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कथा-कहानी

जब भी घर में श्रेया के विवाह की बात चलती थी, उसका गुस्सा सातवे आसमान पर जा पहुंचता था। मम्मी-पापा की परेशानी जायज थी। एम. बी. ए. के बाद अब वह जाॅब में भी आ चुकी थी। उम्र भी हो चुकी थी। फिर श्रेया का ऐसा विहेव? शादी के नाम से ही एलर्जी? उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था। पहले भी वह कई अच्छे रिश्ते ठुकरा चुकी थी।

उसकी बुआ ने अब जो रिश्ता बताया था, वैसा रिश्ता फिर मिलना मुश्किल था। अरविन्द प्रशासनिक अधिकारी था। हैण्डसम, रूतबा पैसा, पावर क्या नहीं था, उसके पास। बुआ ने पता नहीं क्या जादू चलाया था कि श्रेया की फोटो देखकर ही अरविन्द ने शादी की हां कर दी थी। पैसे दहेज की भी कोई डिमाण्ड नहीं। चिराग लेकर भी ऐसा वर नहीं मिलने वाला।

उसके मम्मी -पापा अपनी किस्मत को कोस रहे थे। बुआ का बार-बार फोन आ रहा था, अरविन्द के परिवार वालों को भी जवाब देना था। वैसे तो श्रेया और अरविन्द आपस में मिल चुके थे। अभी वैकेशन में श्रेया अपनी बुआ के यहां उदयपुर गई थी तभी अरविन्द उनके यहां श्रेया से मिला था। दोनों में खूब बातचीत भी हुई थी। अरविन्द की ट्रेनिंग  खत्म हो चुकी थी। उदयपुर में ही उसकी पोस्टिगं हो गई थी। सो उसके परिवार के लिए उसकी शादी के लिए जल्दी करना अस्वाभाविक भी नहीं था।

श्रेया ने अपनी बुआ के घर से वापस आकर अपनी मम्मी को सब कुछ बताया था। अरविन्द से हुई मुलाकात के बारे में भी। वह उसे एक दोस्त के रूप में तो पसन्द करती थी। उससे इम्प्रेस भी बहुत थी परन्तु शादी के नाम पर तो जैसे वह अपना मानसिक संतुलन ही खो बैठती थी। संस्कारवान्, श्रेया का व्यवहार इस संवेदनशली विषय पर इतना अजीब हो उठता था उसका ऐसा एब्नाॅर्मल बिहेव सबकी समझ से बाहर था।

मम्मी -पापा ने दूसरे दिन सुबह उसे फिर से समझाने की कोशिश की। इस उम्मीद पर कि शायद उसका फैसला बदल गया हो। बात वहीं की वहीं थी। श्रेया अपनी जिद पर अड़ी थी। पापा का धैर्य भी अब जवाब देने लगा था। फिर भी उन्होंने प्यार से उसे समझाते हुए पूछा-‘‘बेटे! आखिर बात क्या है? अरविन्द में क्या कमी है?”

श्रेया ने दृढ़ता से जवाब दिया-‘‘पापा आप मेरी फीलिंग्स को नहीं समझते। अरविन्द बहुत अच्छा है। मैं उसे बहुत पसन्द करती हूं लेकिन मैं शादी नहीं करूंगी।

‘‘क्यों? ऐसे कैसे चलेगा भला? शादी तो करनी ही पड़ेगी ना। कुंआरी कब तक रहोगी? पापा ने जबरन अपना गुस्सा दबाते हुए पूछा।

श्रेया का जवाब फिर अटपटा सा ही रहा-‘‘लोग बिना शादी के भी रहते हैं पापा। जीने के लिए क्या किसी पुरूष के सहारे की जरूरत अनिवार्य है?”

बीच में मम्मी बोल पड़ी-‘‘बेटी! तुम्हारे मुंह से ऐसी बातें शोभा नहीं देती। बेटी के विवाह की जिम्मेदारी पूरी करके ही तो हमें शांति मिलेगी।”

‘‘तो मैं आपके लिए बोझ बन गई हूं ना। कोई बात नहीं। अगर ऐसा ही है तो मैं यह घर छोड़ देती हूं। ” श्रेया ने बिना किसी लाग-लपेट के कठोर जवाब दे दिया।

ऐसे जवाब से उन्हें गहरा सदमा लगा। कुछ भी नहीं सूझ रहा था। अचानक उसके पापा के सीने में तेज दर्द उठा। उनकी हालत वाकई खराब हो चुकी थी। श्रेया और उसकी मम्मी के हाथपांव फूल गए। आनन-फानन में उन्हें हाॅस्पिटल पहुंचाया गया। जब डाॅक्टर ने उन्हें बताया कि उन्हें अटैक आया था तो उन्होंने ईश्वर का धन्यवाद किया।

श्रेया अपने मम्मी-पापा को दिल से चाहती थी। परिस्थितियां बदल चुकी थी। अब वह पापा के लिए कोई कारण पैदा नहीं करना चाहती थी, जिससे दुबारा उन्हें सदमा पहुंचे। मजबूरी में या दबाब में आकर उसने शादी के लिए हां कर दी।

हो सकता था कि उसकी परवरिश में ही कोई कमी रही हो या उनके घर का माहौल ही ऐसा रहा कि श्रेया के मन में कभी भी प्रेम-रोमासं की फीलिंग्स पैदा ही नहीं हुई। कठोर और स्टडी, कॅरियर के प्रति डेडीकेशन तो वह थी ही, सो हमेशा अपने मम्मी-पापा की अपेक्षाओं को पूरा करने में ही जुटी रही। स्टूडियस तो वह हमेशा किताबों की दुनिया में ही खोई रहती। उसके अंतर्मन में अनजाने में ही कठोरता घर कर गई थी। मम्मी के साथ भी उसके बेहद औपचारिक संबंध रहे। ना तो घर का वातावरण ही खुला था और न ही उसकी कोई अंतरंग सहेली ही थी, जिससे वह संवेदनशील भावुकता की बातें सीखती। उसका ऐसा व्यक्तित्व एक स्टूडेन्ट के रूप में फायदेमंद था, परन्तु जीवन जीने की कला के अभाव के कारण उसकी पर्सनेल्टी इन्ट्रोवर्ट (आत्ममुखी) ही बनी रही।

चट मंगनी पट ब्याह की तर्ज पर धूमधाम से उसका विवाह हो गया। इस उम्र में जैसे लड़कियों को शादी के ख्वाब होते हैं, वैसा श्रेया के लिए कुछ न था। बल्कि उसे शादी के नाम से ही डर सा लगता था। ससुराल और अपरिचित, अनजान व्यक्ति के आगे समर्पण, वो सोच-सोच कर ही भयभीत हो उठती थी। अक्सर सब लोग श्रेया के ऐसे व्यवहार को उसका गुरूर समझ बैठते थे जबकि असलियत यह थी कि यह उसकी मनोवैज्ञानिक समस्या थी। उसके अवचेतन मन में परपुरूष के प्रति एक अजीब सी ग्रंथि बन चुकी थी। शादी के बाद की लाइफ का उसे अच्छे से ज्ञान था। वह उस सिचुएशन के लिए कभी भी तैयार नहीं थी। उसके मन में हमेशा एक काॅम्प्लेक्स रहता था कि कैसे कोई लड़की अचानक एक अनजान पुरुष को अपना सर्वस्व सौंप सकती है।

बहरहाल शादी हो चुकी थी। श्रेया अपने ससुराल आ गई थी। अरविन्द बहुत खुश था। श्रेया के अद्भुत सौन्दर्य, गुण और संस्कारों को वह पहले ही परख चुका था। ज्यों-ज्यों रात्रि का समय हो रहा था, श्रेया की बेचैनी और घबराहट बढ़ती जा रही थी। उसकी ननदों और भाभियों की चुहलबाजी और हंसी मजाक उसे असहनीय लग रही थी।

फूलों से सजे अपने बैडरूम में वह शादी के जोड़े में बैठी हुई अब भी विचारमग्न थी। चेहरे पर पसीने की बूंदें साफ झलक रही थी। आगे आने वाले उसके अन्तर्मन को बैचेन कर रहे थे। कि अचानक मुस्कराते हुए अरविन्द ने प्रवेश किया। उसकी घबराहट और बढ़ गई। एक दोस्त के रूप में अरविन्द उसे स्वीकार्य परन्तु पति के रूप में तो उसकी कल्पना भी श्रेया के लिए असहनीय लग रही थी।

अरविन्द उसके नजदीक आकर बैठ चुका था परन्तु उसे तो जैसे होश ही न था। बड़े प्यार से उसने पहल करते हुए उसका हाथ छुआ तो झट से उसने अपने हाथ को पीछे खींच लिया। अरविन्द ने मजाक में बात टालते हुए उसका घूंघट हटाने का प्रयास किया। उसे अपने आगोश में लेना चाहा तो श्रेया ने एकदम झटके से उसे दूर झटक दिया।

अरविन्द को श्रेया का ऐसा व्यवहार पहले तो उसे अजीब लगा, लेकिन वह नासमझ नहीं था। आखिर टेलेण्टेड था तभी तो प्रशासनिक सेवा जैसे टफ कम्पीटीशन में सफल हो पाया था। उसने श्रेया के असामान्य व्यवहार को समझने का प्रयास किया। उसने शारीरिक हरकत की जगह केवल प्यार से श्रेया से बातचीत शुरू की। श्रेया ने पहले तो उसकी किसी भी बात का जवाब नहीं दिया परन्तु अरविन्द के शिष्ट और प्रेमपूर्ण व्यवहार से संकोच और हिचक दूर होने लगी। अरविन्द ने साफ-साफ पूछा-‘‘क्या मैं तुम्हें पसन्द नहीं? इतनी दूरी क्यों?

श्रेया ने स्पष्ट कह दिया-‘‘नहीं ऐसा नहीं है, आई लाइक यू बट… प्लीज़ डाॅन्ट टच माई बाॅडी।”

अरविन्द को उसके काॅम्प्लेक्स को समझने में देर नहीं लगी। वह जानता था कि श्रेणी जैसी इन्ट्रोवर्ट लड़कियों के दिल को जबरन जीतना संभव नहीं था। जोर जबदस्ती से वह उसका शरीर तो जीत सकता था परन्तु उसका दिल कदापि नहीं इसलिए अपनी प्रथम मिलन की रात्रि को उसने सिर्फ फ्रेण्डली बातचीत में ही गुजार दिया ताकि उसे क्षणिक भी ऐसा फील न हो सके कि जैसे वह उसके साथ बलात्कार कर रहा है। वह उसकी संवेदनाओं और जटिलताओं को गहराई से जान लेना चाहता था। इसलिए उस रात्रि को उने सिर्फ फ्रेण्डली बातचीत में ही गुजार कर श्रेया के अवचेतन मन की गहराई को पढ़ने का प्रयास किया।

दूसरे दिन प्रातः उसकी हमउम्र ननदों और भाभी ने पुनः मजाक शुरू कर दिया। लेकिन अरविन्द ने बड़ी समझदारी से सब को समझा दिया। अब कोई भी उसकी इच्छा के विपरीत उससे ऐसे कोई बात नहीं कर रहा था जिससे कि उसके दिल को ठेस पहुंचे।

धीरे-धीरे तीन चार दिन बीत गऐ। इस अवधि में अरविन्द ने उसकी भावनाओं की कद्र करते हुए उसका विश्वास जीतने की पूरी कोशिश की। उसे नजदीकियों का अहसास भी कराया, लेकिन बहुत ही गरिमापूर्ण और शिष्ट व्यवहार से। उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने का उसने कोई प्रयास नहीं किया। अरविन्द की छुट्टियां भी खत्म हो रही थी। श्रेया का चचेरा भाई उसे लेने आ गया था। श्रेया तो जैसे जेल से मुक्त होने के लिए बेताब ही थी। जाने से पूर्व अरविन्द ने उसे इतना कहा- ‘‘श्रेया तुम जा रही हो, मैं भी 15-20 दिनों से पूर्व नहीं आ पाउंगा लेकिन मुझे तुम्हारी याद हरपल सताती रहेगी। तुम्हारे साथ बिताए हसीन पल मुझे हमेशा बेचैन रखेंगे।”

उस समय श्रेया शायद इन बातों का महत्व ही नहीं समझ रही थी। श्रेया पीहर आ चुकी थी। मम्मी-पापा सब खुश थे। अन्दर की बात की उन्हें भनक भी नहीं थी। यह अरविन्द की समझदारी ही थी कि उसने दोनों ही परिवारों में श्रेया के एब्नोर्मल व्यवहार को स्कैण्डल नहीं बनने दिया। और कोई होता तो ऐसी स्थिति में तिल का ताड़ बना देता। पीहर में अब यद्यपि श्रेया अरविन्द से दूर थी परन्तु उसके जेहन में हर वक्त अरविन्द समाया रहता। वह उसकी बातों और व्यवहार  का ही विश्लेषण करने में ही जुटी रहती। उसकी प्यार भरी बातें उसके दिल में मीठा सा अहसास जगाने लगती। दोनों की दूरी अब उसे थोड़ी बहुत अखरने लगी थी।

दिन में एक बार अरविन्द का फोन अवश्य आता था। वह हमेशा उसकी मम्मी को अहसास करा देता। इतनी जिम्मेदारी की नौकरी और व्यवस्ता के बावजूद वह उसे कितना मिस करता था। धीरे-धीरे उसके अचेतन मन पर जमीं बर्फ की परत पिघलने लगी।

अचानक उसकी फ्रेण्ड कविता उससे मिलने आ गई। हालांकि सहेलियां तो बहुत थी परन्तु कविता से ही वह थोड़ी बहुत खुलकर बात कर लिया करती थी। इस समय उसे एक साथी की जरूरत थी जिससे अपनी फीलिंग्स शेयर कर पाती। मम्मी से वह खुली हुई नहीं थी सो कविता का इस समय आना उसके लिए वरदान बन गया। एक कविता ही थी जिससे वह अपने दिल की बात कर दिया करती थी। अब कविता ने ज्यों ही उससे अरविन्द के बारें में पूछा तो श्रेया का टेपरिकार्डर एक बार चालू तो बन्द ही न हो पाया।

श्रेया ने अपने दिल की सारे बातें कविता को बता दी। अपनी झिझक, संकोच और काॅम्प्लेक्स, जिससे वह अभी तक संघर्ष करती आ रही थी। कविता समझदार और अनुभवी थी। कुछ दिन पूर्व ही उसका भी विवाह हुआ था। उसने बड़े धैर्य और शांति से श्रेया के सभी प्रश्नों का समाधान कर दिया। उसकी बातें अब श्रेया के दिमाग में बैठ चुकी थी। खासकर श्रेया का यह कथन-‘‘तुम वाकई लक्की हो। इसलिए नहीं कि तुम्हें हसबैण्ड के रूप में एक प्रशासनिक अधिकारी मिला है बल्कि इसलिए की वाकई अरविन्द तुम्हें दिल से चाहता है। अब तुम्हारी बारी है कि तुम उसे अहसास कराओ कि उसका तुम्हारे बारे में कोई गलत फैंसला नहीं था।”

कविता और अरविन्द की बातों का असर था कि अब श्रेया को समझ आ गया कि सृष्टि के शाश्वत नियम सभी प्राणियों पर स्वाभाविक रूप से लागू होते हैं। जिस स्त्री -पुरूष के स्वाभाविक संबंध को वह हेय और अननेचुरल मान रही थी वह भी लाइफ का अनिवार्य और सुखद अनुभव है जो पति-पत्नी के बीच आत्मिक सम्बन्धों को आधार है।

आज पहली बार उसने अरविन्द को फोन किया। बात शुरू हुई। श्रेया ने कहा मुझे लेने कब आ रहे हो? मैं आपका वेट कर रही हूॅं। अब आपसे अलग नहीं रहना चाहती।”

अरविन्द की खुशी का ठिकाना नहीं था। अब वह जीत चुका था, न केवल श्रेया का दिल बल्कि सम्पूर्ण श्रेया को ही।

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