पितृपक्ष में पितृ देवता को प्रसन्न करने के लिए कुछ कर्म करने का विधान शास्त्रों में वर्णित है क्योंकि पितृपक्ष में पितृगण का श्राद्घ तर्पण करने से पितर प्रसन्न होकर शुभ फल देते हैं। यही नहीं इससे परिवार में सुख, शांति, समृद्घि व वंश वृद्घि होती है। आइए जानते हैं कुछ ऐसी बातों के बारे में जिनका पितृपक्ष के दौरान खास ध्यान रखना चाहिए।

  • पितृ किसी भी रूप में पितृपक्ष में दर्शन देते हैं इसलिए इन दिनों में भूलकर भी द्वार पर आने वाले किसी भी जीव का निरादर ना करें।
  • पितृपक्ष में पशु पक्षियों को अन्न, जल देने से विशेष लाभ मिलता है। इनको भोजन देने से पितृगण प्रसन्न होते हैं।
  • जो पितृपक्ष में पितरों का श्राद्घ करता है उनको पितृपक्ष में ब्रह्मïचर्य का पालन करना चाहिए व मांस मंदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • पितृपक्ष के दौरान चना, मसूर, सरसों का साग, सत्तू, जीरा, बासी भोजन, काला नमक, लौकी, खीरा नहीं खाना चाहिए।
  • पंडितों के अनुसार श्राद्घ कर्म में स्थान का विशेष महत्त्व है। शास्त्रों में बताया गया है कि गया, प्रयाग, बद्रीनाथ में श्राद्घ एवं पिंडदान करने से पितरों को मुक्ति मिलती है। जो लोग इन स्थानों पर पिंडदान नहीं करते हैं वे अपने घर के आंगन की जमीन पर बैठकर भी तर्पण कर सकते हैं परंतु किसी अन्य की जमीन पर तर्पण नहीं कर सकते हैं।
  • श्राद्घ व तर्पण क्रिया में काले तिलों का बहुत ज्यादा महत्त्व माना गया है। श्राद्घ करने वालों को पितृ कर्म करते वक्त काले तिलों का महत्त्व समझना चाहिए। काले तिल अगर ना हो तो सफेद व लाल तिल का प्रयोग कभी भूलकर भी ना करें।
  • पितृपक्ष में पितरों को प्रसन्न करने के लिए ब्राह्मïणों को भोजन करवाने का नियम भी बताया गया है। भोजन शुद्घ शाकाहारी होना चाहिए साथ ही उन्हें वस्त्र व दक्षिणा दें।
  • पितृपक्ष में भोजन करने वाले ब्राह्मïण के लिए भी नियम है कि श्राद्घ का अन्न ग्रहण करने से पूर्व कुछ खाकर ना आएं।
  • श्राद्घपक्ष में शास्त्रानुसार कुत्ते, बिल्ली, गायों व पक्षियों को किसी भी तरह की हानि ना पहुंचाएं बल्कि उनको भोजन व जल दें। पितृपक्ष के दौरान कोई भी शुभ कार्य à¤µ आयोजन ना करें और नए वस्त्र भी à¤¨à¤¾ पहनें।
  • श्राद्घपक्ष में पितृ कर्म पूर्ण श्रद्घा व विश्वास से करें।

पितृदोष पितृों के नाराज होने से शुरू होता है। इसके लक्षण हैं-

  • पितृदोष के द्वारा पीड़ित व्यक्ति के चेहरे पर तेज नहीं होगा, खुशी नहीं होगी, जीवन में उत्साह और उमंग नहीं होगा। सुंदर व सम्पन्न होने के बाद भी वह व्यक्ति निस्तेज ही होगा।
  • उस व्यक्ति के घर में आनंद नहीं होगा, घर दुखों से भरा होगा। खुशी के माहौल का अभाव होगा चाहे वह कितने भौतिक सुखों से भरा क्यों ना हो परंतु वहां पर रहने वाले लोगों में संतुष्टिï भाव नहीं होगा। गृहस्वामी हो या गृहस्वामिनी सभी जीवन से असंतुष्टï नजर आएंगे।
  • पितृदोष से गुजर रहा व्यक्ति हमेशा अपनी विफलता पर ही बात करता नजर आएगा या डीगें मारता नजर आएगा। वो हमेशा अपने अतीत की बातें करता à¤¨à¤œà¤° आएगा।
  • घर में कोई ना कोई बीमार रहेगा। कई बार तो सारे सदस्य ही बीमार रहेंगे। दवा लगेगी ही नहीं और ये क्रिया लगभग चलती ही रहेगी।
  • पितृदोष से ग्रसित व्यक्ति के संतान होगी नहीं, होगी तो कठिनाई से होगी। परिवार में आपसी प्रेम नहीं होगा। अगर घर में चार सदस्य होंगे तो भी वे विमुख ही रहेंगे। कोई भी सहने या मनाने को तैयार नहीं होगा। परिवार में प्रेम का अभाव ही रहेगा। घर में सुमति नहीं होगी।
  • घर में आप कितने ही फूलों के गमले लगा लें फूल उस पर आएंगे ही नहीं। पौधे सूख जाएगें।
  • भाईयों में हमेशा मनमुटाव रहेगा। कोई एक दूसरे को समझने को तैयार नहीं होगा। विवाह योग्य बच्चों की शादी होगी नहीं- अच्छे धनवान व शिक्षित होने के बाद भी विवाह नहीं होगा। पितृदोष के कारण घर में मंगल कार्य ही नहीं होता। हर कार्य में बाधा आती है।
  • अचानक ही व्यापार में घाटा, नौकरी का छूटना या धन हानि लग जाना।
  • पितृदोष से पीड़ित व्यक्ति के घर में गंदा पानी भरा व निकलता मिलेगा, नाली बंद रहेगी।
  • अगर घर में किसी कमरे की पांच दीवारें हो तो समझ लें व्यक्ति पितृदोष से पीड़ित है। घर के मध्य में अगर जलस्रोत है तो पितृदोष है। पितृदोष à¤¸à¥‡ पीड़ित घर की दीवारों पर जाले, à¤¦à¤°à¤¾à¤°à¥‡à¤‚ मिलेंगी।
  • हर कार्य रुक जाता है। अचानक ही बदनामी और अपयश मिलना। बच्चों की पढ़ाई रुक जाए तो समझें पितृदोष है। 

पितृदोष दूर करने के उपाय

  • गया में सभी भाई जाकर पिंड दान करें।
  • महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।
  • अपने गुरु ग्रह को मजबूत करें। गुरुवार को पीली चीजों का दान करें क्योंकि गुरु खराब होने पर पितृदोष प्रबल हो जाता है। साथ ही गुरु के 108 नामों का पाठ करें। गुरु कवच का पाठ करें।
  • वृद्घ ब्राह्मण को पीले रंग के वस्त्र व अन्न का दान करें।
  • हर अमावस्या को पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं उसमें अखंडित लौंग रख दें। साथ में भोजन व जल रखें। धूप भी जलाएं।
  • घर में लगे सफाईकर्मी को कुछ दान दें। à¤˜à¤° में बहू-बेटी का ख्याल रखें।

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