Osho is the sum of all incarnations
Osho is the sum of all incarnations

Osho: मेरे लिए ओशो संबुद्ध रहस्यदर्शी, महाचेतना का नाम है। वो मेरे लिए एक अवतार हैं हिंदु धर्म में अब तक जितने समूचे अवतार हुए हैं उन सब का जोड़ हैं ओशो। बुद्ध और जोरबा का मिलन है ओशो। ओशो एक संन्यासी योद्धा हैं, प्रज्ञा पुरुष हैं। ओशो जैसा क्रांतिकारी गुरु इस पृथ्वी पर दोबारा होना मुश्किल है।

ओशो ने सभी धार्मिक ग्रंथों एवं संतों आदि पर बोलकर उन सब में प्राण फूंक दिए।

हिंदू धर्म में कृष्ण को लोग पूर्वावतार कहते हैं। आप उनकी वेश भूषा देखिए, क्रिया कलाप देखिए, उनका ऐश्वर्य प्रेम देखिए लेकिन कोई उन्हें कुछ नहीं कहता। ओशो और संतों से अलग हैं, ऐश्वर्य प्रेमी हैं, रॉल्स रॉयस कार में चलते हैं, महंगे कपड़े पहनते हैं आदि पर सबको आपत्ति होती है क्यों? हमारे सभी देवता-अवतार, ऐश्वर्य प्रेमी रहे हैं ओशो भी पूर्ण ऐश्वर्य प्रेमी थे इसमें क्या गलत है? लेकिन हमारे समाज को ऐसे संत पसंद हैं जो सालों से या तो भूखें हैं या फिर सालों से खड़े हुए हैं या फिर वो जो अपना घर-बार, जिम्मेदारियों को छोड़कर हिमालय चले गये वो उनके लिए महान हो गये। ओशो ने कहा ‘या तो जीवन में कुछ लो मत और यदि लो तो सर्वश्रेष्ठ लो, तो ओशो ने हर वो चीज करी व रखी जो सर्वश्रेष्ठï थी। उन्होंने उनका त्याग नहीं किया।
आजकल के संत कोई संत थोड़े ही हैं वो तो अपनी दुकानें चला रहे हैं।
ओशो ने सामाजिक स्तर पर बहुत खिलाफत और कष्ट सहे परंतु फिर भी उन्होंने किसी समाज, धर्म या सरकार को खुश करने की बात नहीं की।
ओशो एक मात्र ऐसे सद्गुरु हुए हैं जो सिक्के के दोनों पहलू पर कहने की क्षमता और हिम्मत रखते थे। जो आदमी दोनों बातें कहेगा उसकी बातों में आपको विरोधाभास महसूस होगा ही।
ओशो को यदि समझना है तो आपको उनको पढ़ना-सुनना चाहिए और यदि आपके पास इतना समय नहीं है तो एक बार उस पार्क में जाइए जो उनके पूना कम्यून के पीछे है। वो उनकी एक ऐसी पुस्तक है, ऐसा प्रवचन है, ऐसी ध्यान विधि है कि आपको समझ में आ जाएगा कि ओशो कौन हैं, क्या उनकी ऊंचाई और पहचान है। उन्होंने नाले को एक बगीचा बना दिया। जहां न बदबू है, न ही मच्छर। वहां बहते झरने और खिलते कमल हैं, नाला होते हुए भी नाला नहीं है। उस नाले ने ओशो को, ओशो की पुस्तकों को अलग रूप में अभिव्यक्त किया है। इसके बावजूद भी ओशो को गलत समझा गया। ओशो के विवादित व गलत समझे जाने का कारण मीडिया है क्योंकि मीडिया ने उन्हें गलत प्रचारित किया। भक्ति, ध्यान, प्रेम और संन्यास जैसे विषयों पर जितना ओशो ने बोला उतना आज तक किसी ने नहीं बोला लेकिन मीडिया ने उन्हें एक पुस्तक के चलते ‘सेक्स गुरु’ के नाम से प्रचारित किया। जबकि मेरी नजर में तो गीता से पवित्र है ओशो की पुस्तक ‘संभोग से समाधि की ओर।’

ओशो ने आज तक फ्री सेक्स की बात नहीं की बल्कि उन्होंने कहा ‘जो लोग ब्रह्मïचर्य की बात करते हैं वही लोग अपने अंदर अपनी कामवासनाओं को दबाकर रखते हैं।’ ओशो मनुष्य को भगवान का दर्जा देना चाहते थे। पृथ्वी को सुंदरतम बनाना चाहते थे।
ओशो ने उन्हीं का मजाक उड़ाया जो मजाक के पात्र थे। वो उनका असली चेहरा दिखाना चाहते थे, जिनको हम सदियों से पूज रहे थे।

ओशो भारत की मृत संस्कृति व परंपराओं के खिलाफ जरूर बोले परंतु उन्होंने भारत में जो खूबसूरत है उसे भी उभारा है। भारत जिन झूठे नारों और नेताओं से भरा पड़ा है, उसके प्रति आगाह किया है।
ओशो ने हर विषय पर बोला है और वो बेहतरीन बोला है, पर जो उन्होंने संभोग से समाधि में कृष्ण स्मृति में तथा मैं मृत्यु सिखाता हूं में बोला है वो मुझे बहुत प्रिय है।
‘संभोग से समाधि की ओर’ पुस्तक में ओशो ने इतनी जान फूंक दी थी कि यह किताब मोरार जी देसाई तक को पढ़नी पड़ी थी मैं दावे के साथ कह सकता हूं जिसने यह किताब पढ़ ली वह ओशो से बच नहीं सकता।
ओशो ने हमारे देश को विचार की क्रांति में ले जाने की कोशिश की है। जो कि इस देश की एकमात्र जरूरत है। उन्होंने हर तरह से चेष्टा करके, वैचारिक शॉक्स दे के नींद तोड़ने की कोशिश की है ताकि इस देश का विचार जग सके। उन्होंने एक-एक आदमी की आस्था की जमीन खींच ली।