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सुख का द्वार भीतर है – ओशो

एक मित्र ने पत्र लिखा है और पूछा है कि संसार में इतना दुख है, दीनता है, दरिद्रता है, क्या यह समय है ध्यान और भक्ति की बात करने का? पहले दुख मिटे दुनिया का, शोषण मिटे दुनिया का, फिर ही भगवान की खोज हो सकती है।

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ओशो ने कभी अपने अधिकारों का स्वामित्व नहीं किया

ओशो की शिष्या एवं एडवोकेट, मा प्रेम संगीत नियमित रूप से ‘विहा कनेक्शन’ और ‘ओशो न्यूज’ के लिए लिखती हैं। आपको पता ही होगा कि अमेरिका में करीब दस साल तक चले मुकदमे में दिल्ली की ‘ओशो वर्ल्ड’ नामक संस्था की विजय घोषित करते हुए, न्यायाधीश ने स्पष्ट निर्णय दिया था कि ‘ओशो’ शब्द को कॅापीराइट कराने का अधिकार किसी को भी नहीं हो सकता है। तब यू.एस.ए. से पराजित होकर ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन (ओ.आई.एफ.) ने नया षड्यंत्र रचा- यूरोप में कॅापीराइट कराने की कोशिश की। वहां पर ‘ओशो लोटस’ नामक संस्था ने विरोध में आपत्ति उठाते हुए मुकद्दमा दायर किया। किंतु ओ.आई.एफ. की जीत हुई- सत्य की नहीं, झूठ-फरेब की जो कि शीघ्र ही उजागर होने लगे।

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