सपने दो तरह के होते हैं। एक, बंद आंख का सपना और दूसरा खुली आंख का सपना। एक सपना वह है जो आप रात में सोते समय देखते हैं और दूसरा सपना वह है जो आप अभी खुली आंखों से देख रहे हैं। रात में जब आप हैं, उसे असलियत मानते हैं मगर सुबह जब आंख खुलती है तो लगता है। अरे वह तो सपना था।

अभी जो आप देख रहे हैं वह किसी सपना से कम नहीं है, ये मकान, दुकान, बीवी-बच्चे, गाड़ी-घोड़ा, जमीन-जायदाद, रुपया-पैसा सब सपने हैं, खुली आंख का सपना। मगर अभी तुम इसे ही सच मानोगे क्योंकि खुली आंख का सपना है, पर जब आंख बंद हो जाएंगी तो सब यहीं रह जायेगा। जब आंख मुंदेगी तो मालूम पड़ेगा कि यह तो सपना था।

याद रखो: सपना, सपना होता है, सपना अपना नहीं होता। मेरा निवेदन तो इतना है कि ये दुनिया और दुनिया में रहने वाले लोग सब सपना हैं। अभी से समझ लेना। आंख बंद होने पर समझ में आये तो क्या मतलब? बात तो तब है कि अभी आप इसे सपना समझ लें और फिर वैसा ही व्यवहार करें।

अध्यात्म मनुष्य की मूर्च्छा को तोड़ता है। उसे यथार्थ के धरातल पर खड़ा करके सोचने के लिए मजबूर करता है।

एक बार अकबर ने बीरबल से पूछा: बीरबल! यह बताओ कि दुनिया में आंख वाले ज्यादा हैं या अंधे? 

बीरबल ने कहा: महाराज! दुनिया में अंधे ज्यादा हैं। लोगों ने कहा: हम तो बीरबल को बड़ा होशियार समझते थे पर ये तो बड़ा मूर्ख निकला। कहता है दुनिया में अंधे ज्यादा हैं। अरे अंधे तो गिने-चुने ही दिखते हैं। अकबर ने पूछा: अंधे तो गिने-चुने ही हैं फिर तूने यह कैसे कहा कि अंधे अधिक हैं। बीरबल ने कहा: बादशाह सलामत को किसी दिन बता दूंगा।

एक दिन बीरबल शहर के चौराहे पर एक फटा-पुराना जूता लेकर खड़ा हो गया और उसे घुमाने लगा। उधर से जो निकला उसने पूछा: बीरबल ये क्या कर रहे हो? बीरबल ने अपने पास एक आदमी को बैठा रखा था, जो भी पूछता: बीरबल ये क्या कर रहे हो? बीरबल उससे कहता लिखो इसका नाम। मंत्री वहां से निकला। उसने भी पूछा: उसका भी नाम लिख लिया। फिर सेनापति, खजांची निकले। सबका एक ही सवाल था- बीरबल क्या कर रहे हो? बीरबल सबका नाम लिखता गया।

अंत में बादशाह की सवारी निकली। जब बादशाह उस चौराहे से गुजर रहा था, उसने देखा बीरबल खड़ा-खड़ा एक लकड़ी पर जूता घुमा रह है। बादशाह ने पूछा: अरे बीरबल! तुम यहां क्या कर रहे हो? बीरबल ने कहा: इनका भी नाम लिखो।

अगले दिन बीरबल दरबार में पहुंचा और अकबर के सामने आंख वालों की और अंधों की दोनों सूचियां रख दीं और और कहा: जहांपनाह जरा इस रजिस्टर पर मुलाहिजा फारमाएं कि अंधे कितने और आंख वाले कितने? बादशाह ने उस सूची को देखा तो सबसे पहले, सबसे ऊपर उसी का नाम था। बादशाह ने कहा: बीरबल! यह संख्या बिल्कुल गलत है। बीरबल ने कहा: महाराज संख्या बिल्कुल सही है। अकबर ने कहा: अरे तूने तो मुझे भी अंधों की लिस्ट में रख दिया। बीरबल ने कहा: महाराज आप अंधे हो गये होंगे। अकबर ने गुस्से में पूछा: मैं अंधा कैसे हो गया होऊंगा? तब बीरबल ने कहा: महाराज! कल जब मैं चौराहे पर खड़ा जूता घुमा रहा था तब आपने पूछा था कि बीरबल तुम क्या कर रहे हो? उस समय क्या आपकी आंखें नहीं थीं? आप देख तो रहे थे कि मैं जूता घुमा रहा हूं। फिर भी आपने पूछा: क्या कर रहे हो। यदि आप सूझते होते तो ऐसा क्यों पूछते। आपने पूछा: इसका मतलब आपको सूझ नहीं रहा था। मेरा मतलब आंख के होते हुए भी विवेक नहीं तो हम अंधे हैं। अगर भीतर की आंख न खुले तो बाहर की आंख सिर्फ मयूर-पंखी आंख बन कर रह जाती है। हिय की आंख खुलनी चाहिए। आदमी में समझ पैदा होनी चाहिए, समझ ही हर समस्या का समाधान है। समझ है तो आदमी क्रोध को बोध बना लेता है। उसके लिए ‘बुरा’ भी ‘बूरा’ बन जाता है। 

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