘आपका गिफ्ट दीदी।
मुझे जोर की हंसी आई, ‘अरे पागल, जन्मदिन तो तेरा है और तू गिफ्ट मुझे दे रहा है ये उल्टी गंगा कैसे बह रही है आज?
‘आज ऐसा ही समझ लो दीदी पवन ने मेरे हाथ में कागजात जबरदस्ती पकड़ाते हुए कहा।
‘ये कैसे कागजात हैं और आखिर इन कागजात में ऐसा क्या लिखा है। मैंने उत्सुकतावश पूछा।
‘बताता हूं दीदी, सब बताता हूं, जाओ कीर्ति मेरी अलमारी से वो बैग लेकर आओ। पवन ने दीदी को आश्वासन देकर कीर्ति को आदेश दिया। उधर कीर्ति अपने कमरे में कुछ लेने गई थी और इधर मैंने कागजात को ऊपर से पढ़ना शुरू किया। मैंने उसमें अपना नाम पढ़ा ही था कि कीर्ति अपने हाथ में एक छोटा बैग लिए हमारे पास आकर बैठ गई।
‘अब इसमें क्या है? मैंने कागजात एक ओर रखते हुए पूछा।
‘एक मिनट दीदी कीर्ति ने वो छोटा बैग पवन को देते हुए कहा। फिर पवन ने उसे खोला उसमें से उसने कुछ पन्ने, डायरियां और कॉपी निकाली जो कुछ पुरानी सी लग रही थी।
पवन ने पन्ने और कॉपी मुझे देते हुए कहा, ‘ये लीजिये दीदी और याद कीजिये वे दिन जब हम साथ में स्कूल जाते थे, आप मेरा हाथ पकड़े रहती थी, मेरा होमवर्क करवाती थी पर मैं कुछ नहीं करता था। सारा दिन इधर से उधर मटरगश्ती किया करता था। आपका कहना भी नहीं मानता था। घर भी बहुत छोटा था एक कमरा और किचन ही तो था। पापा की आमदनी भी ज्यादा नहीं हुआ करती थी। आप जब अपना होमवर्क पूरा कर लेती थी उसके बाद आप छोटी-छोटी कविताएं लिखती रहती थी परंतु जैसे ही शाम होती और पापा घर आते तो आप लिखना बंद कर देती थी, घर के कामों की वजह से या कभी मां की तबीयत अचानक बिगड़ जाने से या कभी घर बड़ा न होने की वजह से जिससे की आप इत्मीनान से कहीं बैठकर लिखती और ऊपर से आप जो भी लिखती तो मैं उसे बार-बार आकर देखता और आप झट से कॉपी बंद कर लेती थी और कभी मैं आपसे झगड़ा करके आपकी लिखी कविताओं को फाड़ देता था। उस वक्त मुझे पता नहीं था कि मैं कितना बड़ा अपराध कर रहा हूं, दीदी आप अपना सपना भूल कैसे सकती हैं, आपको उसे पूरा करना है, आप बड़ी होकर लेखिका बनना चाहती थी ना, फिर आपने लिखना क्यों छोड़ दिया? समय बीतता गया और फिर एक दिन आपकी शादी हो गई। जब मैं आपकी कवितायें पढ़ता तो मुझे आपकी याद आती और मेरी आंखों से अश्रुधारा बहने लगती। तब से मैंने आपकी सारी डायरियां, पन्ने, कॉपियां सब कुछ अपने पास सहेजकर रख लिया और तय कर लिया कि आपको एक दिन लेखिका बनाकर ही रहूंगा। पवन बोलता ही चला जा रहा था। मुझे भी उसकी बाते सुनते-सुनते रोना आ गया। मैंने देखा उसकी भी आंखे भर आई थी।
पवन ने रुआंसी आवाज में फिर कहा, ‘दीदी मैं जनता हूं ये समाज लड़कियों की कद्र करना नहीं जानता। कभी उनको आगे बढ़ता हुआ नहीं देख सकता और एक लिखने वाली लड़की का जीवन तो बहुत ज्यादा कठिन होता है। एक लड़की अपने घर में गोपनीयता से कभी नहीं लिख सकती। कई लड़कियां तो मात्र इसलिए कभी सफल लेखिका नहीं बन पाई क्योकि अपने घर में उन्हें एकान्त मिलना संभव नहीं था क्योंकि उन पर तो वैसे ही पाबंदी होती है। तो हां दीदी इन कागजात में मैं एक छोटा सा जमीन का टुकड़ा आपके नाम कर रहा हूं जो की आपके ससुराल के पास की कॉलोनी में है, जहां एक ऑफिस बना है और एक छोटा हॉल है आज से आपको लिखने में कोई परेशानी कोई दिक्कत या कोई शोरगुल नहीं होगा और न ही कोई पवन बीच में आकर आपकी लिखी रचनाएं फाड़ेगा। आप बस अपने ऑफिस में बैठकर लिखिए और इस समाज की लड़कियां जो उभरती हुई लेखिका बनना तो चाहती हैं पर बन नहीं पा रही हैं, उन्हें भी आप अपने पास बुलाकर लिखने के लिए प्रेरित कीजिये।
पवन ने वो कागजात उठाकर मेरे हाथों में रख दिए मैंने उसके सिर पर हाथ फेरकर कहा, ‘मैं तो तुझे आज भी छोटा ही समझती रही मेरे भाई, पर मुझे नहीं पता था कि तू अब बड़ा हो गया। ईश्वर तुझ जैसा भाई सभी बहनों को दे। तभी किसी के कोमल हाथ मेरे गले में माला बनकर आ गये। मेरा ध्यान भंग हुआ। पीछे देखा तो तानिया थी।
‘मम्मी आज आप अपने ऑफिस नहीं जाओगे क्या? देखिये तीन बज गये हैं। वह मुझे घड़ी की ओर दिखाने लगी।
‘अभी चलते हैं बेटा, ठहर तो और मैं अपनी अंगुली के पोर कविता पर घुमाने लगी। सोच रही हूं आज अगर लेखिका बन पाई हूं तो सिर्फ अपने भाई की वजह से। आखिर उसने मुझे श्रेष्ठ लेखिका बना ही दिया।
थोड़ी देर बाद सुमन तानिया को साथ लेकर अपने ऑफिस के लिए चल दी।

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