akbar birbal das mahaamoorkh
das mahaamoorkh

das mahaamoorkh story in Hindi : बादशाह अकबर अनेक बार बीरबल से अजीब-अजीब फरमाइशें किया करते थे। एक दिन बादशाह ने बीरबल को एक विचित्र आदेश दिया, ‘बीरबल, मुझे शहर के दस महामूरों से मिलवाओ। इस काम के लिए मैं तुम्हें एक महीने का समय देता हूँ।’

बीरबल ने बादशाह को सिर झुकाया और कहा, ‘यह तो कोई बड़ी बात नहीं है, जहाँपनाह। जल्दी ही मैं आपकी मुलाकात दस महामूरों से करवाऊँगा।’

इसके बाद बीरबल मूों की खोज में निकल गए। वह अपने घोड़े पर बैठकर चले जा रहे थे कि उन्होंने एक विचित्र दृश्य देखा। एक व्यक्ति अपने घोड़े पर बैठा हुआ जा रहा था। उसके पास लकड़ियों का एक गट्ठर था। किंतु उसने गट्टे को घोड़े की पीठ पर लादने के बजाय अपने सिर पर रखा हुआ था।

बीरबल ने उसे रोका और पूछा, ‘भाई, घोड़े की पीठ पर लादने के बजाय यह गट्ठर तुम अपने सिर पर क्यों उठाए हुए हो?’

घुड़सवार ने उत्तर दिया, ‘हुजूर, मेरा घोड़ा बूढ़ा है। वह कमजोर भी है। शायद इतना बोझ बर्दाश्त न कर सके। इसलिए इस बोझ को मैं स्वयं उठाकर ले जा रहा हूँ।’

बीरबल ने सोचा कि इससे बढ़कर मूर्ख कौन होगा? उन्होंने घुड़सवार से कहा, ‘चलो, मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें नया घोड़ा दिलवा दूंगा।’

वे दोनों कुछ ही दूर गए होंगे कि उन्होंने एक आदमी को देखा। वह आदमी जमीन पर लेटा हुआ था और उसकी दोनों बाहें ऊपर उठी हुई थीं।

बीरबल ने अपना घोड़ा रोका। उन्होंने सोचा कि इस आदमी को कोई परेशानी है। वह उस आदमी के पास पहुंचे और उसे उठाने लगे। वह आदमी चीखते हुए बोला, ‘नहीं, नहीं! मेहरबानी करके मेरे हाथ न पकड़ें।’

बीरबल ने पूछा, ‘क्या आपको कोई परेशानी है?’

वह आदमी बोला, ‘नहीं, नहीं। जरा भी नहीं। बात यह है कि मेरी बीवी ने मुझे इतना बड़ा बर्तन लाने को कहा था। हाथ हिल जाने से नाप में फर्क आ जाएगा। मेरी बीवी बहुत तेज है। वह मुझे हमेशा ताने देती रहेगी।’

बीरबल ने सोचा कि यह तो बहुत बड़ा मूर्ख है। उन्होंने उस आदमी से कहा, ‘अपने हाथ नीचे कर लो। मैं तुम्हें छोटे-बड़े सभी नाप के बर्तन दिलवा दूंगा। तुम मेरे साथ चलो।’

बीरबल घोड़े पर चढ़ने ही वाले थे कि एक व्यक्ति उनसे टकराया। बीरबल ने उसे डाँट लगाई, ‘क्या बात है, दिखाई नहीं देता क्या?’

बूढा बोला, ‘हुजूर माफ करें। मैंने अभी-अभी मस्जिद में अजान दी थी। मैं यह देखने के लिए दौड़ रहा था कि मेरी आवाज कितनी दूर तक जाती है? अब सारा गुड़ गोबर हो गया।’

बीरबल आश्चर्य से उस मौलवी को देखते रहे। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि दुनिया में कोई ऐसा मूर्ख भी होगा। उन्होंने मौलवी से कहा, ‘अब आवाज की बात छोड़ो। चलो मेरे साथ, मैं तुम्हें सोने की दो मुहरें दूंगा।’

बीरबल तीनों मूरों को अपने घर ले गए।

उन्होंने तीनों को आदेश दिया कि मेरे आने तक तुम लोग यहीं ठहरो।

बीरबल अन्य मूों की खोज में निकल पड़े। वह थोड़ी दूर गए होंगे कि उन्हें दो आदमी लड़ते हुए दिखाई दिए। बीरबल उनके पास रुके और बोले, ‘भले आदमियो, इस तरह क्यों लड़ रहे हो?’

उनमें से एक बोला, ‘हुजूर, यह मेरी भैंस पर शेर से हमला कराने की धमकी दे रहा है।’

बीरबल ने इधर-उधर देखकर कहा, लेकिन मुझे न शेर दिखाई दे रहा है और न भैंस।’

दिखाई देगा हुजूर, जरूर दिखाई देगा। यदि खुदा खुश होकर हमारी एक-एक माँग पूरी करने का फैसला कर ले।’ दुसरा बोला।

इस पर पहला बोला, ‘अब तो आपको यकीन आ गया हुजूर! इसके कहने का मतलब है कि अगर मैं खुदा से भैंस माँगूगा तो यह शेर माँगेगा ताकि वह मेरी भैंस को खा जाए।’

यह कहकर वे दोनों फिर से लड़ने लगे। बीरबल का सिर चकराने लगा। तभी उन्होंने किसी की आवाज सुनी। कोई कह रहा था, ‘आप भी कितने भोले हैं हुजूर कि इन मूरों की बातों को गंभीरता से ले रहे हैं। ये लोग निश्चय ही मूर्ख हैं। यदि ऐसा न हो तो मेरी हड्डियाँ चूर-चूर हो जाएँ। मेरा खून बहे बिल्कुल इस तरह …।’ यह कहकर उसने अपने सिर पर रखा तेल का घड़ा जमीन पर गिरा दिया। घड़ा टूट जाने से उसका सारा तेल जमीन पर फैल गया।

घड़ा टूट जाने पर वह आँसू बहाकर रोने लगा। बीरबल उन तीनों को भी अपने घर पर ले गए और उन्हें अन्य मूल् के पास छोड़ दिया।

अब तक बीरबल काफी थक गए थे। वे हवा खाने के बहाने घर से बाहर आए। तभी उन्होंने देखा कि एक आदमी कुछ खोज रहा है। बीरबल ने उससे पूछा, ‘क्या खोज रहे हो, भाई?’

‘हुजूर, मेरी अंगूठी यहीं कहीं खो गई है, उसी को खोज रहा हूँ।’ वह आदमी बोला।

‘क्या तुम्हारी अंगूठी यहीं पर गिरी थी?’ बीरबल ने पूछा।

वह व्यक्ति बोला, ‘नहीं हुजूर। गिरी तो उस पेड़ के पास थी। किंतु यहाँ पर रोशनी है, इसलिए यहीं खोज रहा हूँ।’

‘मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें नई अँगूठी बनवाकर दे दूंगा।’ बीरबल ने कहा।

वे दोनों धीरे-धीरे चले आ रहे थे कि बीरबल ने एक और आदमी को देखा। वह भी कुछ खोजने में लगा था। बीरबल ने उसकी परेशानी के विषय में पूछा तो वह जोर-जोर से रोने लगा। बीरबल ने पूछा, ‘तुम रो क्यों रहे हो?’

‘हुजूर, मैंने इस रेत के ढेर में अपनी अशर्फी छिपाई थी। अब वह मिल नहीं रही है। अब मैं क्या करूँ?’

बीरबल ने पूछा, ‘तुमने उस जगह कोई निशानी लगाई थी?’

उसने उत्तर दिया, ‘क्यों नहीं हुजूर! मैं कोई मूर्ख थोड़े ही हूँ। जहाँ मैंने अशर्फी छिपाई थी, ठीक उसके ऊपर बदली मौजूद थी। पर अब वह बदली गायब हो गई है। मैं अपनी अशर्फी कैसे खोलूँ?’

बीरबल ने उसे समझाया, ‘तुम बदली की फिक्र न करो। मैं तुम्हें दूसरी अशर्फी दिलवा दूंगा।’

अब उनके घर पर आठ मूर्ख इकट्ठे हो गए थे। दूसरे दिन वह आठों मूों को लेकर दरबार में उपस्थित हुए। उन्हें देखते ही बादशाह अकबर ने पूछा, ‘अरे बीरबल, तुम इतनी जल्दी वापस आ गए?’

बीरबल ने आदाब किया और बोले, ‘जहाँपनाह, इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। अक्लमंदों के मुकाबले मूर्ख जल्दी मिल जाते हैं।

इसके बाद बीरबल ने आठों व्यक्तियों के विषय में बादशाह को बताया। बादशाह ने उन सबको देखा और पूछा, ‘लेकिन ये तो आठ हैं। मैंने तो तुमसे दस मूर्ख लाने के लिए कहा था।’

‘माफ कीजिए जहाँपनाह! पूरे दस मूर्ख यहाँ पर उपस्थित हैं।’ बीरबल बोले।

‘दो कहाँ हैं?’ अकबर ने पूछा।

‘गुस्ताखी माफ हो जहाँपनाह! वे दो मूर्ख हम दोनों हैं। हम दोनों इन सबसे बड़े मूर्ख हैं। आप ऐसे बेतुके काम पर मुझे भेजने के लिए और मैं आपका हुक्म बजाने के लिए।’ बीरबल ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया।

दरबार में चारों ओर हँसी फूट पड़ी। इस हँसी में सबसे ऊँची हँसी बादशाह अकबर की थी।

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