भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
Lok Katha: एक समय की बात है, कुछ आदिवासी लोग पहाड़ों पर रहने लगे थे। इस कारण उन्हें ‘पहाड़िया’ कहा जाने लगा था। पहाड़ों पर उगने वाले बाँस को पहाड़ियों ने सबसे पहले उपयोग में लाना सीखा। वे बाँस से तीर-कमान बनाकर पशु-पक्षी ही नहीं मछली आदि का भी शिकार कर लेते थे। बाँस से जोड़ी और मचान बना लेते थे। बाँस की गेंड़ी बनाकर नालों को पार कर लेते। बाँस से चटाई, टोकरी आदि बना-बेच कर जीवनयापन करने के कारण इन्हें ‘कमार’ जाति का कहा जाने लगा।
कमार भूमिपुत्र थे, खुद को औरों से श्रेष्ठ मानकर जनेऊ पहनते थे। एक कठिनाई थी कि बाँस काटते समय जनेऊ बाँसों और आस-पास की झाड़ियों में फंसकर टूट जाता था। इस कारण जनेऊ को बार-बार बदलना पड़ता था। इससे काम में बाधा होती। तंग आकर कमारों ने जातीय पंचायत बुलाई और यह तय किया कि वे जनेऊ ही छोड़ देंगे। जनेऊ पूजा के पश्चात पहना जाता था। टूटने पर पानी में प्रवाहित किया जाता था। जनेऊ छोड़ने का फैसला कर लेने के बाद भी जनेऊ से भावनाएँ जुड़ी थीं कि जनेऊ को कचरे की तरह फेंका नहीं जा सकता, फेंक देने पर वह पैरों तले रौंदा जाएगा, गंदगी में मिल जाएगा आदि।
कई दिनों तक बहस होती रही। आखिरकार यह सोचा गया कि जनेऊ उतारकर उनकी पूजाकर प्रार्थना की जाए कि जनेऊ देवता नाराज न हों, अपनी दया दृष्टि बनाये रखें। फिर जनेऊ पूजनीय बरगद के झाड़ जिस पर बरमदेव का वास है, की ऊँची शाखाओं पर लटका दिए जाएँ। आते-जाते समय सभी कमार जनेऊ को प्रणाम करेंगे। इस तरीके से असुविधा भी न रहेगी और जनेऊ का सम्मान भी बना रहेगा। कहते हैं कि समय के साथ कमार जनेऊ को प्रणाम करना भूलते गए। बहुत समय बाद कमारों का एक समूह जंगल में उस वृक्ष की तरफ गया तो उसने देखा कि बरगद के वृक्ष से हरी-हरी बेलें और जटाएँ लटक रही हैं। वे बेलें गर्मी में भी सूखती नहीं थीं। उन बेलों को अमर बेल का नाम दिया गया।
टीप : पहाड़िया लोग आजकल मुख्यतः झारखंड प्रदेश के संथाल परगना के साहेबगंज, पाकुड़, गोड्डा, दुमका, तथा जामताड़ा जिलों में रहते हैं। इस जनजाति में प्रोटोआस्ट्रोलॉयड प्रजातीय तत्व नाटे कद, चौड़ी नाक, चौड़ा माथा, हल्के भूरे घुघराले बाल के रूप में हैं। ३०२ ईसा पूर्व में चीनी पर्यटक मेगस्थनीज ने इनका उल्लेख्य राजमहल पहाड़ियों के निचले भाग में रहनेवाली माल्ली या सौरी जनजाति के रूप में किया है। इनकी बोली ‘मालतो’ द्रविड़ भाषा समूह की है। शरत चंद्र राय के अनुसार यह जनजाति दक्षिण भारत से विंध्याचल पर्वत श्रेणी से होते हुए नर्मदा के ऊपरी किनारे से होते हुए आरा, बक्सर, रोहतासगढ़ में बसे जहाँ यवनों से संघर्ष के बाद दो भागों में बँटकर छोटानागपुर व राजमहल की पहाड़ियों में रहने लगे। मध्य प्रदेश के नर्मदांचल में बुजुर्ग वनवासी कमार लोककथा अब भी कहते हैं।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
