विचार करना कष्टपूर्ण है, विश्वास करना सुविधापूर्ण है, कन्वीनिएंट है, क्योंकि विश्वास करने में हमें कुछ भी नहीं करना पड़ता, सिर्फ विश्वास करना पड़ता है। विचार करने में हमें बहुत कुछ करना पड़ता है। विचार करने में हमें ही निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ता है। विचार में एक यात्रा है, विश्वास में विश्राम है।

भारत का मन विश्राम कर रहा है हजारों साल से, विश्वास की छाया में आंख बंद किये पड़ा है। मान लिया है, इसलिए खोजने की जरूरत नहीं रही है। इसलिए भारत में साइंस पैदा नहीं हो सकी। हो सकती थी सबसे पहले। सारी पृथ्वी पर सबसे पहले यह जमीन सभ्य हुई, सबसे पहले पृथ्वी पर इस जमीन ने भाषा को जन्माया। सबसे पहले पृथ्वी पर इस जमीन को गणित का बोध आया।

जिनके पास सारे सूत्र आ गये थे सबसे पहले, वे आज सबसे पीछे खड़े हैं- एक मिरेकल है, एक चमत्कार है। गणित हमने खोजा। यह एक, दो, तीन, चार से नौ तक की जो गिनती है, यह सारी दुनिया में हमसे फैली है। यह हमसे गयी है सारी दुनिया में। लेकिन आइंस्टीन हम पैदा नहीं करते, आइंस्टीन कोई और पैदा करता है। न्यूटन हम पैदा नहीं करते, वह कोई और पैदा कर रहा है। सबसे पहले जिन्होंने गणित पैदा किया, गणित की ऊंचाइयां वे क्यों न छू सके? सबसे पहले जिन्होंने भाषा पैदा की, वे विचार की ऊंचाइयां क्यों न छू सके?

आज से कोई पांच हजार साल पहले हमने सभ्यता को सबसे पहले जन्म दिया।

लेकिन हमने नींव भरकर छोड़ दी, ऊपर का भवन नहीं बनाया। वह भवन किन्हीं और ने बना लिया है। आज हम उन्हीं के सामने भीख मांगते हुए खड़े हैं।

दुनिया की सारी भाषाएं करीब-करीब संस्कृत से जन्मी हैं। रूस की भाषा में कोई बीस प्रतिशत शब्द संस्कृत के है। लिथियानियन में कोई पचहत्तर प्रतिशत शब्द संस्कृत के हैं। ग्रीक या रोमन, या अंग्रेजी, या जर्मन सारी भाषाएं संस्कृत से उधार हैं। गणित हमसे फैला और सारे जगत में गया, लेकिन विचार हम न कर पाये और हम विश्वास से घिरते चले गये। विश्वास में जो हो गया उसे स्वीकार करके बैठ गया। फिर पांच हजार साल उसने कोई यात्रा न की। वह अपनी संस्कृत की किताब लिये दोहराता रहा। बार-बार दोहराता रहा। आवृत्ति और पाठ करता रहा। जो उसने पा लिया था उसका गुणगान करता रहा।

भारत की प्रतिभा बूंद रह गयी है, सागर नहीं बन पायी है। संतोष पकड़ गया है। जो है चुपचाप स्वीकार कर लिया है। हमारे सारे शिक्षक समझा रहे हैं कि आवश्यकताएं कम करो। हमारे सारे शिक्षक समझा रहे हैं, सिकुड़ो, सिकुड़ो, सिकुड़ो, बिलकुल बूंद रह जाओ। हमारे शिक्षक समझा रहे हैं, सब सिकोड़ो। जीवन कहता है, फैलो, जीवन कहता है, विस्तार करो, जीवन कहता है, जाओ दूर को और अनंत को और हमारे शिक्षक कहते हैं, सिकुड़ो, सीमा छोटी करो और छोटी करो, जितनी भी है, बड़ी है और छोटी करो, और सिकुड़ो, और मर जाओ, कब्र में समा जाओ तो परम स्थिति को उपलब्ध हो जाओगे।

जिंदगी है विस्तार। जिंदगी का सूत्र है, विस्तार। यहां सब बड़ा होता है। एक बीज बो दें तो एक वृक्ष पैदा होता है। छोटा-सा बीज इतना बड़ा वृक्ष बन जाता है कि हजार बैलगाड़ियां उसके नीचे विश्राम करें और एक छोटा-सा बीज बो दें तो उस वृक्ष पर अरबों बीज पैदा होते हैं। कितना फैलाव कर लिया एक बीज ने? एक छोटा-सा बीज फैलकर अरब बीज हो गया है। अरब बीज बो दें, फैलता चला जायेगा, फैलता चला जायेगा। जीवन विस्तार है।

मेरी दृष्टि में ब्रह्म का एक ही अर्थ है, उस शब्द का भी वही अर्थ है। ब्रह्मï शब्द का अर्थ है फैलाव, विस्तार, जो फैलता ही चला जाता है, जो रुकता ही नहीं, जो अंतहीन फैलाव है। ब्रह्म शब्द का मतलब भी यही है। ब्रह्म का मतलब होता है, ‘दि एक्सपेंडिंग’।

अभी आइंस्टीन के बाद यह पता चला है कि विश्व जो है, ब्रह्मïांड जो है, वह फैल रहा है, वह एक्सपेंड कर रहा है। वह फैला हुआ नहीं है। सब तारें अरबों-खरबों मील प्रति सकेंड के हिसाब से फैलते चले जा रहे है, जैसे कोई हवा का फुग्गा हो… रबर का, और उसमें हम हवा भरते जायें और वह फैलता चला जाये। ऐसा हमारा यह विश्व ठहरा हुआ नहीं है, यह फैलता चला जा रहा है, इसकी सीमाएं रोज बड़ी हो रही हैं। यह अंतहीन फैलाव है।

जिसे पहली दफे ब्रह्मï शब्द सूझा होगा, वह आदमी अद्भुत रहा होगा, क्योंकि ब्रह्मï का मतलब होता है फैलना-फैलते ही चले जाना, फैलते ही चले जाना। लेकिन कितना अद्भुत है, जिन लोगों ने ब्रह्मï शब्द खोजा, उन्हीं लोगों ने सिकोड़ने की फिलासिफी खोजी। वे कहते हंै, सिकुड़ते चले आओ- अपरिग्रह, अनासक्ति, त्याग, वैराग्य, सिकुड़ो, छोड़ो, जो है उससे भागो और सिकुड़ते जाओ, सिकुड़ते जाओ- जब तक बिलकुल मर न जाओ तब तक सिकुड़ते चले जाओ।

संतोष इसका आधार बना, सिकुड़ना इसका क्रम बना, और भारत की आत्मा सिकुड़ गयी और संतुष्टï हो गयी। अब जरूरत है कि फैलाओ इसे। इस चौराहे पर फैलने का निर्णय लेना पड़ेगा। छोड़ो संतोष, लाओ नये असंतोष, नये डिसकंटेंट- दूर को जीतने की, दूर को पाने की, दूर को उपलब्ध करने की आकांक्षा को जगाओ, अभीप्सा को जगाओ… कि जो भी पाने योग्य है पाकर रहेंगे, जो नहीं पाने योग्य है उसको भी पाकर रहेंगे तो इस मुल्क की प्रतिभा में प्राण आये तो इसके भीतर से कुछ जगे, क्योंकि जब भी कुछ जगता है तब फैलना चाहता है। और जब फैलना नहीं चाहते आप तो सोने के सिवाय कोई उपाय नहीं रह जाता। सो जाता है।

अभीप्सा जगानी है- डिसकंटेंट, असंतोष। कहीं अगस्तीन ने एक शब्द लिखा है, वह फिर पीछे से मुझे प्रीतिकर हो गया है। लिखा है उसने, ‘डिवाइन डिसकंटेंट’-लिखा है, धार्मिक असंतोष, लिखा है, पवित्र असंतोष। सच में असंतोष से ज्यादा पवित्र और कुछ भी नहीं है, क्योंकि असंतोष गति है, विकास है, परिवर्तन है, क्रांति है।

इसलिए आज की चर्चा में यह सूत्र दोहरा दूं, और बात पूरी करूं। विश्वास नहीं, चाहिए विचार। अध्यापन नहीं, चाहिए संदेह। अंधे विश्वासों की शृंखलाएं नहीं, चाहिए वैज्ञानिक चिंतन। संतोष नहीं, चाहिए असंतोष। अगति नहीं, चाहिए गति, चाहिए अभीप्सा-अनंत को जीत लेने की, फैल जाने की।

काश, भारत के मन में अनंत की यह अभीप्सा जाग जाये तो हम अपनी ही सोई हुई आत्मा को पुन: जगा सकते हैं।

और ध्यान रहे, जागा हुआ भारत ही निर्णय ले सकेगा कि इस चौराहे से कहां जाये, सोया हुआ भारत तो इसी चौराहे पर अफीम खाकर सोया रहेगा। अफीम के हमने अच्छे-अच्छे नाम रखे हैं। किसी अफीम की पुड़िया पर लिखा है ‘राम-राम’। किसी अफीम की पुड़िया पर लिखा है ‘भगवत-भजन’। किसी अफीम की पुड़िया पर कुछ और, किसी अफीम की पुड़िया पर कुछ और। अफीम की पुड़िये तैयार हैं। भक्त अफीम की पुड़िये लेकर चौरस्ते पर सो रहे हैं और आप पूछते हैं कि समाज परिवर्तन के चौराहे पर? जबकि समाज अफीम खाकर सोया हुआ है। 

यह भी पढ़ें –धर्म उधार नहीं, उदार है