उनकी बात सच है। दुनिया में दुख है। शोषण है, बहुत शोषण है। लेकिन यह दुख सदा से है। और मन माने चाहे न माने, यह दुख सदा रहेगा। यह दुख संसार का स्वभाव है। हम थोड़े बहुत हेर-फेर कर ले सकते हैं, हम थोड़ा रंग-रोगन कर ले सकते हं, ऊपर-ऊपर थोड़े अंतर हो जाएंगे, भीतर सब वैसा है, वैसा ही रहेगा।

आदमी बदलता रहा है समाज की व्यवस्था को, राज्य की व्यवस्था को, अर्थ की व्यवस्था को, लेकिन कोई बदलाहट जीवन से दुख का अंत नहीं कर पायी। कोई बदलाहट ऐसी नहीं आ पायी, जिसे हम क्रांति कहें। क्रांतियां होती रही हैं, क्रांति पर क्रांति आती रही हैं और आदमी जैसा है वैसा है। जीवन के आधार भूत नियम छुए भी नहीं जा सके हैं- कोई क्रांति नहीं छू सकी है, सारी क्रांतियां हार गयी हैं।

इस जगत में क्रांति से ज्यादा असफल और कोई धारणा नहीं है। गरीब-अमीर को मिटा दो, कुछ फर्क नहीं पड़ता। नए वर्गभेद पैदा हो जाते हैं। फिर शासक और शसित का भेद हो जाता है। मालिक और गुलाम को मिटा दो, तो मालिक और नौकर आ जाता है। जैसा आदमी है, इसके रहते दुनिया की दुख व्यवस्था बदल नहीं सकती।

और तुम्हारा तर्क ऊपर से बिल्कुल ठीक लगता है कि जब इतना दुख है, इतनी पीड़ा है, तो कैसे राम को खोजें? पहले दुख मिटाएंगे, पहले क्रांति तो आने दें, पहले सब ठीक तो हो जानें दें, फिर राम को खोज लेंगे। यह तर्क सुंदर लगते हुए भी बड़ा खतरनाक हैं। फिर तुम राम को कभी खोज न न पाओगे। अच्छा हुआ बुद्ध ने ऐसा न सोचा कि पहले दुख मिट जाए, फिर सत्य की तलाश करुंगा। नहीं तो बुद्ध अब भी बुद्धू होते। अब भी तुम जैसे होते। अच्छा हुआ सदियों-सदियों में कुछ लोग होते रहे जो इस तर्क से प्रभावित नहीं हुए।

इस तर्क से प्रभावित होने के पीछे अचेतन कारण हैं। सबसे बड़ा कारण यह है कि तुम परमात्मा की खोज टालना चाहते हो। तुम कोई मजबूत कारण चाहते हो जिसके आधार पर खोज टाली जा सके, और टालने का अपराध भी अनुभव न हो। इससे बढ़िया और कोई तरकीब नहीं है जो तुमने सोची है। दुनिया में दुख है, पहले दुख मिटे। न मिटेगा दुख, न राम की खोज की झंझट पैदा होगी तर्क ऐसा सुंदर है कि राम भी सामने खड़े हों तो उनको भी उत्तर न सूझे। दुख मिटे, फिर याद कर लेंगे। दुख मिटेगा नहीं। दुख संसार की नियति है। यह कोई दुर्घटना नहीं है दुख, जैसे वृक्ष हरे हैं, यह कोई दुर्घटना नहीं है कि वृक्ष हरे हैं अब तुम कहो कि जब वृक्ष हरे नहीं होंगे, तब हम राम का स्मरण करेंगे। तो फिर राम का स्मरण कभी नहीं होगा। फिर छोड़ दो बात, न वृक्ष बदलेंगे, न राम का स्मरण होगा। तुम कहो जब आग गरम नहीं होगी, तब हम राम का स्मरण करेंगे, अभी कैसे करें स्मरण, अभी आग बहुत गरम है ठीक वैसी ही बात है, संसार स्वरूपत: दुख है।

बुद्ध ने ऐसा नहीं कहा है कि संसार सांयोगिक रूप से दुख है, संसार दुख है। बेशर्त कहा है। और संसार दुख है। यहां होने का ढंग दुख में आवृत है। इसलिए तुम दुख को न बदल सकोगे। संसार में पैदा ही जो लोग होते हैं, वे दुख की पूरी की पूरी आयोजना लेकर आते हैं। जन्मों-जन्मों के दुख के घाव लेकर आते हैं। जिस व्यक्ति के दुख के घाव भर जाते हैं, वह फिर संसार में पैदा नहीं होता। तुम ऐसा ही समझो कि अस्पताल में स्वस्थ आदमी नहीं जाते हैं, बीमार ही जाते हैं। इसलिए तुम अगर प्रतीक्षा कर रहे हो कि जिस दिन अस्पताल में सब लोग स्वस्थ ही होंगे, उस दन हम राम का भजन करेंगे, तो फिर भजन हो गया अस्पताल में आता ही बीमार आदमी है। और जैसे ही स्वस्थ हो जाता है, अस्पताल से मुक्त हो जाता है। स्वस्थ आदमी अस्तपताल में रुकते नहीं। बीमार आते हैं, स्वस्थ रुकते नहीं, स्वस्थ होते ही अस्पताल से छुट्टी हो जाती है।

इस संसार को तुम अस्तित्व का अस्पताल समझो। यहां दुख भोगने को हम आते हैं और जैसे ही कोई व्यक्ति यहां दुख के पार हो जाता है, जाग जाता है, वैसे ही इस संसार से उसका संबंध टूट जाता है। इसलिए ज्ञानी दुबारा पैदा नहीं होता। ज्ञानी के दुबारा पैदा होने का उपाय नहीं है।

संसार दुख है। इसी बात को संसार के क्रांतिकारी अब तक नहीं समझ पाए हैं और व्यर्थ दीवाल से सिर फोड़ रहे हैं। क्रांतियां होती रही हैं और क्रांतियां हारती रही हैं। और क्रांतियां होती रहेंगी और क्रांतियां हारती रहेंगी। क्रांति कभी जीत नहीं सकती। ऐसा कभी नहीं हो सकता कि संसार दुख न हो। हां, दुख के ढंग बदल जाएंगे, रंग बदल जाएंगे, इधर से चोट खाते थे, उधर से चोट खाने लगोगे, इधर से पीटे जाते थे, उधर से पीटे जाने लगोगे, एक आदमी छाती पर बैठा था, वह उतरेगा तो दूसरा छाती पर बैठ जाएगा। असली क्रांति एक ही है, वह भीतर घटती है, बाहर नहीं। सुख का द्वार एक ही है, वह भीतर है, बाहर नहीं। बहाने मत खोजो, चालबाजियां मत खोजो, क्योंकि नुकसान तुम्हारा है, किसी और का नहीं। अच्छे-अच्छे तर्कों के जाल में अपने को लुभाओ मत, क्योंकि धोखा तुम्हीं खा रहे हो, कोई और नहीं। यह मत कहो कि रात अंधेरी है हम दीया कैसे जलाएं? रात अंधेरी है, इसीलिए तो दीया जलाओ मैं तुमसे कहता हूं। और दुनिया में दुख है, इसीलिए परमात्मा को पुकारो मैं तुमसे कहता हूं। और दुनिया में पीड़ा है, परेशानी है, इसीलिए थोड़े से परमात्मा के झरोखे खोलो मैं तुमसे कहता हूं। और दुनिया तो ऐसी ही रहेगी, लेकिन अगर परमात्मा का द्वार जीवंत रूप से खुला रहे तो जिनको भी दुख से पार होना है, वे हो सकते हैं।

दुख से पार होना व्यक्तिगत है। सभी बहुमूल्य जीवन की संपदाएं व्यक्तिगत हैं। क्रांति भी वैयक्तिक है। समूह के पास न कोई आत्मा है, न समूह के पास कोई बोध है न समूह के पास कोई संभावना है। तुम समूह से बचो। तुम अपने समय का उपयोग कर लो। ये जो थोड़ी सी घड़ियां तुम्हारे हाथ में हैं, इनसे अगर किसी तरह भी परमात्मा से संबध जुड़ जाए तो चूको मत, संबंध जोउ़ लो।

अगर तुम जिंदा हो, तो माना कि जिंदगी में कैद है, लेकिन अगर तुम जिंदा हो तो जंजीरो से भी गीत पैदा कर सकते हो।

अगर जंजीरों से गीत पैदा नहीं कर सकते, अगर जंजीरों से ध्वनि पैदा नहीं कर सकते, अगर जंजीरों से संगीत पैदा नहीं कर सकते, तो तुम पैदा ही नही कर सकोगे संगीत कभी। और तुमसे मैं एक राज की बात कहना चाहता हूं-अगर तुम अपनी जंजीरों से संगीत पैदा कर लो, तो जंजीरें उसी संगीत में ढल जाती हैं, गल जाती हैं, जंजीरें उसी संगीत में टूट जाती हैं, बिखर जाती हैं। संगीत जितना जंजीरों को गलाने में समर्थ है, उतनी कोई अग्नि नहीं। उत्सव जितना जीवन की पीड़ा से मुक्त करने में सहयोगी है, उतना कोई और नहीं। और भक्त उत्सव जानता है। और ध्यानी उत्सव जानता है। जगत में दुख है, माना, अगर तुम नाचो। और यहां चारों तरफ दीवालें हैं कठोर, मगर तुम नाचो। और तुम्हारे पैर में जंजीरें हैं, मगर तुम नाचो। और तुम अचानक हैरान हो जाओगे, अगर तुम परमात्मा का हाथ पकड़ कर नाचना शुरू कर दो, कैद से तुम मुक्त हो गए, उसी नाच में तुम मुक्त हो गए। दीवालें गिर गयीं, जंजीरें गल गयीं, दुख गया-संसार गया-और तुम्हारी आंखों में एक नए आकाश का अवतरण शुरू हो जाता है। वही क्रांति है। बाकी सब समग्र क्रांतियां क्रांतियां ही नहीं हैं, समग्र तो बात ही छोड़ दो कूड़ा-करकट है, सब व्यर्थ की दौड़ धूप है, सब आदमी की आशाओं का शोषण है।

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