धर्म प्रश्न है। धर्म ही उत्तर है। सद्गुरु से प्रश्न पूछो क्योंकि दुनिया में जितनी भी धर्मग्रन्थ हैं, उनका जन्म प्रश्नों से हुआ है। शिष्य ने प्रश्न पूछा और गुरु ने उसके समाधान में जो कहा, वह ग्रन्थ बन गया, शास्त्र पुराण बन गया। गीता क्या है? अर्जुन के प्रश्नों का समाधान ही तो है। ‘सवार्थसिद्घि’ ग्रन्थ क्या है? एक जिज्ञासा का समाधान ही तो है। शिष्य ने पूछा भगवन किं नु खलु आत्मने हितं? इस प्रश्न के समाधान में एक ग्रन्थ बन गया। जैन पुराण कहते हैं कि राजा श्रेणिका ने समवशरण में महावीर स्वामी से 60 हजार प्रश्न पूछे थे।

प्रश्न पूछो। संतों के सान्निध्य में बैठने का अवसर मिले तो अपनी जिज्ञासा उनके सामने जरूर रखो। उनसे प्रश्न जरूर पूछो। पर संत से मुर्दा प्रश्न पूछकर अपना और संत का समय बर्बाद मत करना। वे प्रश्न, जो सिर्फ ‘टाइम पास’ करने के लिए पूछे जाते हैं, मुर्दा प्रश्न हैं। वे प्रश्न, जो सिर्फ कुछ पूछना है, के लिए पूछे जाते हैं, मुर्दा प्रश्न हैं। वे प्रश्न, जिन प्रश्नों में हमारे प्राण, हमारी अन्तरात्मा नहीं होती मुर्दा प्रश्न हैं। वे प्रश्न, जो खुद की समस्या नहीं होते, मुर्दा प्रश्न हैं। संतों से जिन्दा प्रश्न पूछो, सार्थक प्रश्न पूछो, वो प्रश्न जो तुम्हारे जीवन की समस्या हो। पूछो- मुझे क्रोध बहुत आता है, इस पर काबू कैसे पाएं? मुझे काम सताता है। इस पर अंकुश कैसे रख सकता हूं? लोभ मुझे बहुत दौड़ाता है। लोभ पर नियंत्रण के लिए मैं क्या करूं? मेरा मन बड़ा चंचल है। इसके लिए मैं क्या करूं?

जिन्दा प्रश्न पूछो। लोग संतों से बड़े मुर्दा प्रश्न पूछते हैं। एक भाई मुझसे पूछ रहे थे ‘मुनिश्री! इस जमीन के नीचे क्या है?’ मैंने कहा, ‘जैन-शास्त्रों के अनुसार इस जमीन के नीचे नरक है।’ फिर पूछा, ‘और नरक के नीचे क्या है? मैंने कहा: नरक के नीचे निगोद है।’ फिर उन भाई ने पूछा, ‘नरक के नीचे जो निगोद है, वहां कितनी जगह खाली पड़ी है?’ अब मेरे से नहीं रहा गया। मैने कहा, ‘क्यों? क्या तुम्हें वहां कोई फ्लैट बनाना है?’ ऐं…। अब अगर यह जान भी लिया कि निगोद में कितनी जगह है तो इससे तुम्हारा कौन सा क्रोध कम हो जाएगा? कौन सी कषाय जाती रहेगी? जीवन में क्या परिवर्तन हो जाएगा? जिन प्रश्नों के समाधान से जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आता है, ऐसे प्रश्नों को मैं मुर्दा प्रश्न कहता हूं।

एक नौजवान ने पूछा, ‘मुनिश्री! 15 अगस्त कब आता है?’ मैने कहा, ’26 जनवरी को।’ वे बोले, ‘आप मुनि होकर मजाक करते हो।’ मैंने कहा, ‘मजाक मैं नहीं कर रहा हूं बल्कि मजाक तुम्हारा प्रश्न कर रहा है।’ अरे भाई! 15 अगस्त तो 15 अगस्त को ही आएगा। बस स्टैण्ड पर जाकर किसी से पूछो, भाई साहब! 11 बजे वाली गाड़ी कितने बजे आएगी। तो सामने वाला कहेगा कि तुम्हारा दिमाग तो ठीक है। ऐं….। 11 बजे वाली गाड़ी तो 11 बजे ही आएगी। तो इस तरह के जो प्रश्न हैं, वे टाइम-पास प्रश्न हैं।

दुनिया में जितने भी धर्मग्रन्थ हैं, उनका जन्म प्रश्नों से हुआ है। बस शर्त केवल इतनी है कि वे प्रश्न जिन्दा होने चाहिए। जीवंत होने चाहिए। ‘किं नु खलु आत्मने हितं।’ शिष्य ने गुरु से पूछा: प्रभो! आत्मा का हित किसमें हैं? इसके लिए उत्तर में गुरु ने जो कहा, वह एक ग्रन्थ बन गया।

किसी ने पूछा है- आपको मनुष्य की किस बात पर सबसे अधिक आश्चर्य होता है? मुझे तीन बातों पर बड़ा आश्चर्य होता है। पहली- पहले मनुष्य बचपन से ऊबकर जल्दी ही बड़ा होना चाहता है, फिर ता-उम्र बचपन को याद करता रहता है। दूसरी- वह जीता है तो ऐसा जीता है कि कभी मरेगा ही नहीं और मरता है तो लगता है कि कभी जिया ही नहीं। तीसरी- पहले पैसे के चक्कर में अपनी सेहत को बिगाड़ लेता है। फिर सेहत को सुधारने के लिए पैसे को बिगाड़ता रहता है। आश्चर्य ये है कि अब लोगों को किसी बात पर आश्यर्च नहीं होता। मनुष्य खुद एक आश्चर्य है। मनुष्य में वह सब कुछ है, जो ब्रह्मïाण्ड में है।

मनुष्य अगर भीतर झांककर देखे तो उसके भीतर वह सब कुछ है जिसे वह पाना चाहता है, जो वह होना चाहता है। कहा गया है:

जो भीतर गया। वह भी तर गया॥

तर जाने का एक ही रास्ता है, वह खुद के भीतर जाना है। 

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